अष्ट वीरट्ट स्थलम्
भगवान शिव के आठ दिव्य विजय धाम
तमिलनाडु में अष्ट वीरट्ट स्थलम् भगवान शिव के वे आठ तीर्थ हैं जहाँ उनके पराक्रम ने आसुरी अहंकार और मृत्यु का नाश किया, भक्तों को मोक्ष देते हुए।
संक्षिप्त तीर्थ निर्देशिका (एक दृष्टि में)
- •यह क्या है: तमिलनाडु में स्थित आठ प्राचीन शैव तीर्थों की एक पावन शृंखला, जहाँ भगवान शिव ने अपने वीर्यम् (अलौकिक शौर्य व कृपा) को प्रकट कर आसुरी अहंकार, मृत्यु (काल), पाखंड और अज्ञान का समूल नाश किया था।
- •दर्शन व जप का फल: जन्मांतरों के पाप भस्म होते हैं। दीर्घायु (तिरुक्कडैयूर में आयुष् होमम्), अकाल मृत्यु से मुक्ति, आंतरिक विकारों (काम, क्रोध, मद) पर विजय और परम मोक्ष (सायुज्य मुक्ति) की प्राप्ति होती है।
- •कब जाएँ: अक्टूबर से मार्च का समय सबसे सुखद रहता है। प्रमुख उत्सवों में महाशिवरात्रि, तिरुवातिर/आरुद्रा दर्शनम्, और प्रत्येक मंदिर के संहार उत्सव सम्मिलित हैं।
- •कहाँ स्थित है: तमिलनाडु के कुड्डालोर, विल्लुपुरम, तंजावुर, मयिलादुतुरै और तिरुवारूर जिलों में कावेरी व गदिलम नदी के तटवर्ती क्षेत्रों में। निकटतम प्रमुख केंद्र चेन्नई, तिरुचिरापल्ली और मयिलादुतुरै हैं।
- •पूजा विधि व नियम:
- 1.यात्रा क्रम: उत्तर के क्षेत्रों (तिरुवदिगै/तिरुक्कोविलूर) से प्रारंभ कर कावेरी डेल्टा के मंदिरों के दर्शन करते हुए तिरुक्कडैयूर पर यात्रा पूर्ण करने की परंपरा है।
- 2.मंदिर नियम: पारंपरिक वस्त्र (पुरुषों के लिए धोती/कुर्ता, महिलाओं के लिए साड़ी/सूट) अनिवार्य हैं। चमड़े की वस्तुएँ वर्जित हैं।
- 3.पवित्र स्नान व अर्पण: मंदिर के पवित्र तीर्थों में स्नान करें। श्रीरुद्रम् या तेवारम् के पाठ के साथ विल्वपत्र, कच्चा दूध, विभूति और नीलकमल अर्पित करें।
पौराणिक उद्भव एवं शास्त्रीय परंपरा
अष्ट वीरट्ट स्थलम् (आठ दिव्य शौर्य धाम) सनातन इतिहास के वे निर्णायक मोड़ हैं जहाँ जगदाधार महादेव ने ब्रह्मांडीय संतुलन की पुनर्स्थापना की। शिव का संहार क्रोध प्रेरित नहीं, अपितु अनुग्रह (परम कृपा) से परिपूर्ण होता है, जो जीवों को अविद्या, अहंकार और माया के बंधनों से मुक्त करता है।
लिंग पुराण, शिव पुराण, स्कंद पुराण तथा पेरिय पुराणम् में इन आठ लीलाओं का विशद वर्णन है, और मार्कण्डेय प्रसंग स्वयं भागवत पुराण के बारहवें स्कंध, अध्याय 8 से 10 में दर्ज है। इन धामों पर भगवान शिव ने त्रिपुरांतक, कालसंहार मूर्ति, गजसंहार मूर्ति और वीरभद्र जैसे अत्यंत तेजस्वी रूप धारण किए।
७वीं–८वीं शताब्दी में नयनमार संतों—अप्पार, सुंदरर और तिरुज्ञान संबंदर—ने अपने तेवारम् भजनों में इन आठों क्षेत्रों की महिमा का गुणगान किया है। इन तीर्थों की यात्रा मनुष्य के समस्त अहंकार को मिटाकर शिवमय बना देती है।
आठ पावन वीरट्ट मंदिर
संत, मनीषी एवं ऐतिहासिक परंपरा
- •संत तिरुनावुक्करासर (अप्पार): असाध्य उदर शूल से पीड़ित होकर अप्पार तिरुवदिगै वीरट्टानम् आए और शिव की स्तुति करते ही पूर्ण स्वस्थ हुए।
- •संत संबंदर एवं सुंदरर: दोनों महान नयनमारों ने इन आठों मंदिरों में भक्ति रस से ओतप्रोत तेवारम् भजनों की रचना की।
- •अभिराम भट्टर: तिरुक्कडैयूर के १८वीं सदी के परम भक्त, जिन्होंने देवी के अनुग्रह से अमावस्या की रात्रि को पूर्णिमा के चंद्रमा में परिवर्तित कर दिया।
- •चोल एवं पल्लव नरेश: इन मंदिरों का भव्य पाषाण स्थापत्य और कांस्य प्रतिमाएँ चोल और पल्लव राजाओं के असीम समर्पण की प्रतीक हैं।
पावन श्लोक एवं ध्यान
संमोहनाय दुष्टानां शिष्टानां परिपालने ।
अष्टमूर्तेः पराशक्तिः वीरस्थानविहारिणी ॥
त्रैलोक्यरक्षादीक्षाय नमः कैलासवासिने ।
कालगर्वप्रणाशाय वीराधीश्वराय ते नमः ॥
भावार्थ: दुष्टों के दमन और धर्मपरायण भक्तों के रक्षण के लिए आठ वीर धामों में विचरण करने वाले अष्टमूर्ति भगवान शिव को हमारा नमन है। तीनों लोकों की रक्षा का व्रत लेने वाले, काल के गर्व का नाश करने वाले देवाधिदेव वीरेश्वर महादेव के श्रीचरणों में बारंबार प्रणाम।
क्या आप जानते हैं?
तिरुवदिगै वीरट्टानम् में पल्लव स्थापत्य का ऐसा चमत्कार है कि गर्भगृह में स्थित १६ फलकों वाले षोडश शिवलिंग की छाया कभी मंदिर प्रांगण से बाहर भूमि पर नहीं पड़ती।
तिरुक्कडैयूर संपूर्ण विश्व में दीर्घायु अनुष्ठानों जैसे षष्ठ्यब्दपूर्ति (६०वाँ वर्ष), भीमरथ शांति (७०वाँ वर्ष) एवं शताभिषेकम (८०वाँ वर्ष) के लिए सबसे प्रमुख तीर्थ माना जाता है।
वझुवूर की गजसंहार मूर्ति चोल कांस्य कला की विश्वप्रसिद्ध पराकाष्ठा मानी जाती है, जिसमें शिव को गज चर्म को फाड़कर विजयी मुद्रा में निकलते दर्शाया गया है।
जैन धर्म अपना चुके संत अप्पार का असाध्य उदरशूल रोग तिरुवदिगै में अपनी बहन द्वारा दी गई भस्म ग्रहण करने और शिव स्तुति गाने से तत्क्षण ठीक हो गया था।
तिरुक्कंडियूर में ब्रह्मा का पाँचवाँ शीश कटने के बाद शिव की हथेली से चिपक गया था, जिसके निवारण हेतु भगवान को 'भिक्षाटन' रूप में त्रिलोकी का भ्रमण करना पड़ा था।
