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Embroidered artwork for रुक्खधम्म जातक: वृक्षों का धर्म जो तूफान में भी अटल रहा: Embroidered Buddha seated in meditation on a pink lotus, with a golden dharma wheel and a white stupa in the mountains

रुक्खधम्म जातक

वृक्षों का धर्म जो तूफान में भी अटल रहा

बुद्ध के कुटुम्बियों के जल-विवाद को शांत करने हेतु जेतवन में सुनाई गई यह कथा (संख्या ७४) दर्शाती है कि अहंकारी देवता एकांत वृक्ष चुनते हैं; तूफान हर एकांत वृक्ष को उखाड़ देता है पर संगठित वन को छू नहीं पाता।

जेतवन में कुटुम्बियों का विवाद

भगवान बुद्ध ने यह कथा जेतवन विहार में तब सुनाई जब रोहिणी नदी के जल को लेकर उनके ही शाक्य और कोलिय कुटुम्बियों के बीच कटु विवाद छिड़ गया था, जिससे दोनों पक्षों को व्यर्थ कष्ट उठाना पड़ रहा था। रक्त-संबंधियों में फूट का यह खतरा देखकर बुद्ध नदी के तट पर गए, दोनों विवादी परिवारों को अपने सम्मुख बैठाया और वृक्षों की यह कथा सुनाई, जिससे यह स्पष्ट हो कि अहंकार और विभाजन अपनाने वालों का क्या हश्र होता है।

वृद्ध वैश्रवण का निधन

अतीत में, जब ब्रह्मदत्त वाराणसी में राज्य करते थे, उत्तर दिशा के महान रक्षक देवराज वैश्रवण का पुण्य क्षीण हो जाने पर निधन हो गया। देवराज शक्र ने उनके स्थान पर एक नए वैश्रवण की नियुक्ति की। नए अधिपति ने अपने सबसे पहले कार्यों में जंबूद्वीप के समस्त वृक्ष देवताओं को आदेश दिया कि वे अपने लिए उपयुक्त वृक्ष, झाड़ी या वन खोज लें, क्योंकि पुराने स्वामी के साथ ही पूर्व नियुक्तियां समाप्त हो गई थीं।

बोधिसत्व की कुटुम्बियों को सलाह

उस समय बोधिसत्व हिमालय की तराई के घने साल-वन में एक बुद्धिमान वृक्ष-देवता के रूप में जन्मे थे। खुद्दकनिकाय के एकनिपात में संख्या ७४ पर गिनी जाने वाली यह जातक-कथा तब आरंभ होती है जब बोधिसत्व अपने समस्त स्वजन देवताओं को एकत्र करके, निवास चुनने से पहले, यह सलाह देते हैं: 'प्रिय बंधुओं! जब तुम रहने योग्य वृक्ष चुनो, तो खुले मैदान या गांव के निकट अकेले खड़े किसी विशाल वृक्ष को मत चुनना, चाहे उसकी छतरी कितनी भी फैली हुई क्यों न हो। बल्कि उस वृक्ष को चुनो जो घने वन में अन्य वृक्षों के साथ सघन रूप से उगता है, जहां भूमि के नीचे जड़ें आपस में मिलती हैं और ऊपर शाखाएं एक-दूसरे का सहारा लेती हैं।'

विनम्र देवताओं ने सलाह मानी

अनेक समझदार और निरभिमानी वृक्ष-देवताओं ने इस सलाह को हृदय से स्वीकार किया और बोधिसत्व के साथ उस घने साल-वन में बस गए, मनुष्यों की दृष्टि से दूर रहकर भी सुरक्षा को प्राथमिकता दी। उन्होंने भव्य पूजा की आशा से अधिक संख्या-बल की शांत सुरक्षा को महत्व दिया।

अहंकारी देवताओं ने एकांत चुना

किंतु कुछ अहंकारी वृक्ष-देवताओं ने बोधिसत्व की सलाह का उपहास किया। उन्होंने कहा, 'हम उस अंधकारमय वन में क्यों भीड़ लगाएं जहां कोई हमें फूल-माला या धूप नहीं चढ़ाएगा? हम तो उन विशाल, एकांत वृक्षों में रहेंगे जो राजमार्गों और नगरों के बाहर स्मारकों की भांति खड़े हैं, जहां गांववाले हमें फूलों और समृद्ध भेंटों से ढक देंगे।' इस प्रकार वे खुले मैदानों और नगर द्वारों के पास अकेले खड़े विशाल वट, पीपल और शाल्मली वृक्षों में निवास करने लगे।

तूफान का आगमन

कुछ समय बाद भूमि पर एक प्रचंड तूफान आया। खुले मैदानों में बिना किसी रोक-टोक के बहती हुई प्रचंड आंधियों ने जब उन एकांत विशाल वृक्षों पर प्रहार किया, तो विनाश अवश्यंभावी था। मोटे तने सूखी शाखाओं की भांति टूट गए और भारी शाखाएं उखड़ गईं। विशाल जड़ें धरती से पूरी तरह उखड़कर बाहर आ गईं, जिससे वे महान वृक्ष भूमि पर गिर पड़े और उनमें निवास करने वाले देवता बिना आश्रय के मलबे में विलाप करने लगे।

अटूट खड़ा रहा वन

वही तूफान जब हिमालय के घने साल-वन में प्रवेश किया, तो उसकी नियति भिन्न रही। सैकड़ों वृक्ष कंधे से कंधा मिलाए खड़े थे, उनकी चोटियां एक-दूसरे के लिए हवा का प्रतिरोध कर रही थीं। उनकी जड़ें भूमि के नीचे एक अटूट जाल की भांति आपस में जुड़ी थीं। उस वन में एक भी वृक्ष नहीं उखड़ा, एक छोटी शाखा भी नहीं टूटी।

अपमानित देवता शरण मांगने आए

बेघर, भीगे और लज्जित वे देवता, जिनके निवास नष्ट हो गए थे, अपने बच्चों को साथ लेकर हिमालय पहुंचे। वहां उन्होंने वन के देवताओं को अपना दुख सुनाया, और वन के देवताओं ने यह वृत्तांत बोधिसत्व तक पहुंचाया।

बोधिसत्व का एकता-उपदेश

बोधिसत्व ने समझाया कि यह विपत्ति उन पर इसलिए आई कि उन्होंने बुद्धिमानों की सलाह नहीं मानी, और उन्होंने वह गाथा कही जिससे इस जातक का नाम 'रुक्खधम्म' (वृक्षों का धर्म) पड़ा: 'बहुत से बंधु-जन होना कल्याणकारी है, उन वृक्षों की भांति जो वन में साथ-साथ उगते हैं। हवा अकेले खड़े वृक्ष को, चाहे वह कितना ही विशाल हो, उड़ा ले जाती है; पर साथ खड़े वन को नहीं।'

बुद्ध की पहचान-उद्घोषणा

कथा समाप्त करते हुए बुद्ध ने नदी तट पर एकत्र शाक्य और कोलिय कुटुम्बियों के लिए उस जन्म की पहचान बताई: जो इस जीवन में उनके श्रद्धावान अनुयायी और शिष्य थे, वे ही उस जन्म में साल-वन के विनम्र वृक्ष-देवता थे, और जिस बोधिसत्व ने उन्हें सलाह दी, वह स्वयं बुद्ध का पूर्वजन्म था। यह सुनकर विवादी परिवार नदी के जल संबंधी झगड़े को त्यागकर आपस में शांति स्थापित करने को प्रेरित हुए।

एक उपदेश जो तूफान से भी अधिक टिकाऊ रहा

रुक्खधम्म जातक खुद्दकनिकाय के एकनिपात में 'सामग्गी' यानी सामूहिक सद्भाव के शास्त्रीय प्रतीक के रूप में आज भी जीवंत है। यह चेतावनी देता है कि सार्वजनिक प्रशंसा और एकाकी वैभव की लालसा प्राणियों को उस विनाश के मुख में धकेल देती है जिससे परस्पर सहारा उन्हें बचा सकता था, और यह प्रत्येक पाठक को—बौद्ध हो या न हो—सिखाता है कि सच्ची सुरक्षा एकांत वैभव में नहीं, बल्कि उन जड़ों में है जो एक ही धरती के नीचे एक-दूसरे को दृढ़ता से पकड़े रहती हैं।

क्या आप जानते हैं?

रुक्खधम्म जातक खुद्दकनिकाय के एकनिपात की ७४वीं प्रामाणिक कथा है।

इस कथा की आरंभिक पृष्ठभूमि जेतवन में है, जो रोहिणी नदी के जल-विवाद को लेकर शाक्य और कोलिय कुटुम्बियों के बीच हुए झगड़े को शांत करने हेतु सुनाई गई।

पुराने वैश्रवण देव के निधन और शक्र द्वारा नए अधिपति की नियुक्ति के कारण ही वृक्ष-देवताओं को नया निवास चुनने का आदेश मिला।

परस्पर जुड़ी जड़ें और शाखाएं संघ-भावना यानी सामग्गी की रक्षात्मक शक्ति का सुंदर रूपक हैं।

बुद्ध ने विनम्र साल-वन के देवताओं की पहचान अपने उपस्थित अनुयायियों से और सलाह देने वाले बोधिसत्व की पहचान स्वयं अपने पूर्वजन्म से कराई।

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