Bharat Devotion

दुःख

शाब्दिक अर्थ (Shabdartha)

प्रत्ययजन्य अस्तित्व का अंतर्निहित असंतोष तथा बेचैनी

व्युत्पत्ति एवं धातु मूल (Vyutpatti)

पालि/संस्कृत 'दुष्' (बुरा, कठिन) तथा 'ख' (पहिये का धुरी-छिद्र, स्थान) से।

आध्यात्मिक भावार्थ व संदर्भ

प्रथम आर्य सत्य: यह पहचानना कि अनित्य वस्तुओं से आसक्ति दुःख उत्पन्न करती है।

दुःख का उल्लेख इन लेखों में

दैनिक पाठ और विचार-चिंतन

दुःख-रहित आत्मिक अवस्था और भक्ति का पावन दर्शन

भगवान बुद्ध का दुःख-निवारण और आत्म-साक्षात्कार का मार्ग

बुद्ध का मध्यम मार्ग एवं आत्म-मुक्ति का अष्टांग विधान

शुद्ध चेतना, आत्म-साक्षात्कार एवं परमानंद की अवस्था

जातक कथाएँ क्यों अस्तित्व में हैं तथा प्रत्येक कथा किस प्रकार रचित है: तीन मूल प्रयोजन — ज्ञानोदय के मार्ग का चित्रण, कर्म की व्याख्या, तथा प्राचीन लोककथाओं का संरक्षण — जो एक आवर्ती त्रिखंडीय संरचना में गुंथे हैं जो वर्तमान की किसी दुविधा को पूर्वजन्म की कथा से जोड़ती है तथा पुनः वर्तमान में लौटाती है।