वैराग्य
शाब्दिक अर्थ (Shabdartha)
विरक्ति, अनासक्ति
व्युत्पत्ति एवं धातु मूल (Vyutpatti)
'वि' (रहित) + 'राग' (रंग, आसक्ति) से — 'रंगरहित' होने की अवस्था, अर्थात इंद्रिय विषयों के प्रति लालसा से मुक्त।
आध्यात्मिक भावार्थ व संदर्भ
पतंजलि वैराग्य को अभ्यास (सतत साधना) के साथ मन को स्थिर करने के जुड़वां स्तंभों के रूप में जोड़ते हैं — विरक्ति जीवन के प्रति उदासीनता नहीं, बल्कि इच्छा द्वारा नियंत्रित होने से मुक्ति है।