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Embroidered artwork for चढ़दी कला और रज़ा: भाणे को सहर्ष स्वीकारना: Embroidered Khanda emblem with a saffron Nishan Sahib flag and marigolds at sunrise

चढ़दी कला और रज़ा

भाणे को सहर्ष स्वीकारना

चढ़दी कला और रज़ा

भाणे को सहर्ष स्वीकारना

चढ़दी कला हर परिस्थिति में परमात्मा की रज़ा (भाणे) को सहर्ष स्वीकार करके प्रसन्न रहने की आध्यात्मिक अवस्था है।

सुख हो या दुख, भक्त परमात्मा के हुकम को मीठा मानकर स्वीकार करता है।

क्या आप जानते हैं?

परिभाषा

चढ़दी कला का अर्थ है हर हाल में प्रसन्न रहना। यह सिख फलसफे का एक अनूठा सिद्धांत है, जिसमें सुख-दुख को परमात्मा की इच्छा (रज़ा) का भाग मानकर हँसते-मुस्कुराते स्वीकार किया जाता है।

गुरबाणी में आधार

गुरु ग्रंथ साहिब में 'भाणै होवै सुख घणा, भाणै होवै दुख घणा' (जब परमात्मा की मर्ज़ी हो तब सुख मिलता है, जब मर्ज़ी हो तब दुख) कहकर सिखाया गया है कि दोनों ही उसकी रज़ा के अधीन हैं।

हुकम की मिठास

भक्त (गुरमुख) परमात्मा के हुकम को 'मीठा' मानता है, क्योंकि वह जानता है कि प्रभु का हर फैसला भलाई के लिए होता है। यही मानसिकता चढ़दी कला की नींव है।

रज़ा और भाणा

'रज़ा' और 'भाणा' दोनों परमात्मा की इच्छा के पर्याय हैं। सिख जीवन में 'रज़ा' को अपनाना (रज़ा-रज़ी) और 'भाणे' को मानना (भाणा मानना) एक ही आध्यात्मिक अभ्यास है, जो चढ़दी कला में परिणत होता है।

व्यवहारिक उदाहरण

सिख इतिहास में गुरु तेग बहादुर जी और गुरु गोबिंद सिंह जी के शहीदी-प्रसंग इस बात के जीते-जागते उदाहरण हैं कि कैसे परमात्मा की रज़ा में प्रसन्न रहते हुए सबसे बड़े कष्टों को भी मुस्कुराकर स्वीकार किया गया।

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