एक हठी युवक ने अपनी धर्मपरायण माता की आज्ञा का उल्लंघन कर समुद्री यात्रा की। अपने कुकर्मों के कारण वह भटकता हुआ नरक में पहुँचा, जहाँ उसने अपनी तृष्णा के अंधेपन में एक पापी के सिर पर घूमते हुए तेज क्षुर-चक्र (ब्लेड) को कमल का फूल समझकर अपने सिर पर धारण कर लिया।
भिक्षु जो नहीं सुनता था
यह कथा शास्ता ने जेतवन में निवास करते समय एक हठी भिक्षु के संबंध में सुनाई, जो प्रव्रजित जीवन के समुचित आचरण में पूर्ण रूप से प्रशिक्षित होने पर भी अपने गुरुजनों की सीख मानने से इनकार करता था और घोषणा करता था कि वह केवल अपनी बुद्धि के अनुसार जिएगा। शास्ता ने उससे कहा, 'भिक्षु, यह पहली बार नहीं है कि तुम्हारी हठधर्मिता तुम्हें विनाश की ओर ले गई है,' और यह कहकर उन्होंने अतीत की यह कथा सुनाई, जो पालि त्रिपिटक में एकनिपात के वरण-वग्ग अंतर्गत जातक संख्या ८२ के रूप में संरक्षित है।
माता का तिरस्कार
काश्यप बुद्ध के काल में, वाराणसी में मित्तविंदक नामक एक व्यापारी-पुत्र रहता था। उसकी माँ एक धर्मपरायण और सदाचारिणी महिला थी, जो उसे सदैव उपोसथ व्रत रखने और सत्संग करने की प्रेरणा देती थी। किंतु वह युवक केवल धन और भोग-विलास का भूखा था। एक दिन उसने दूर समुद्र-यात्रा पर जाने का निर्णय लिया। उसकी माँ ने उसके पैर पकड़कर रोते हुए प्रार्थना की कि वह इस खतरनाक यात्रा पर न जाए। क्रोध में अंधे होकर उस दुष्ट पुत्र ने अपनी माँ के सिर पर लात मारी और उसे ठुकराकर जहाज पर चढ़ गया।
समुद्र में भटकता हुआ
यात्रा के सातवें दिन समुद्र के बीच में जहाज ऐसे रुक गया मानो किसी अदृश्य शक्ति ने उसे जकड़ लिया हो। जब जहाजियों ने तीन बार पर्चियां डालीं, तो तीनों बार दुर्भाग्य की पर्ची मित्तविंदक के नाम निकली। उसे एक बांस के तख्ते पर बांधकर समुद्र में बहा दिया गया।
मिथ्या कमलों का सभागार
अपने पूर्वजन्म के कुछ अल्प पुण्यों के कारण वह विभिन्न द्वीपों पर पहुँचा जहाँ उसने क्रमशः चार, आठ, सोलह और बत्तीस अप्सराओं के स्वर्ण-महलों का भोग किया। किंतु उसकी तृष्णा कभी शांत नहीं हुई। वह आगे बढ़ते हुए उसद नरक के द्वीप पर पहुँच गया। वहाँ उसने एक नरक-यातना भोगते प्राणी को देखा जिसके सिर पर अत्यंत तीव्र गति से घूमता हुआ धारदार क्षुर-चक्र (ब्लेड) चल रहा था और उसका रक्त बह रहा था। किंतु मित्तविंदक के पापों के अंधेपन ने उसे उस धारदार चक्र को सौ पंखुड़ियों वाला लाल कमल का सुंदर मुकुट दिखा दिया! उसने ललचाकर कहा, 'अरे भाई! यह सुंदर कमल का मुकुट मुझे दे दो।' उस दंडित प्राणी ने, यह अनुभव कर कि उसकी यातना की अवधि अब समाप्त हो चुकी है, प्रसन्नतापूर्वक वह घूमता हुआ क्षुर-चक्र मित्तविंदक के सिर पर रख दिया। उसी क्षण उसके सामने वे स्फटिक, रजत और रत्न महल कौंध गए जिनसे होकर वह गुजरा था, परंतु अब सत्य जानने में बहुत देर हो चुकी थी। तब बोधिसत्व ने, जो उस समय देवताओं के राजा के रूप में जन्मे थे, यह गाथा कही: 'स्फटिक, रजत और रत्न-महलों को पार करके, यह पाषाण-चक्र तुम पर टिक गया है, क्योंकि तुम अभी भी जीवन के बंधन से मुक्त नहीं हो।' यह कहकर बोधिसत्व अपने स्वर्गीय धाम को लौट गए, और मित्तविंदक उस भयावह मुकुट को धारण किए हुए तब तक असह्य यातना भोगता रहा जब तक उसका पाप-कर्म क्षीण नहीं हो गया, और तभी वह अपने कर्मों के अनुसार आगे बढ़ा।
शास्ता की पहचान
अपनी शिक्षा समाप्त कर शास्ता ने इस जातक की पहचान बताई: 'आज का यह हठी भिक्षु उस समय का मित्तविंदक था, और मैं स्वयं देवताओं का राजा था।'
आध्यात्मिक अंतर्दृष्टि: सिखाया गया ज्ञान
यह जातक प्रज्ञा पारमिता का उदाहरण है, तृष्णा के उस स्वरूप का जो बोध को ही विकृत कर देती है, यहाँ तक कि यातना भी वरदान प्रतीत होने लगती है। यही मित्तविंदक और यही क्षुर-चक्र जातक संख्या ३६९ (पञ्चकनिपात) में भी प्रकट होते हैं, किंतु वहाँ की कथा एक भिन्न वर्तमान-अपराध को संबोधित करती है—एक ऐसा भिक्षु जो संघ के चौदह कर्तव्यों को सिरे से नकारता है—और वहाँ बोधिसत्व एक युवा देवपुत्र के रूप में जन्म लेकर मित्तविंदक से गाथाओं में विस्तृत संवाद करते हैं, इससे पहले कि चक्र उसे कुचल डाले। इसके विपरीत, इस प्राचीन और सरल कथा में, देवताओं के राजा के रूप में जन्मे बोधिसत्व केवल एक चेतावनी भरी गाथा कहकर अपने स्वर्ग को लौट जाते हैं, और मित्तविंदक को तब तक चक्र सहन करना पड़ता है जब तक उसका पाप-कर्म समाप्त नहीं हो जाता। दोनों कथाएँ एक ही प्राचीन मूल से उपजी हैं, फिर भी प्रत्येक अपने विशिष्ट श्रोता को अपनी अलग साक्षी प्रस्तुत करती है।
क्या आप जानते हैं?
शास्त्रीय संख्या
खुद्दकनिकाय के एकनिपात में जातक संख्या ८२।
बोधिसत्व स्वरूप
स्वयं देवताओं के राजा, जो केवल एक अंतिम गाथा कहकर लौट जाते हैं—यही इसे जातक संख्या ३६९ से भिन्न बनाता है, जहाँ बोधिसत्व एक युवा देवपुत्र के रूप में मित्तविंदक से विस्तार से संवाद करते हैं।
पारमिता सिद्धि
प्रज्ञा पारमिता—तृष्णा के उस अंधीकरण का अनावरण जो नरक के अस्त्रों को भी फूल बना देता है।
प्रसिद्ध बौद्ध लोकोक्ति
'क्षुर-चक्र को कमल समझना' (चक्रं पद्मं मन्यते) बौद्ध साहित्य में भ्रम और लोभ का अमर रूपक है।
कर्म-विपाक
माता का अपमान और तृष्णा का उन्माद जीव को उसद नरक की भीषण यातनाओं में धकेल देता है।
प्रज्ञा (बुद्धि) की और कथाएँ
Buddha
बौद्ध धर्म से और
संबंधित शिक्षाएं
एक ही शिक्षा, विभिन्न परंपराओं में प्रतिध्वनित
