पंच सभा
भगवान नटराज के पांच पावन दिव्य नृत्य मण्डप
तमिलनाडु स्थित पंच सभाएं वे पांच दिव्य नृत्य मण्डप हैं जहाँ देवाधिदेव शिव ने नटराज रूप में अपने पंचकृत्य (सृष्टि, स्थिति, संहार, तिरोभाव, अनुग्रह) का आनंद तांडव प्रदर्शित किया। कनक, रजत, रत्न, ताम्र और चित्र सभा की यह पावन तीर्थयात्रा साधक के संचित कर्मों का क्षय कर हृदय में परमानंद का संचार करती है।
त्वरित भक्ति मार्गदर्शिका (एक नज़र में)
- •स्वरूप: पंच सभाएं तमिलनाडु में स्थित वे पांच पावन पीठ हैं जहाँ देवाधिदेव महादेव शिव ने नटराज रूप में ब्रह्माण्ड के पंचकृत्य (सृष्टि, स्थिति, संहार, तिरोभाव, अनुग्रह) को संचालित करने हेतु अपने दिव्य तांडव नृत्य प्रस्तुत किए।
- •दर्शन का फल: 'चिदम्बर माहात्म्य' और 'तिरुविलैयाडल पुराण' के अनुसार, इन पांच दिव्य सभाओं के दर्शन करने से साधक के पंचकोश शुद्ध होते हैं, जन्म-जन्मांतर के संचित पाप नष्ट होते हैं और हृदय में शिव-तत्व का साक्षात्कार होता है।
- •कब जाएं: तीर्थयात्रा का सर्वोत्तम समय अक्टूबर से मार्च के मध्य है। प्रमुख पावन तिथियों में आरुद्रा दर्शनम् (मार्गशीर्ष/दिसंबर-जनवरी), महाशिवरात्रि (फाल्गुन), तथा प्रत्येक पक्ष का प्रदोष व्रत अत्यंत फलदायी हैं।
- •कहाँ:
- 1.कनक सभा (स्वर्ण सभा): थिल्लई नटराज मंदिर, चिदंबरम (कुड्डालोर ज़िला)।
- 2.रजत सभा (चांदी की सभा): मीनाक्षी सुंदरेश्वरर मंदिर, मदुरै।
- 3.रत्न सभा (माणिक्य सभा): वड़ा अरण्येश्वरर मंदिर, तिरुवालंगाडु (तिरुवल्लूर ज़िला)।
- 4.ताम्र सभा (तांबे की सभा): नेल्लैयाप्पर मंदिर, तिरुनेलवेली (ताम्रपर्णी नदी तट)।
- 5.चित्र सभा (भित्तिचित्र सभा): कुट्रालनाथर मंदिर, कोर्टालम (तेनकाशी ज़िला)।
- •कैसे (विधि एवं नियम):
- •यात्रा क्रम: यात्रा का प्रारंभ उत्तर में तिरुवालंगाडु (रत्न सभा) या चिदंबरम (कनक सभा) से करके दक्षिण में मदुरै, तिरुनेलवेली और अंत में कोर्टालम (चित्र सभा) में पूर्ण करना शुभ माना जाता है।
- •मंदिर आचार व वस्त्र नियम: पारंपरिक वस्त्र (पुरुषों के लिए धोती/वेष्टि, महिलाओं के लिए साड़ी अथवा मर्यादित भारतीय परिधान) अनिवार्य हैं। नटराज विग्रह के 'कुंचितपाद' (उठे हुए चरण) का ध्यान करते हुए सदैव प्रदक्षिणा दक्षिणावर्त करें।
- •पवित्र स्नान व अर्पण: संबंधित मंदिर तीर्थों (जैसे चिदंबरम की शिवगंगा, मदुरै का स्वर्ण कमल कुंड) में पवित्र स्नान करें। भगवान को बिल्वपत्र, कच्चा दूध, चंदन और शुद्ध गोघृत का दीपक अर्पित करें।
Sacred Origin & Puranic / Scriptural Lineage
भगवान नटराज का तांडव नृत्य समस्त चराचर जगत का स्पंदन है। शैव सिद्धांत दर्शन के अनुसार, भगवान शिव का यह नृत्य केवल कोई शारीरिक गतिविधि नहीं, अपितु उनके पांच ब्रह्माण्डीय कार्यों (पंचकृत्य) का प्रकटीकरण है: सृष्टि (डमरू के नाद से), स्थिति (अभय मुद्रा से रक्षा), संहार (हस्त में प्रज्वलित अग्नि द्वारा), तिरोभाव (अपस्मार असुर पर चरण रखकर माया का आवरण), और अनुग्रह (उठे हुए बाएं चरण द्वारा मोक्ष प्रदान करना)।
पौराणिक आख्यानों के अनुसार, ऋषियों और अनन्य भक्तों की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान ने इन पांच विशिष्ट तीर्थों पर अपने भिन्न-भिन्न तांडव प्रकट किए। तिरुवालंगाडु (रत्न सभा) में महाकाली के क्रोध को शांत करने के लिए भगवान ने विस्मयकारी ऊर्ध्व तांडव किया। चिदंबरम (कनक सभा) में महर्षि पतंजलि और व्याघ्रपाद की तपस्या से संतुष्ट होकर भगवान ने आनंद तांडव का अलौकिक दर्शन दिया। मदुरै (रजत सभा) में भक्त राजा राजशेखर पांड्य की करुण प्रार्थना पर भगवान ने अपने चरणों को बदलकर दायां पैर उठाया (चतुर/संध्या तांडव)।
तिरुनेलवेली (ताम्र सभा) में महर्षि अगस्त्य और मुनियों के कल्याणार्थ भगवान ने मुनि तांडव प्रस्तुत किया। कोर्टालम की सुरम्य पर्वत श्रृंखलाओं और औषधीय जलप्रपातों के मध्य स्थित चित्र सभा में भगवान ने कलात्मक भित्तिचित्रों के माध्यम से त्रिपुरा तांडव की अनुपम छटा बिखेरी। इन पांच सभाओं की यात्रा आत्मा को परमात्मा से एकाकार करने का महामार्ग है।
पावन तीर्थ एवं स्थल
संत, मनीषी एवं ऐतिहासिक परंपरा
पंच सभाओं का माहात्म्य 63 नयनमार संतों की अमर वाणी में गुंजायमान है। शैव संप्रदाय की महान साध्वी कारैक्काल अम्मैयार ने अपने भौतिक सौंदर्य का त्याग कर, सिर के बल चलकर तिरुवालंगाडु (रत्न सभा) की यात्रा की और भगवान के चरणों के नीचे बैठकर तिरुवालंगाट्टु मूत्त तिरुप्पदिगम का गान किया।
संत अप्पार, तिरुज्ञान संबंदर, सुंदरर और मणिकवाचगर ने अपने 'तेवारम' (बारह खण्डों वाले शैव तमिल तिरुमुरै-संग्रह के प्रथम सात खण्ड) और 'तिरुवाचकम' (तिरुमुरै सं. 8) स्तोत्रों द्वारा इन दिव्य सभाओं को महिमामंडित किया। चोल सम्राटों (जिन्होंने चिदंबरम कनक सभा की छत को स्वर्ण-मंडित किया), पांड्य नरेशों तथा नायक वंश के राजाओं ने इन मण्डपों का निर्माण, संरक्षण और विस्तार कर सनातन संस्कृति को अमरत्व प्रदान किया।
पावन स्तोत्र एवं ध्यान
पंच सभाओं के ध्यान के समय 'चिदम्बर माहात्म्य' से उद्धृत इस परम पावन नटराज श्लोक का स्मरण करें:
कृपा समुद्रं सुमुखं त्रिनेत्रं जटाधरं पार्वती वामभागम् ।
सदाशिवं रुद्रमनन्तरूपं चिदम्बरेशं हृदि भावयामि ॥
Kṛpā-samudraṁ sumukhaṁ trinetraṁ jaṭādharaṁ pārvatī-vāmabhāgam ।
Sadāśivaṁ rudram-anantarūpaṁ cidambareśaṁ hṛdi bhāvayāmi ॥
भावार्थ: "जो कृपा के अगाध सागर हैं, सुंदर मुखमंडल वाले, त्रिनेत्रधारी, जटाजूट से सुशोभित हैं, जिनके वाम भाग में भगवती पार्वती विराजमान हैं; उन नित्य कल्याणकारी, अनंत रूपधारी चिदंबरेश्वर सदाशिव का मैं अपने हृदय में ध्यान करता हूँ।"
क्या आप जानते हैं?
मदुरै की रजत सभा में भगवान नटराज का विग्रह अपने सामान्य स्वरूप के विपरीत बाएं पैर पर खड़ा है और दायां पैर उठा हुआ है, जिसे राजा राजशेखर पांड्य की करुण प्रार्थना पर प्रभु ने बदला था।
चिदंबरम के कनक सभा की छत पर 21,600 स्वर्ण पत्र लगे हैं, जो मनुष्य द्वारा प्रतिदिन ली जाने वाली सांसों (अजपा गायत्री) की संख्या का प्रतीक हैं, जिन्हें 72,000 सूक्ष्म नाड़ियों की प्रतीक 72,000 स्वर्ण कीलों से जोड़ा गया है।
कोर्टालम की चित्र सभा में भगवान नटराज की कोई पाषाण या धातु की मूर्ति नहीं है, बल्कि प्राकृतिक वनस्पतियों के रंगों से बने प्राचीन भित्तिचित्रों की पूजा की जाती है।
शैव संत कारैक्काल अम्मैयार ने तिरुवालंगाडु की पावन भूमि पर अपने पैर रखना अनुचित समझा, इसलिए वे भगवान के नृत्य स्थल तक सिर के बल चलकर पहुँची थीं।
तिरुनेलवेली की ताम्र सभा की छत पूर्ण रूप से तांबे की चादरों से ढकी है, जिसमें 517 काष्ठ-नक्काशीदार आकृतियां और दिव्य गंधर्व उकेरे गए हैं।
