संसार
शाब्दिक अर्थ (Shabdartha)
भटकना; पुनर्जन्म का अंतहीन चक्र
व्युत्पत्ति एवं धातु मूल (Vyutpatti)
संस्कृत 'सम्' (साथ) और 'सृ' (बहना) से; तृष्णा से प्रेरित जन्म, मृत्यु और पुनर्जन्म के निरंतर प्रवाह को दर्शाता है।
आध्यात्मिक भावार्थ व संदर्भ
संसार कोई स्थान नहीं बल्कि तृष्णा और अज्ञान से बँधे मन की स्थिति है — जागरण ही अंततः इसे शांत करता है।