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केवलज्ञान

शाब्दिक अर्थ (Shabdartha)

पूर्ण, शुद्ध ज्ञान

व्युत्पत्ति एवं धातु मूल (Vyutpatti)

'केवल' (अकेला, पूर्ण, शुद्ध) + 'ज्ञान' से — समस्त कर्मों के क्षय से प्रकट होने वाला सर्वज्ञता का असीमित ज्ञान।

आध्यात्मिक भावार्थ व संदर्भ

तीर्थंकर तथा केवली जिस क्षण केवलज्ञान प्राप्त करते हैं, वे भूत, वर्तमान, तथा भविष्य के समस्त पदार्थों को एक साथ, प्रत्यक्ष रूप से जानते हैं — अनुमान द्वारा नहीं।

केवलज्ञान का उल्लेख इन लेखों में

सर्वज्ञता की अवस्था

राजा सिंहसेन तथा रानी सुयशा के पुत्र, चौदहवें तीर्थंकर, एक विशाल राज्य का त्याग करते हैं उस असीम मुक्ति हेतु जिसका वचन उनके अपने ही नाम ने दिया था।

त्याग की कथा

सत्रहवें तीर्थंकर की कथा, जो हस्तिनापुर में राजा सूर तथा रानी श्रीदेवी के घर जन्मे, चौबीस में असाधारण, क्योंकि उन्होंने चक्रवर्ती — प्रत्येक भूमि को जीतने वाले सार्वभौम सम्राट — के रूप में भी शासन किया, इससे पहले कि उन्होंने उसी संप्रभुता को मुक्ति हेतु त्याग दिया।

बाईसवें तीर्थंकर

चौबीस तीर्थंकरों में प्रथम ऋषभनाथ ने मानवता को सभ्यता की कलाएं सिखाईं, इससे पहले कि वे अपने राज्य का त्याग कर मुक्ति प्राप्त करें।