पूजा
शाब्दिक अर्थ (Shabdartha)
ईश्वर का आदर, सत्कार और श्रद्धापूर्वक वंदन
व्युत्पत्ति एवं धातु मूल (Vyutpatti)
संस्कृत धातु 'पूज्' (सत्कार करना)।
आध्यात्मिक भावार्थ व संदर्भ
भगवान को साक्षात् अतिथि मानकर प्रेम और समर्पण के साथ की जाने वाली सेवा।
ईश्वर का आदर, सत्कार और श्रद्धापूर्वक वंदन
संस्कृत धातु 'पूज्' (सत्कार करना)।
भगवान को साक्षात् अतिथि मानकर प्रेम और समर्पण के साथ की जाने वाली सेवा।
तीर्थंकर प्रतिमा के स्नात्र (अभिषेक) पूजन की विधि और स्तुतियाँ, जो पंडित वीरविजयजी द्वारा रचित मानी जाती हैं।
7 versesयह बौद्ध धर्म की एक बुनियादी प्रार्थना है, जिसमें व्यक्ति बुद्ध, उनकी शिक्षा (धम्म) और संघ (बौद्ध समुदाय) की शरण लेता है, और फिर हिंसा, चोरी, व्यभिचार, झूठ और नशीले पदार्थों से दूर रहने के पाँच नियमों का पालन करने का वचन देता है।
8 versesअक्षत (चावल) और नैवेद्य (भोजन) पूजा के मंत्र और विधि, जो जिनेन्द्र भगवान को मोक्ष और आठ कर्मों के क्षय की कामना से अर्पित की जाती है।
9 versesये आठ नियम बौद्ध परंपरा में एक दिन या एक रात के लिए लिए जाने वाले व्रत के संकल्प हैं, जिन्हें 'उपोसथ शील' कहा जाता है। इनका पालन आत्म-अनुशासन, ध्यान और पवित्रता को बढ़ाने के लिए किया जाता है।
8 versesबुद्ध के नौ गुणों का पालि स्मरण, जो थेरवाद भक्ति में चित्त को स्थिर करने और श्रद्धा जगाने के लिए पढ़ा जाता है।
1 verseदस शील, खुद्दकपाठ २: श्रामणेर-श्रामणेरियों के दस पालि प्रशिक्षण नियम, प्रत्येक 'विरत रहने का शिक्षापद ग्रहण करता हूँ' शब्दों के साथ।
12 versesप्रकाश का पवित्र विज्ञान
दैनिक पाठ और विचार-चिंतन
सिख प्रार्थना का अर्थ, संरचना और आध्यात्मिक शक्ति
कबीर की साखी, शब्द, तथा रमैनी
भगवान के चरणामृत का आध्यात्मिक महत्व और ग्रहण करने का नियम
सूर्यदेव के प्रति कृतज्ञता का चार-दिवसीय पर्व, जो बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और नेपाल में कठोर व्रत तथा नदी-तट पूजा के साथ मनाया जाता है।