गुरुद्वारा हेमकुण्ड साहिब
सर्वोच्च ध्यान एवं तपस्या की पवित्र उच्च-हिमालयी हिमनद स्थली
उत्तराखंड के चमोली में सात हिममंडित शिखरों के मध्य 4,632 मीटर (15,200 फीट) की पावन ऊंचाई पर स्थित गुरुद्वारा हेमकुण्ड साहिब वह दिव्य तपोभूमि है, जिसका वर्णन दशमेश पिता श्री गुरु गोबिन्द सिंह जी ने अपने 'बचित्तर नाटक' में किया है। अपने पूर्व अवतार ऋषि दुष्ट दमन के रूप में उन्होंने यहाँ महाकाल की आराधना कर अकाल पुरख के साथ एकाकार प्राप्त किया था। इस पवित्र अमृतमयी हिमनद सरोवर में स्नान और कीर्तन-श्रवण से साधक के जन्म-जन्मांतर के पाप धुल जाते हैं और परम आत्मिक शांति की प्राप्ति होती है।
संक्षिप्त दर्शन मार्गदर्शिका (Quick Devotional Guide)
- •स्वरूप एवं तत्व: यह विश्व का सर्वाधिक ऊंचाई पर स्थित पावन गुरुद्वारा और अमृतमयी हिमनद सरोवर है, जहां दशमेश पिता श्री गुरु गोबिन्द सिंह जी महाराज ने अपने पूर्व अवतार (ऋषि दुष्ट दमन) में महाकाल की आराधना कर अकाल पुरख के साथ तादात्म्य (एकाकार) प्राप्त किया था।
- •दर्शन एवं जाप का फल: 'बचित्तर नाटक' में वर्णित इस पावन धाम की कठिन यात्रा से साधक के जन्म-जन्मांतर के संचित पाप नष्ट होते हैं, आत्मिक बल और निर्भयता प्राप्त होती है तथा चेतना में नाम-सिमरन का दिव्य प्रकाश जागृत होता है।
- •यात्रा का उत्तम समय: यह तीर्थ प्रतिवर्ष केवल 4-5 मास (मई के अंत/जून के प्रारंभ से अक्टूबर के प्रारंभ तक) दर्शनार्थ खुलता है। अगस्त-सितंबर में सरोवर के चारों ओर दुर्लभ 'ब्रह्मकमल' पुष्प खिलते हैं।
- •भौगोलिक स्थिति: चमोली जनपद, गढ़वाल हिमालय, उत्तराखण्ड। ऊंचाई: 4,632 मीटर (15,200 फीट)। मुख्य पड़ाव: गोविंदघाट (अलकनंदा तट) $\rightarrow$ घांघरिया (गोविंद धाम, 3,048 मी.)।
- •दर्शन विधि एवं नियम:
- •यात्रा क्रम: ऋषिकेश $\rightarrow$ जोशीमठ $\rightarrow$ गोविंदघाट $\rightarrow$ 13 किमी पैदल मार्ग से घांघरिया $\rightarrow$ 6 किमी खड़ी चढ़ाई से श्री हेमकुण्ड साहिब।
- •पवित्र स्नान: श्री हेमकुण्ड सरोवर के शीतल हिमनद जल में 'मूल मंतर' एवं 'वाहेगुरु' नाम का स्मरण करते हुए पावन स्नान करें।
- •परिक्रमा एवं अरदास: सरोवर व दरबार साहिब की श्रद्धापूर्वक परिक्रमा करें, नितनेम व कीर्तन श्रवण कर कड़ाह प्रसाद और गुरु के लंगर का सेवन करें।
- •मर्यादा: मस्तक को सदैव दस्तार या वस्त्र से ढंककर रखें, परिसर में जूते-चप्पल पूर्णतः वर्जित हैं तथा संपूर्ण घाटी में सात्विकता व पवित्रता अनिवार्य है।
पवित्र उत्पत्ति एवं शास्त्रीय उद्गम
श्री हेमकुण्ड साहिब की दिव्य महिमा का उद्घाटन दशम गुरु श्री गुरु गोबिन्द सिंह जी महाराज ने अपने आत्मचरित ग्रन्थ 'बचित्तर नाटक' (दसम ग्रन्थ) में किया है। गुरु साहिब अपने प्राकट्य से पूर्व की अलौकिक स्थिति का वर्णन करते हुए लिखते हैं:
$$\text{ਹੇਮ ਕੁੰਟ ਪਰਬਤ ਹੈ ਜਹਾਂ ॥ ਸਪਤ ਸ੍ਰਿੰਗ ਸੋਭਿਤ ਹੈ ਤਹਾਂ ॥}$$
$$\text{ਤਹ ਹਮ ਅਧਿਕ ਤਪਸਿਆ ਸਾਧੀ ॥ ਮਹਾਂ ਕਾਲ ਕਾਲਕਾ ਅਰਾਧੀ ॥}$$
"जहां हेमकुण्ड नामक पावन पर्वत है, जो सात बर्फानी शिखरों से सुशोभित है; वहां हमने अत्यंत गहन तपस्या की और महाकाल की अनन्य आराधना की।"
पूर्व कल्प में ऋषि दुष्ट दमन रूप में गुरु जी ने इस बर्फीले सरोवर के तट पर कई युगों तक अविचल समाधि धारण की। इस घोर तपस्या के प्रभाव से जीव और ब्रह्म का द्वैत समाप्त हो गया—"द्वै ते एक रूप ह्वै गयो"—अर्थात आत्मा का परमात्मा में पूर्ण विलय हो गया। तत्पश्चात अकाल पुरख ने उन्हें कलियुग में धर्म की स्थापना, सत्य के रक्षण और दुष्टों के दलन हेतु संसार में अवतार लेने की आज्ञा दी।
पौराणिक एवं स्थानीय आख्यानों के अनुसार, इस सरोवर को 'लोकपाल तीर्थ' भी कहा जाता है, जहां त्रेतायुग में श्री लक्ष्मण जी ने भी तपस्या की थी। सातों ओर से हिम-शिखरों (सप्तशृंग) से घिरा यह क्षेत्र अनादि काल से सिद्धों, ऋषियों और ब्रह्मज्ञानियों की साधना-स्थली रहा है।
प्रमुख पवित्र स्थल एवं देव-स्थान
सन्त परम्परा एवं ऐतिहासिक अनुसंधान
दशमेश पिता के ज्योति-जोत समाने के पश्चात लगभग दो शताब्दियों तक हेमकुण्ड साहिब का यह पावन स्थल भौगोलिक रूप से अज्ञात रहा। बीसवीं शताब्दी के आरंभ में महान सिख विद्वान और मनीषी भाई वीर सिंह जी ने अपने शोध-ग्रन्थ 'श्री कलगीधर चमत्कार' के माध्यम से 'बचित्तर नाटक' के भौगोलिक संकेतों का सूक्ष्म अध्ययन कर इस स्थल की पहचान की।
भाई वीर सिंह जी के साहित्य से प्रेरित होकर सन्त सोहन सिंह जी (टिहरी वाले) ने 1934 में अथक खोज की और सात शिखरों से घिरे इस हिमनद सरोवर को ढूंढ निकाला। इसके उपरांत बंगाल सैपर्स के हवलदार बाबा मोदन सिंह जी ने अपना संपूर्ण जीवन इस दुर्गम स्थल की सेवा में समर्पित कर दिया और यहाँ प्रथम गुरुद्वारे का निर्माण करवाया। कालांतर में भारतीय सेना के मेजर जनरल हरकीरत सिंह और मुख्य वास्तुकारों ने आधुनिक पंचकोणीय गुरुद्वारे की रचना की, जो आज संपूर्ण मानवता के लिए सर्वोच्च भक्ति और तपस्या का प्रेरणा-पुंज है।
पवित्र श्लोक एवं ध्यान मन्त्र
श्री दसम ग्रन्थ साहिब जी के बचित्तर नाटक (अध्याय ६) से उद्धृत पावन चौपाई:
ਹੇਮ ਕੁੰਟ ਪਰਬਤ ਹੈ ਜਹਾਂ ॥ ਸਪਤ ਸ੍ਰਿੰਗ ਸੋਭਿਤ ਹੈ ਤਹਾਂ ॥
ਤਹ ਹਮ ਅਧਿਕ ਤਪਸਿਆ ਸਾਧੀ ॥ ਮਹਾਂ ਕਾਲ ਕਾਲਕਾ ਅਰਾਧੀ ॥
ਇਹ ਬਿਧਿ ਕਰਤ ਤਪਸਿਆ ਭਯੋ ॥ ਦ੍ਵੈ ਤੇ ਏਕ ਰੂਪ ਹ੍ਵੈ ਗਯੋ ॥
*हेम कुंट परबत है जहां। सपत स्रिंग सोभित है तहां।
तह हम अधिक तपसिआ साधी। महां काल कालका अराधी।
इह बिधि करत तपसिआ भयो। द्वै ते एक रूप ह्वै गयो॥*
भावार्थ:
जहां सात शिखरों से सुशोभित हेमकुण्ड पर्वत विद्यमान है, वहां हमने महाकाल की घोर आराधना करते हुए सर्वोच्च तपस्या की। इस प्रकार निरंतर ध्यान और तप करते हुए जीव और ब्रह्म का द्वैत समाप्त हो गया और हम अकाल पुरख के साथ एकाकार हो गए।
क्या आप जानते हैं?
गुरुद्वारा हेमकुण्ड साहिब समुद्र तल से 4,632 मीटर (15,200 फीट) की ऊंचाई पर स्थित है, जो इसे विश्व का सबसे ऊंचाई पर स्थित गुरुद्वारा बनाता है।
इस गुरुद्वारे का विशेष पंचकोणीय डिजाइन भारतीय सेना के मेजर जनरल हरकीरत सिंह और वास्तुकार मदन मोहन सिंह द्वारा तैयार किया गया था ताकि यह 30 फीट से अधिक बर्फ के भार को सुगमता से वहन कर सके।
हेमकुण्ड साहिब के आसपास की दुर्लभ अल्पाइन घाटियों में अगस्त-सितंबर के दौरान पौराणिक 'ब्रह्मकमल' (Saussurea obvallata) के दिव्य पुष्प बहुतायत में खिलते हैं।
यह पवित्र हिमनद सरोवर वर्ष में लगभग 7 से 8 महीने पूरी तरह से बर्फ की मोटी चादर से ढका (जमा) रहता है और केवल ग्रीष्मकाल में सीमित समय के लिए खुलता है।
श्री गुरु गोबिन्द सिंह जी द्वारा रचित 'बचित्तर नाटक' में हेमकुण्ड का उल्लेख विश्व के आध्यात्मिक इतिहास के उन दुर्लभ प्रसंगों में से है जहाँ किसी सद्गुरु ने अपने पूर्व जन्म की तपोभूमि का सटीक भौगोलिक विवरण दिया है।
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