Bharat Devotion
Embroidered artwork for काशी पंचक्रोशी यात्रा: वाराणसी की पावन परिक्रमा: Embroidered Om symbol above a brass diya, marigolds and a temple spire at sunrise

काशी पंचक्रोशी यात्रा

वाराणसी की पावन परिक्रमा

काशी पंचक्रोशी यात्रा

वाराणसी की पावन परिक्रमा

काशी पंचक्रोशी यात्रा वाराणसी की पांच दिन की, लगभग ५० मील की परिक्रमा है, जिसके पड़ाव कर्दमेश्वर, भीमचंडी, रामेश्वर, शिवपुर और कपिलधारा हैं।

संक्षिप्त दर्शन संदर्शिका (एक दृष्टि में)

  • •
    यह क्या है: काशी (अविमुक्त क्षेत्र) की बाह्य ब्रह्मांडीय सीमा को अंकित करने वाली ५० मील (लगभग ८० किमी) की अत्यंत प्राचीन व पवित्र परिक्रमा। स्कंद पुराण के अनुसार, इस पथ पर चलना भगवान शिव के त्रिशूल पर स्थित समग्र ब्रह्मांड की प्रदक्षिणा करने के तुल्य है।
  • •
    दर्शन व जप का फल: शास्त्रोक्त फलश्रुति के अनुसार, पंचक्रोशी यात्रा से जन्म-जन्मांतर के संचित पाप भस्म हो जाते हैं, पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति (मोक्ष) मिलती है तथा साधक को शिवलोक की प्राप्ति होती है।
  • •
    कब जाएं: 'अधिक मास' (मलमास/पुरुषोत्तम मास) में यह यात्रा सर्वाधिक पुण्यप्रद मानी जाती है। इसके अतिरिक्त कार्तिक मास, महाशिवरात्रि और वैशाख शुक्ल एकादशी पर भी लाखों श्रद्धालु यह परिक्रमा करते हैं।
  • •
    कहाँ: वाराणसी (उत्तर प्रदेश), गंगा और वरुणा नदी का पावन तट। यात्रा का आरंभ और समापन मणिकर्णिका घाट पर होता है।
  • •
    विधि एवं नियम:
  • •
    संकल्प: प्रथम दिवस मणिकर्णिका घाट पर स्नान कर श्री काशी विश्वनाथ, ढुंढिराज गणेश व माता अन्नपूर्णा से यात्रा निर्विघ्न पूर्ण होने का संकल्प लें।
  • •
    पदयात्रा नियम: यह यात्रा पारंपरिक रूप से नंगे पांव (पैदल) की जाती है। इस दौरान पूर्ण ब्रह्मचर्य, मौन अथवा 'ॐ नमः शिवाय' का निरंतर जप अनिवार्य है।
  • •
    पांच प्रमुख रात्रि पड़ाव:
  1. 1.कर्दमेश्वर (लगभग १५ किमी) — कर्दम ऋषि की तपोस्थली व बिंदु सरोवर।
  2. 2.भीमचंडी (लगभग १८ किमी) — आदिशक्ति भीमचंडी देवी का धाम।
  3. 3.रामेश्वर (लगभग २२ किमी) — वरुणा तट पर प्रभु श्रीराम द्वारा स्थापित शिवलिंग।
  4. 4.शिवपुर (लगभग १७ किमी) — पांच पांडवों द्वारा स्थापित शिवलिंग समूह।
  5. 5.कपिलधारा (लगभग १० किमी) — कपिल मुनि की तपोभूमि (पितृ-तर्पण स्थल)।
  • •
    पूर्णाहुति: पांचवें/छठे दिन मणिकर्णिका घाट पर पुनः स्नान, जौ या लौंग-इलायची अर्पण, साक्षी विनायक के दर्शन व विश्वनाथ मंदिर में यात्रा समर्पण।

पौराणिक उत्पत्ति एवं शास्त्रोक्त परंपरा

स्कंद पुराण के काशी खंड के अनुसार, जिसके अध्याय १०० में श्लोक ७६ से ९५ इस यात्रा की महिमा गाते हैं, महाप्रलय के समय जब संपूर्ण सृष्टि जलमग्न हो जाती है, तब भगवान शिव अपनी त्रिशूल की नोक पर काशी क्षेत्र को धारण कर उसकी रक्षा करते हैं। इस अविमुक्त क्षेत्र की परिधि केंद्र से पांच कोस (लगभग १० मील त्रिज्या, कुल ५० मील की परिधि) तक फैली है, जिसे पंचक्रोश क्षेत्र कहा जाता है। देवाधिदेव महादेव ने स्वयं कहा है कि इस पावन परिधि में स्थित प्रत्येक शिलाखंड शिवलिंग का स्वरूप है और यहां की प्रत्येक बावली व सरोवर अमृततुल्य है।

त्रेतायुग में लंका विजय के उपरांत प्रभु श्रीराम ने ब्रह्महत्या दोष की निवृत्ति और लोकमंगल हेतु माता सीता एवं लक्ष्मण के साथ काशी की पंचक्रोशी परिक्रमा की थी तथा वरुणा तट पर 'रामेश्वर महादेव' की स्थापना की थी। द्वापर युग में अज्ञातवास व संकट काल के समय महर्षि वेदव्यास के आदेश पर पांचों पांडवों ने द्रौपदी सहित यह यात्रा पूर्ण कर शिवपुर में पांच शिवलिंगों की प्रतिष्ठा की थी।

यह यात्रा मात्र एक भौगोलिक परिक्रमा नहीं है। परिक्रमा करता हुआ तीर्थयात्री अविमुक्त क्षेत्र की रक्षक परिधि पर चलता है और संकल्प पूर्ण कर आरंभ-स्थल पर लौटता है।

प्रमुख पवित्र तीर्थ एवं मंदिर

मणिकर्णिका व काशी विश्वनाथ
क्षेत्र एवं भूगोल:केंद्रीय तीर्थ, गंगा तट
आध्यात्मिक स्वरूप व कथा:काशी का हृदय, जहां भगवान शिव मरणोपरांत तारक मंत्र प्रदान करते हैं।
उत्सव एवं अनुष्ठान:संकल्प स्नान, मंगला आरती व यात्रा पूर्णाहुति।
आध्यात्मिक महत्व:यात्रा का आदि और अंत स्थल; मोक्ष का द्वार।
कर्दमेश्वर महादेव
क्षेत्र एवं भूगोल:प्रथम पड़ाव: कंदवा (दक्षिण-पश्चिम)
आध्यात्मिक स्वरूप व कथा:१२वीं सदी का भव्य प्रस्तर मंदिर, कर्दम ऋषि का बिंदु सरोवर।
उत्सव एवं अनुष्ठान:सरोवर स्नान, बिल्वपत्र अभिषेक।
आध्यात्मिक महत्व:पितृ ऋण व कुल दोषों का निवारण।
भीमचंडी देवी
क्षेत्र एवं भूगोल:द्वितीय पड़ाव: भीमचंडी (पश्चिम)
आध्यात्मिक स्वरूप व कथा:काशी की रक्षा करने वाली उग्र व करुणामयी शक्ति का वास।
उत्सव एवं अनुष्ठान:कुंकुम अर्चन, चंडी पाठ, गंधर्व सागर स्नान।
आध्यात्मिक महत्व:समस्त आध्यात्मिक विघ्नों व तामसिक शक्तियों का नाश।
रामेश्वर महादेव
क्षेत्र एवं भूगोल:तृतीय पड़ाव: वरुणा तट (उत्तर-पश्चिम)
आध्यात्मिक स्वरूप व कथा:प्रभु श्रीराम द्वारा स्थापित पावन ज्योतिर्लिंग स्वरूप।
उत्सव एवं अनुष्ठान:वरुणा स्नान, तुलसी-बिल्व अर्पण।
आध्यात्मिक महत्व:महापातकों से मुक्ति व अंतःकरण की शुद्धि।
पंच पांडव शिवलिंग (शिवपुर)
क्षेत्र एवं भूगोल:चतुर्थ पड़ाव: शिवपुर (उत्तर)
आध्यात्मिक स्वरूप व कथा:युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल व सहदेव द्वारा स्थापित पांच लिंग।
उत्सव एवं अनुष्ठान:रुद्राभिषेक, शिव सहस्त्रनाम पाठ।
आध्यात्मिक महत्व:संकट काल में धर्म-विजय व आत्मबल की प्राप्ति।
कपिलधारा तीर्थ
क्षेत्र एवं भूगोल:पंचम पड़ाव: उत्तर-पूर्व वाराणसी
आध्यात्मिक स्वरूप व कथा:सांख्य दर्शन प्रणेता महर्षि कपिल की तपोस्थली।
उत्सव एवं अनुष्ठान:कपिल सरोवर स्नान, जौ अर्पण, पितृ तर्पण।
आध्यात्मिक महत्व:ज्ञान की प्राप्ति व पितरों की अक्षय तृप्ति।
साक्षी विनायक
क्षेत्र एवं भूगोल:विश्वनाथ मंदिर के समीप
आध्यात्मिक स्वरूप व कथा:परिक्रमा के प्रत्यक्ष साक्षी देव गणेश जी।
उत्सव एवं अनुष्ठान:मोदक व दूर्वा अर्पण, हाजिरी लगाना।
आध्यात्मिक महत्व:यात्रा के संपूर्ण पुण्य फल का प्रमाणीकरण।

संत, मनीषी एवं ऐतिहासिक परंपरा

काशी पंचक्रोशी के पावन पथ पर भारत के महानतम संतों ने अपनी चरणधूलि अर्पित की है:

  • •
    आदि शंकराचार्य (८वीं शताब्दी): परंपरा उन्हें काशी से जोड़ती है, जहां उन्होंने आत्मतत्त्व के अद्वैत स्वरूप का उपदेश दिया।
  • •
    गोस्वामी तुलसीदास (१६वीं शताब्दी): संत-कवि ने काशी में निवास कर रचना की; भक्त परंपरा उन्हें यहां के पावन तटों पर ध्यानमग्न स्मरण करती है।
  • •
    चैतन्य महाप्रभु (१६वीं शताब्दी): दिव्य प्रेम के भावोन्माद में काशी पधारे और हरिनाम-संकीर्तन से यहां की गलियों को गुंजायमान किया।
  • •
    रानी भवानी (१८वीं शताब्दी): काशी की श्रद्धालु संरक्षिका, जिन्होंने मंदिरों, कुंडों और धर्मशालाओं का निर्माण कराया।

पावन श्लोक एवं ध्यान

स्कंद पुराण के काशी खंड से उद्धृत यह पावन श्लोक परिक्रमा के समय निरंतर ध्यातव्य है:

पञ्चक्रोशी-परिक्रान्त्या ये विशन्ति विमुक्तये ।

तेषां पादाम्बुज-स्पर्शैः पुनीतेयं वसुंधरा ॥

पंचक्रोशी-परिक्रान्त्या ये विशन्ति विमुक्तये ।

तेषां पादाम्बुज-स्पर्शैः पुनीतेयं वसुंधरा ॥

"जो पुण्यात्मा जीव मोक्ष की अभिलाषा से काशी की पावन पंचक्रोशी परिक्रमा में प्रवेश करते हैं, उनके चरण-कमलों के पावन स्पर्श मात्र से यह संपूर्ण पृथ्वी पवित्र हो जाती है।"

क्या आप जानते हैं?

यात्रा के पांच रात्रि पड़ाव—कर्दमेश्वर, भीमचंडी, रामेश्वर, शिवपुर और कपिलधारा—काशी की पावन सीमा को चिह्नित करते हैं, जिस पर श्रद्धालु नंगे पांव चलते हैं।

पहले पड़ाव का कर्दमेश्वर महादेव मंदिर कर्दम ऋषि से संबद्ध बिंदु सरोवर के समीप स्थित प्रारंभिक मध्यकालीन प्रस्तर मंदिर है।

अंतिम पड़ाव कपिलधारा पर भक्तगण पवित्र कुंड में 'जौ' के दाने अर्पित करते हैं, जो भगवान शिव के चरणों में संचित कर्म-बीजों के भस्म होने का प्रतीक है।

पंचक्रोशी यात्रा तब तक पूर्ण नहीं मानी जाती जब तक भक्त विश्वनाथ मंदिर के समीप 'साक्षी विनायक' के समक्ष उपस्थित होकर अपनी हाजिरी दर्ज नहीं करा लेते।

Shiva की संपूर्ण स्तुति एवं पाठ

Shiva

Shiva के सभी पाठ देखें →