द्रव्य
शाब्दिक अर्थ (Shabdartha)
पदार्थ; सार
व्युत्पत्ति एवं धातु मूल (Vyutpatti)
संस्कृत 'द्रु' (बहना, टिकना) से; जैन तत्वमीमांसा का मूल घटक — एक वास्तविकता जो गुण (लक्षण) तथा पर्याय (अवस्थाएँ) दोनों धारण करती है फिर भी अपने मूल स्वरूप में स्थिर रहती है।
आध्यात्मिक भावार्थ व संदर्भ
एक द्रव्य बदलता है फिर भी वही रहता है — जैसे मिट्टी का घड़ा फूटकर टुकड़े बने, फिर भी मिट्टी का 'द्रव्य' स्वयं यथावत रहता है, जो अनेकांतवाद का भौतिक उदाहरण है।