अद्वैत
शाब्दिक अर्थ (Shabdartha)
अद्वैतवाद, न-दो
व्युत्पत्ति एवं धातु मूल (Vyutpatti)
'अ' (नहीं) + 'द्वैत' (द्वैतता) से — यह दार्शनिक मत कि आत्मा तथा ब्रह्म अंततः एक हैं, दो नहीं।
आध्यात्मिक भावार्थ व संदर्भ
आठवीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य द्वारा व्यवस्थित, अद्वैत वेदांत मानता है कि जगत की प्रतीत बहुलता एक अखंड सत्य पर आवरित माया है।