स्तवन
शाब्दिक अर्थ (Shabdartha)
स्तुति, प्रशंसा
व्युत्पत्ति एवं धातु मूल (Vyutpatti)
संस्कृत "स्तव्" (प्रशंसा करना) से — जैन परंपरा में किसी तीर्थंकर के गुणों और मुक्त अवस्था की प्रशंसा करने वाला भक्ति गीत।
आध्यात्मिक भावार्थ व संदर्भ
मंदिरों और घरों में गाया जाने वाला स्तवन मुक्त तीर्थंकर से कुछ नहीं माँगता — यह शुद्ध प्रशंसा है, जो गायक को उन्हीं गुणों की याद दिलाता है जिन्हें वह अपनी आत्मा में विकसित करना चाहता है।