संत कबीर के दो-पंक्ति दोहों तथा साखियों का जाप तथा चिंतन दैनिक जीवन में तत्काल आत्म-अवलोकन, विनम्रता, तथा शांति प्रदान करता है।
यह एक छोटा सा दोहा है जो हमें सिखाता है कि हमें ऐसी वाणी बोलनी चाहिए जो दूसरों को शीतलता और सुकून दे, और खुद भी शीतल बने रहें। इसमें अहंकार को त्यागने और विनम्रता से बोलने की सीख दी गई है।
कबीर के नाम से प्रचलित यह दोहा सिखाता है कि दूसरों में बुराई खोजने से पहले अपने मन को देखो; भीतर झाँकने पर अपनी ही कमी सबसे बड़ी दिखती है।
चलती चक्की को देखकर कबीर रो पड़े: संसार के दो पाटों के बीच कोई साबुत नहीं बचता। नश्वरता पर कबीर दोहावली का एक दोहा।
यह एक छोटा सा दोहा (दो पंक्तियों की कविता) है, जो हमें सिखाता है कि धैर्य से सब कुछ होता है। जैसे माली पानी डालता है, लेकिन फल ऋतु आने पर ही लगता है, वैसे ही हमें मन को शांत रखकर प्रतीक्षा करनी चाहिए।
यह एक प्रसिद्ध भक्ति दोहा है जो गुरु की महिमा को गोविंद (भगवान) से भी ऊपर बताता है।
यह एक प्रसिद्ध दोहा है जो हमें सिखाता है कि जो काम कल करना है, उसे आज करो, और जो आज करना है, उसे अभी करो। क्योंकि पल भर में प्रलय आ सकती है, फिर करने का समय नहीं मिलेगा।
कबीर के नाम से प्रचलित दोहा: बाजार में खड़े होकर वे सबकी खैर माँगते हैं, न किसी से दोस्ती, न किसी से बैर।
कबीर का दोहा: शरीर बार-बार मरता है, पर आशा और तृष्णा नहीं मरती। माया, मन और छोड़ने की साधना पर कबीर दोहावली का एक दोहा।
कबीर का प्रसिद्ध दोहा (दोहावली 210): पोथियाँ पढ़-पढ़कर संसार थक गया, पर पंडित वही है जो प्रेम के ढाई आखर पढ़ ले।