Bharat Devotion

निराकार

शाब्दिक अर्थ (Shabdartha)

रूपरहित

व्युत्पत्ति एवं धातु मूल (Vyutpatti)

'निर्' (रहित) + 'आकार' (रूप) से — कबीर का यह आग्रह कि परम सत्य का कोई भौतिक रूप या छवि नहीं है, मूर्तिपूजा तथा कठोर धर्मशास्त्रीय वर्णन दोनों को समान रूप से अस्वीकार करते हुए।

आध्यात्मिक भावार्थ व संदर्भ

कबीर का निर्गुण-निराकार दृष्टिकोण उन्हें अपने समय के मंदिर-आधारित हिंदू कर्मकांड तथा मस्जिद-आधारित रूढ़िवाद दोनों के विरुद्ध खड़ा करता है, यह आग्रह करते हुए कि निराकार ईश्वर से केवल भीतर ही मिला जा सकता है।

निराकार का उल्लेख इन लेखों में