जातक क्रमांक २११: राजा ब्रह्मदत्त के बुद्धिमान दरबारी सोमदत्त (बोधिसत्व) ने अपने वृद्ध किसान पिता को राजा से एक नया बैल माँगने के लिए पूरे एक वर्ष तक श्मशान में अभ्यास कराया। किंतु राजदरबार की भव्यता देखकर घबराए वृद्ध पिता ने उलटा श्लोक पढ़ दिया: 'महाराज! मेरे दो में से एक बैल मर गया है, कृपा करके मेरा दूसरा बैल भी ले लीजिए!' बोधिसत्व के विनम्र स्पष्टीकरण से प्रसन्न होकर राजा ने वृद्ध किसान को सोलह उत्तम बैल, एक समृद्ध गाँव और जीवन भर का वस्त्र-अन्न प्रदान किया।
जेतवन में एक घबराया हुआ स्थविर
शास्ता ने जेतवन में निवास करते हुए यह कथा स्थविर लालुदायी के विषय में कही, जिन्हें भिक्षुओं में 'उदायी मूढ़' के नाम से जाना जाता था। जब भी यह स्थविर थोड़े से भी श्रोताओं के सामने बोलने उठते, घबराहट उन पर छा जाती और वे ठीक उसका विपरीत कह देते जो वे कहना चाहते थे—विवाह में अशुभ शब्द, अंत्येष्टि में अशुभ शब्द। जब भिक्षुओं ने इस विचित्र दुर्बलता पर चर्चा की, तो बुद्ध ने बताया कि यह नई बात नहीं है: लालुदायी ने यही बात एक बहुत पूर्वजन्म में भी की थी, और भिक्षुओं के अनुरोध पर उन्होंने यह कथा सुनाई।
बनारस के दरबार में एक विद्वान का उदय
अतीत काल में जब वाराणसी में राजा ब्रह्मदत्त राज्य करते थे, बोधिसत्व ने काशी राज्य के एक निर्धन ग्रामीण किसान के घर जन्म लिया। असाधारण प्रतिभा से संपन्न, वे तक्षशिला गए और तीनों वेदों तथा समस्त राजकीय विद्याओं में पारंगत हुए, किंतु घर लौटने पर उन्होंने अपने परिवार को अब भी निर्धनता में डूबा पाया। वे वाराणसी गए और राजा की सेवा में लग गए, जहाँ उनकी निष्ठा और मधुर वाणी से प्रसन्न होकर राजा ब्रह्मदत्त ने उन्हें मुख्य राजसचिव और परम प्रिय सेवक के पद पर नियुक्त किया और उन्हें 'पंडित सोमदत्त' नाम दिया।
पिता का खोया हुआ बैल
इधर सोमदत्त के वृद्ध पिता दूर के गाँव में दो बैलों की सहायता से अपना छोटा-सा खेत जोतते रहे। एक दिन अत्यधिक परिश्रम से एक बैल गिरकर मर गया, जिससे वृद्ध किसान हल नहीं चला सका। पिता राजधानी पहुँचे और पुत्र से बोले: 'प्रिय सोमदत्त! मेरा एक बैल मर गया है और मैं दूसरा खरीद नहीं सकता। तुम राजा के प्रियपात्र हो; महाराज से कहकर मुझे एक बैल दिलवा दो।' बोधिसत्व ने विनम्रता से उत्तर दिया: 'पिताजी! राजा की सेवा करने वाले निजी स्वार्थ के लिए याचना नहीं करते, इससे मर्यादा घटती है। किंतु मैं आपको राजा के सम्मुख ले चलूँगा, और आप स्वयं महाराज से निवेदन करें।' वृद्ध पिता ने स्वीकार किया कि वे अपरिचितों के सामने, राजा की तो बात ही क्या, एक वाक्य भी बोलने में अत्यंत संकोची हैं।
श्मशान में एक वर्ष का अभ्यास
यह जानकर कि उनके पिता अनपढ़ और संकोची हैं, सोमदत्त उन्हें प्रति संध्या नगर के बाहर श्मशान में ले जाते, जहाँ कोई इस अभ्यास में विघ्न न डाले। उन्होंने सुगंधित बीरण घास के पूलों को बांधकर उनके नाम 'राजा ब्रह्मदत्त', 'युवराज' और 'सेनापति' रखे। फिर उन्होंने पिता को हर पूले के सामने झुककर यह श्लोक बोलना सिखाया:
'दो बैल थे मेरे पास राजन्, जिनसे मैं जोतता था खेत;
उनमें से एक मर गया, दूसरा देने की कृपा करें सहेत!'
पूरे बारह महीनों तक वृद्ध पिता घास के पूलों के सामने झुकने और श्लोक बोलने का अभ्यास करते रहे, यहाँ तक कि वे इसे नींद में भी सही-सही बोलने लगे। संतुष्ट होकर सोमदत्त ने पिता को स्नान कराया, श्वेत वस्त्र पहनाए और राजदरबार में ले गए।
उल्टा बोला गया श्लोक
ज्यों ही वे प्रवेश किए, शंख बजे, चंवर ढुले और राजा का सुवर्ण सिंहासन मणियों से जगमगा उठा। राजसभा के असीम वैभव से भयभीत होकर वृद्ध पिता का हृदय धड़कने लगा, घुटने कांपने लगे, और श्लोक की पंक्तियाँ दिमाग से उड़ गईं। राजा ने पूछा कि यह व्यक्ति कौन है, तो सोमदत्त ने बताया कि यह उनके पिता हैं। वृद्ध पिता ने वर्ष भर अभ्यास किया हुआ श्लोक बोलना आरंभ किया—किंतु घबराहट में अंतिम पंक्ति ठीक विपरीत निकल गई:
'दो बैल थे मेरे पास राजन्, जिनसे मैं जोतता था खेत;
उनमें से एक मर गया, दूसरा भी आप ले लें सहेत!'
राजा की हंसी और सोमदत्त की बुद्धि
यह सुनकर पूरी राजसभा स्तब्ध रह गई। राजा ब्रह्मदत्त मुस्कुराए और सोमदत्त से विनोद करते हुए बोले: 'सोमदत्त! लगता है तुम्हारे घर में बैलों की कोई कमी नहीं है, तभी तुम्हारे पिता राजदरबार में हमें बैल दान करने आए हैं!' बोधिसत्व ने हाथ जोड़कर अत्यंत शालीनता से उत्तर दिया: 'महाराज! दानी पुरुष का यही स्वभाव होता है कि जो कुछ बचता है, वह उसे भी समर्पित कर देता है। मेरे भोले पिता जानते हैं कि धर्मात्मा राजा के पास याचक बनकर नहीं, दाता बनकर आना चाहिए। इसलिए घर में जो एक बैल बचा था, वे वही आपके चरणों में अर्पित कर रहे हैं!' सोमदत्त की इस हाजिरजवाबी और पिता के भोलेपन पर राजा ब्रह्मदत्त ठहाका मारकर हंस पड़े। राजा ने तत्काल घोषणा की: 'इन भले वृद्ध को एक नहीं, बल्कि सोने के सींगों वाले सोलह हट्टे-कट्टे श्वेत बैल दिए जाएँ! इन्हें एक समृद्ध गाँव, सोलह गाड़ियाँ अनाज और जीवन भर के लिए राजकीय वस्त्र प्रदान किए जाएँ—और श्वेत सिंधी अश्वों से जुते रथ पर घर भेजा जाए!'
पुत्र की सौम्य चुटकी
घर लौटते समय सोमदत्त अपने पिता को चुटकी लेने से नहीं रुक सके: 'पिताजी! मैंने आपको पूरे एक वर्ष तक सिखाया, और जिस क्षण महत्वपूर्ण था उसी क्षण आपने वही बैल राजा को दे दिया जिसे बचाने आए थे!' वृद्ध पिता इस विनोद से तनिक भी विचलित नहीं हुए और अपने अप्रत्याशित सौभाग्य से आनंदित होकर हास्यपूर्वक उत्तर दिया कि राजा की उदारता ने उनकी याचना की मूल भावना को शब्दों से कहीं बेहतर ढंग से पूरा कर दिया है। लज्जित होने के बजाय, पिता संतुष्ट होकर घर लौटे; उनकी निश्छल सरलता और पुत्र की तीव्र चतुराई ने मिलकर घबराहट के एक क्षण को जीवन भर की समृद्धि में बदल दिया।
बुद्ध की पहचान
कथा समाप्त करते हुए शास्ता ने जन्मों की पहचान बताई: वह संकोची, हकलाता हुआ पिता स्वयं स्थविर लालुदायी थे, जो इस जन्म में भी वही कहने की आदत रखते हैं जो वे कहना नहीं चाहते; और वह चतुर पुत्र सोमदत्त, जिसने पिता की भूल को राजकीय अनुग्रह में बदल दिया, वे स्वयं बोधिसत्व थे—एक पूर्वजन्म में बुद्ध।
क्या आप जानते हैं?
सोमदत्त जातक (क्रमांक २११) पालि तिपिटक की सर्वाधिक मनोरंजक और हृदयस्पर्शी हास्य कथाओं में से एक है, जो पितृभक्ति और ग्रामीण सरलता को उजागर करती है।
घास के पूलों को राजदरबारी मानकर श्मशान में एक वर्ष तक भाषण का अभ्यास कराना प्राचीन भारत की मौखिक वक्तृत्व कला और शिक्षण पद्धति पर प्रकाश डालता है।
समवधान में भगवान बुद्ध ने उस घबराए हुए भोले पिता की पहचान थेर लालुदायी के पूर्व-जन्म के रूप में की, और पंडित सोमदत्त स्वयं बोधिसत्व थे।
बोधिसत्व की कूटनीतिक वाकपटुता — प्रज्ञा (बुद्धि/चतुराई) का वह गुण जिसके अंतर्गत यह जातक पारंपरिक रूप से रखा जाता है — एक लज्जाजनक भूल को भी सर्वोच्च दानशीलता के गौरव में बदल देती है; ध्यान रहे कि कृतज्ञता शब्द का अर्थ उपकार को पहचानना है, केवल 'पितृभक्ति' नहीं।
यह कथा प्राचीन गांगेय मैदानी कृषि-जीवन का प्रामाणिक चित्र प्रस्तुत करती है, जहाँ एक मात्र हल-बैल की मृत्यु पूरे किसान परिवार के लिए भुखमरी का कारण बन जाती थी।
प्रज्ञा (बुद्धि) की और कथाएँ
विषय के अनुसार खोजें
Buddha
बौद्ध धर्म से और
संबंधित शिक्षाएं
एक ही शिक्षा, विभिन्न परंपराओं में प्रतिध्वनित
