Bharat Devotion

जीव

शाब्दिक अर्थ (Shabdartha)

व्यष्टि आत्मा

व्युत्पत्ति एवं धातु मूल (Vyutpatti)

संस्कृत 'जीव्' से — जीना — शरीरधारी, व्यष्टि आत्मा जो किसी विशेष शरीर एवं जीवन से बंधी है।

आध्यात्मिक भावार्थ व संदर्भ

वेदांत सिखाता है कि जीव, यद्यपि पृथक अनुभव करता है, सार रूप में परमात्मा के समान है — मोक्ष इस पहचान को साकार करना है, इसे बनाना नहीं।

जीव का उल्लेख इन लेखों में