भूमिका कथा: चार आवश्यक वस्तुओं का विचारहीन उपयोग
लित्त जातक, जो पालि संग्रह में क्रमांक 91 पर है और जातक अट्ठकथा में दर्ज है, बुद्ध ने जेतवन में सुनाया था। इसका विषय वस्तुओं का विचारहीन उपयोग था। परंपरा कहती है कि उस समय बहुत से भिक्षु चीवर और अन्य दान की वस्तुओं का उपयोग उनके प्रयोजन पर विचार किए बिना करते थे।
विचारशील भिक्षु के लिए गुरु का नियम
यह देखकर बुद्ध ने सजगता के गुण बताए और विचारहीन उपयोग के खतरे से सावधान किया। उन्होंने चार आवश्यक वस्तुओं, अर्थात चीवर, भिक्षान्न, आवास और औषधि के लिए एक नियम दिया। विचारशील भिक्षु चीवर किसी स्पष्ट प्रयोजन से पहनता है, अर्थात शीत से बचने के लिए। यही चिंतन शेष तीनों पर भी लागू होता है।
अनजाने में लिया गया विष
फिर बुद्ध ने कहा कि विचारहीन उपयोग घातक विष निगलने के समान है। उन्होंने जोड़ा कि अतीत में कुछ लोगों ने अनजाने में विष खाया था और समय आने पर उसका कष्ट भोगा। इन शब्दों के साथ उन्होंने अतीत की कथा आरंभ की।
बनारस का एक पासा-खिलाड़ी और एक धूर्त
एक समय, जब ब्रह्मदत्त बनारस में राज्य करते थे, बोधिसत्व एक संपन्न परिवार में जन्मे। बड़े होने पर वे पासा खेलने वाले बने। उनके साथ एक धूर्त खेला करता था, और उस व्यक्ति में एक बेईमान आदत थी।
धूर्त की चाल
जब तक वह जीत रहा होता, धूर्त खुशी से खेलता रहता। जब भाग्य पलटता, तो वह एक पासा मुँह में डाल लेता और दिखाता कि वह खो गया है। इससे खेल समाप्त हो जाता और वह बिना कुछ चुकाए चला जाता। बोधिसत्व ने यह कई बार होते देखा।
बोधिसत्व पासे तैयार करते हैं
बोधिसत्व समझ गए कि क्या किया जा रहा है और उन्होंने इस बात की जाँच करने का निश्चय किया। वे कुछ पासे घर ले गए और उन पर विष का लेप कर दिया। उन्होंने उन्हें सावधानी से सुखाया ताकि वे बिलकुल साधारण दिखें। फिर वे उन्हें लेकर धूर्त के पास गए और उसे खेल की चुनौती दी।
पासा निगल लिया गया
धूर्त सहमत हो गया, खेल की बिसात बिछाई गई और खेल शुरू हुआ। जैसे ही वह हारने लगा, उसने एक पासा मुँह में डाल लिया। बोधिसत्व ने उसे ऐसा करते देखा और शांत भाव से कहा। उन्होंने कहा कि निगल जाओ, क्योंकि जल्दी ही तुम्हें पता चल जाएगा कि वह पासा असल में क्या है।
फटकार की गाथा
तब बोधिसत्व ने एक गाथा कही। उसमें उन्होंने कहा कि धूर्त निडर होकर पासा निगल रहा है और उस पर छिपे जलते विष को नहीं जानता। उन्होंने कहा कि निगलता जा, क्योंकि शीघ्र ही भीतर जलन होगी। ये शब्द क्रोध में दी गई धमकी नहीं थे। वे केवल यह कथन थे कि धूर्त ने अपने ऊपर क्या बुला लिया है।
विष का असर और उपचार
बोधिसत्व अभी बोल ही रहे थे कि विष का असर होने लगा। धूर्त कमजोर पड़ गया, उसकी आँखें घूमने लगीं और वह पीड़ा से दोहरा होकर भूमि पर गिर पड़ा। तुरंत बोधिसत्व ने सोचा कि इस व्यक्ति के प्राण बचाने होंगे। उन्होंने कुछ जड़ी-बूटियाँ मिलाईं और तब तक वमनकारी औषधि दी जब तक उसे उलटी नहीं हो गई। फिर उन्होंने घी, शहद, शक्कर और अन्य सामग्री का पेय पिलाया, और वह व्यक्ति स्वस्थ हो गया।
चेतावनी और बोधिसत्व का देहावसान
जब वह व्यक्ति फिर स्वस्थ हो गया, तो बोधिसत्व ने उसे समझाया कि ऐसा काम फिर कभी न करे। उन्होंने उसे और दंड नहीं दिया। वे दान और अन्य शुभ कर्म करते हुए जीवन बिताते रहे, और जीवन समाप्त होने पर अपने कर्मों के अनुसार आगे की गति को प्राप्त हुए।
बुद्ध द्वारा पहचान
अपना उपदेश समाप्त कर बुद्ध ने कहा कि वस्तुओं का विचारहीन उपयोग घातक विष के विचारहीन सेवन जैसा है। फिर उन्होंने जन्म की पहचान बताई कि उन दिनों का वह बुद्धिमान और भला जुआरी वे स्वयं थे। पालि टिप्पणी जोड़ती है कि धूर्त की पहचान नहीं दी गई, क्योंकि जिन व्यक्तियों का वर्तमान समय में उल्लेख नहीं होता, उनके नाम नहीं बताए जाते।
एक ऐसी शिक्षा जो धूर्त की चाल से आगे चली
यह कथा दो स्तरों पर काम करती है। ऊपर से यह एक धूर्त को दिखाती है जो अपनी ही आदत से फँसता है, और एक बुद्धिमान व्यक्ति को जो बिना क्रूरता के उसे सुधारता है। उसके नीचे यह दैनिक अनुशासन की बात कहती है। चीवर, भोजन, आवास और औषधि साधारण वस्तुएँ हैं, पर बिना चिंतन के उपयोग में लाई जाएँ तो वे तृष्णा को पोषण देती हैं। बोधिसत्व धूर्त को और बुद्ध भिक्षुओं को एक ही विधि से स्वस्थ करते हैं: वे हानि को स्पष्ट दिखाते हैं और फिर उपचार देते हैं।
क्या आप जानते हैं?
लित्त जातक पालि जातक संग्रह में क्रमांक 91 है, जिसे जातक अट्ठकथा में प्रत्येक जन्मकथा की भूमिका के साथ सुनाया गया है।
बुद्ध ने इसे जेतवन में भिक्षुओं को चेताने के लिए सुनाया कि चीवर, भिक्षान्न, आवास और औषधि का उपयोग बिना विचार किए न करें।
इस जातक का पालि नाम उसकी प्रथम गाथा से लिया गया है, जिसमें धूर्त द्वारा पासा निगलने का वर्णन है।
बोधिसत्व उस धूर्त को त्यागते नहीं
विष का असर होने पर वे वमनकारी औषधि और घी, शहद तथा शक्कर के पेय से उसे स्वस्थ करते हैं।
बुद्ध स्वयं को उस बुद्धिमान जुआरी के रूप में पहचानते हैं, और अट्ठकथा जोड़ती है कि उस धूर्त का कोई नाम नहीं बताया गया।
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