Bharat Devotion

वर्ण

शाब्दिक अर्थ (Shabdartha)

रंग; वर्ग

व्युत्पत्ति एवं धातु मूल (Vyutpatti)

संस्कृत 'वर्ण' (रंग, श्रेणी); समाज का प्राचीन चतुर्विध वर्गीकरण — ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र — जिसे कुछ ग्रंथों में मूलतः केवल जन्म के बजाय योग्यता तथा व्यवसाय पर आधारित समझा गया था।

आध्यात्मिक भावार्थ व संदर्भ

भगवद गीता स्वयं कहती है कि वर्ण 'गुण और कर्म' (स्वभाव तथा कार्य) द्वारा निर्धारित होता है, यह श्लोक जन्म-आधारित जाति-कठोरता के विरुद्ध सुधार आंदोलनों द्वारा बार-बार उद्धृत किया जाता है।

वर्ण का उल्लेख इन लेखों में

राजा सिंहसेन तथा रानी सुयशा के पुत्र, चौदहवें तीर्थंकर, एक विशाल राज्य का त्याग करते हैं उस असीम मुक्ति हेतु जिसका वचन उनके अपने ही नाम ने दिया था।

अठारहवें तीर्थंकर अरनाथ, कल्पसूत्र के अध्याय 1 में अभिलिखित, उन तीन तीर्थंकरों में से एक हैं जिन्होंने साम्राज्य त्यागने से पहले चक्रवर्ती के रूप में शासन किया।

देवकी की आठवीं संतान के रूप में एक कारागार में जन्मे कृष्ण को वासुदेव ने अत्याचारी कंस से बचाने हेतु उफनती यमुना नदी पार कराई।

कथा और महत्व

सत्रहवें तीर्थंकर की कथा, जो हस्तिनापुर में राजा सूर तथा रानी श्रीदेवी के घर जन्मे, चौबीस में असाधारण, क्योंकि उन्होंने चक्रवर्ती — प्रत्येक भूमि को जीतने वाले सार्वभौम सम्राट — के रूप में भी शासन किया, इससे पहले कि उन्होंने उसी संप्रभुता को मुक्ति हेतु त्याग दिया।

रानी मंगला, पांचवें तीर्थंकर को गर्भ में धारण करते हुए, एक कटु अभिभावक विवाद को सुलैमान-सदृश एक चाल से सुलझाती हैं, तथा इस बुद्धि के सम्मान में अपने पुत्र का नाम रखती हैं।