नियम
शाब्दिक अर्थ (Shabdartha)
व्यक्तिगत अनुशासन
व्युत्पत्ति एवं धातु मूल (Vyutpatti)
संस्कृत 'नि' (नीचे, भीतर) + 'यम्' (नियंत्रित करना) से — अष्टांग योग का द्वितीय अंग, पांच व्यक्तिगत अनुशासन जो दूसरों के बजाय भीतर की ओर निर्देशित हैं।
आध्यात्मिक भावार्थ व संदर्भ
पांच नियम — शुद्धता (शौच), संतोष, अनुशासन (तप), स्वाध्याय, तथा ईश्वर-प्रणिधान — ध्यान हेतु आंतरिक तत्परता विकसित करते हैं।