मंगलगिरि
पानाकल नृसिंह का पावन पर्वत
आंध्र प्रदेश का मंगलगिरि नृसिंह महाक्षेत्र है, जहां पानाकल लक्ष्मीनृसिंह स्वामी मीठे गुड़-जल का अर्पण स्वीकार करते हैं।
संक्षिप्त तीर्थ मार्गदर्शिका (एक दृष्टि में)
- •स्वरूप एवं महिमा: मंगलगिरि ('कल्याणकारी पर्वत') भगवान नृसिंह के आठ महाक्षेत्रों में गिना जाने वाला अति पावन स्वयंभू क्षेत्र है। पहाड़ी पर स्थित गुफा मंदिर में श्री पानाकल लक्ष्मीनृसिंह स्वामी विराजमान हैं, जहाँ पाषाण विग्रह के मुख में अर्पित किया गया गुड़ का शरबत (पानाकम) प्रभु प्रत्यक्ष रूप से स्वीकार करते हैं।
- •दर्शन एवं जप का फल: भक्त परंपरा के अनुसार, जो ब्रह्मवैवर्त पुराण का आश्रय लेती है, मंगलगिरि की यात्रा से अकाल मृत्यु का भय समाप्त होता है, राहु और कुज (मंगल) दोष शांत होते हैं, तथा जीव को परम शांति और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
- •सर्वोत्तम समय: अक्टूबर से मार्च तक का समय तीर्थयात्रा के लिए श्रेष्ठ है। फाल्गुन मास का वार्षिक ब्रह्मोत्सव तथा नृसिंह जयंती (वैशाख शुक्ल चतुर्दशी) मुख्य उत्सव हैं।
- •स्थान: मंगलगिरि, जिला गुंटूर, आंध्र प्रदेश विजयवाड़ा और गुंटूर के मार्ग पर, कृष्णा नदी के समीप।
- •विधि एवं नियम:
- 1.यात्रा क्रम: पहले चरण में तलहटी स्थित श्री लक्ष्मीनृसिंह स्वामी (गाली गोपुरम युक्त मंदिर) के दर्शन करें, तत्पश्चात पहाड़ी पर पानाकल नृसिंह के दर्शन और फिर 10.5 किमी की गिरि प्रदक्षिणा करें।
- 2.पानाकम अर्पण: जल, गुड़, इलायची, काली मिर्च और कपूर से बना पानाकम अर्चकों द्वारा शंख के माध्यम से प्रभु के श्रीमुख में अर्पित किया जाता है। प्रभु आधा भाग ग्रहण कर आधा भाग अमृत प्रसाद के रूप में लौटाते हैं।
- 3.वेशभूषा: पारंपरिक भारतीय परिधान (धोती-कुर्ता या साड़ी/सलवार)।
पावन उद्गम एवं पौराणिक इतिहास
पौराणिक आख्यानों में मंगलगिरि को तोताद्रि और मुख्याद्रि कहा गया है। स्थल-पुराण परंपरा के अनुसार, जो ब्रह्मवैवर्त पुराण का संदर्भ देती है, सतयुग में राजा पारियात्र के धर्मात्मा पुत्र हस्व शृंगी ने भगवान विष्णु की घोर तपस्या की। प्रभु को सदैव धारण करने की अभिलाषा से राजकुमार ने एक विशाल गज (हाथी) का रूप धारण कर पर्वत के रूप में स्वयं को समर्पित कर दिया। भगवान विष्णु ने प्रसन्न होकर इस पर्वत को 'मंगलगिरि' नाम दिया और यहाँ नित्य निवास का वरदान दिया।
त्रेतायुग में नमुचि नामक दैत्य ने देवताओं पर अत्याचार किए। उसे किसी सूखे या गीले अस्त्र से न मरने का वरदान था। देवराज इंद्र की प्रार्थना पर भगवान नृसिंह ने अपने सुदर्शन चक्र और दिव्य श्वास की फेनयुक्त ज्वाला से इस पर्वत की गुफा में नमुचि का संहार किया। असुर वध के उपरांत प्रभु के उग्र रूप को शांत करने के लिए देवताओं ने अमृत अर्पित किया, जो कलियुग में गुड़ के मीठे पानाकम के रूप में अर्पित किया जाता है।
लंका विजय के पश्चात मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम ने भी इस पर्वत के तल पर श्री लक्ष्मीनृसिंह स्वामी की प्रतिष्ठा और पूजा की थी।
प्रमुख पावन स्थल एवं मंदिर
संत, मनीषी एवं ऐतिहासिक परंपरा
परंपरा जगद्गुरु आदि शंकराचार्य को इस पर्वत और नृसिंह स्तुतियों से जोड़ती है। १५वीं शताब्दी के संत-कवि श्री ताल्लपाक अन्नमाचार्य नृसिंह की महिमा के तेलुगु संकीर्तनों के लिए स्मरण किए जाते हैं। एक शिलालेख विजयनगर सम्राट कृष्णदेवराय की यात्रा का स्मरण कराता है। अमरावती के राजा वासिरेड्डी वेंकटाद्रि नायडू भगवान के निष्ठावान सेवक थे और उन्होंने उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभ में 153 फीट ऊँचे गाली गोपुरम के ऊपरी तल बनवाए।
पवित्र श्लोक एवं ध्यान
मंगलगिरि की यात्रा में नृसिंह महामंत्र का जप परम कल्याणकारी है:
उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम् ।
नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं नमाम्यहम् ॥
भावार्थ: जो परम उग्र, अत्यंत पराक्रमी, सर्वव्यापी महाविष्णु हैं; जिनका तेजोमय रूप सब दिशाओं में प्रज्वलित है; जो दुष्टों के लिए भयानक किंतु भक्तों के लिए परम कल्याणकारी और मृत्यु की भी मृत्यु हैं, उन भगवान श्रीनृसिंह को मैं बारंबार नमन करता हूँ।
क्या आप जानते हैं?
भक्त बताते हैं कि दिनभर में कितना भी पानाकम अर्पित हो, पानाकल नृसिंह के गर्भगृह में एक भी चींटी या मक्खी नहीं दिखाई देती।
तलहटी का 153 फीट ऊँचा, 11 मंजिला गाली गोपुरम दक्षिण भारत के सबसे ऊँचे गोपुरों में से एक है; इसके ऊपरी तल 1807 से 1809 ईस्वी के बीच बने।
मंगलगिरि पर्वत लेटे हुए हाथी के आकार का है, इसी कारण परंपरा इसे गज-रूप धारण करने वाले राजकुमार हस्व शृंगी से जोड़ती है।
जब अर्चक शंख के माध्यम से पानाकम अर्पित करते हैं, तब प्रभु द्वारा जल को गटकने की स्पष्ट 'गट-गट' ध्वनि सुनाई देती है, और पात्र का ठीक आधा भाग समाप्त होते ही यह ध्वनि स्वतः बंद हो जाती है।
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संबंधित शिक्षाएं
एक ही शिक्षा, विभिन्न परंपराओं में प्रतिध्वनित
