Bharat Devotion
Embroidered artwork for पंच प्रयाग: गढ़वाल के पाँच पावन नदी संगम: Embroidered Om symbol above a brass diya, marigolds and a temple spire at sunrise

पंच प्रयाग

गढ़वाल के पाँच पावन नदी संगम

पंच प्रयाग

गढ़वाल के पाँच पावन नदी संगम

पंच प्रयाग गढ़वाल में अलकनन्दा के पाँच संगम हैं: विष्णुप्रयाग, नन्दप्रयाग, कर्णप्रयाग, रुद्रप्रयाग और देवप्रयाग, जहाँ गंगा का प्राकट्य है।

संक्षिप्त तीर्थ निर्देशिका (एक दृष्टि में)

  • •
    यह क्या है: पंच प्रयाग गढ़वाल हिमालय में पवित्र माँ गंगा के प्राकट्य और क्रमिक संगम की पावन यात्रा है। बद्रीनाथ के ऊपर सतोपंथ हिमनद से उतरती पावन अलकनन्दा पाँच संगमों पर अन्य नदियों से मिलती है: विष्णुप्रयाग (धौलीगंगा), नन्दप्रयाग (नन्दाकिनी), कर्णप्रयाग (पिण्डर), रुद्रप्रयाग (मन्दाकिनी) और देवप्रयाग (भागीरथी), जहाँ इसे विधिवत 'गंगा' नाम प्राप्त होता है।
  • •
    दर्शन व जप का फल: भक्त परंपरा के अनुसार इन संगमों पर पवित्र स्नान और पितृ तर्पण करने से जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति में सहायता मिलती है, पितृ-ऋण का भार हल्का होता है तथा महान पुण्य प्राप्त होता है।
  • •
    कब जाएं: मई से जून तथा सितंबर से नवंबर का समय सर्वोत्तम है। जुलाई-अगस्त में वर्षा ऋतु और दिसंबर-फरवरी में अत्यधिक ठंड रहती है।
  • •
    कहाँ स्थित है: गढ़वाल मंडल, उत्तराखंड, भारत। यह तीर्थ मार्ग ऋषिकेश-बद्रीनाथ राजमार्ग पर चमोली, रुद्रप्रयाग और टिहरी गढ़वाल जनपदों में विस्तृत है।
  • •
    पूजा व स्नान विधि:
  • •
    क्रम: प्रायः विष्णुप्रयाग से देवप्रयाग की ओर अथवा चारधाम यात्रा के दौरान आरोही क्रम में संगम स्नान किया जाता है।
  • •
    स्नान विधि: आचमन करें, गंगा गायत्री या गंगा स्तोत्र का जप करते हुए तीन डुबकी लगाएं और सूर्य देव को अर्घ्य दें।
  • •
    तर्पण विधि: दक्षिण दिशा की ओर मुख करके कुश और तिल युक्त जल से पितरों को तृप्त करें।
  • •
    नियम: पारंपरिक मर्यादित वस्त्र धारण करें। घाटों और मंदिरों के पास चमड़े की वस्तुओं से बचें।

पावन उद्गम एवं पौराणिक पृष्ठभूमि

भागवत पुराण के स्कंध ९, अध्याय ९ में कही गई कथा के अनुसार, जब महाराज सगर के साठ हजार पुत्रों के उद्धार हेतु माँ गंगा ने स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतरित होना स्वीकार किया, तब उनके प्रचंड वेग को धारण करने के लिए भगवान शिव ने उन्हें अपनी जटाओं में समेट लिया। तत्पश्चात गंगा की पावन धाराएं जगत को पवित्र करने हेतु प्रवाहित हुईं।

उत्तराखंड की देवभूमि में भगवान विष्णु से संबद्ध अलकनन्दा अलकापुरी हिमनद से उतरती हैं। नीचे उतरते हुए वे पाँच संगमों पर ऋषियों, राजाओं और देवताओं की तपस्या की स्मृति समेटती हैं। विष्णुप्रयाग में देवर्षि नारद की तपस्या, नन्दप्रयाग में राजा नन्द का यज्ञ, कर्णप्रयाग में दानवीर कर्ण की सूर्य साधना, रुद्रप्रयाग में भगवान शिव का रुद्र तांडव व नारद को संगीत उपदेश, और अंततः देवप्रयाग में महाराज भगीरथ की तपस्या पूर्ण हुई।

देवप्रयाग में महाराज भगीरथ की तपस्या का स्मरण होता है, जहाँ अलकनन्दा और भागीरथी मिलती हैं। यहाँ से एकाकार नदी 'गंगा' कहलाती है और भारतवर्ष के मैदानों की ओर आगे बढ़ती है।

पाँच पावन संगम एवं तीर्थ स्थल

विष्णुप्रयाग
क्षेत्र व भूगोल:अलकनन्दा एवं धौलीगंगा संगम, चमोली जनपद
पौराणिक स्वरूप व कथा:नारद मुनि ने यहाँ भगवान विष्णु की उपासना की; संगम पर अष्टकोणीय विष्णु मन्दिर है।
मुख्य अनुष्ठान व पर्व:घाटों पर स्नान, एकादशी पर विष्णु सहस्रनाम पाठ।
आध्यात्मिक महत्त्व:अहंकार का नाश और भगवान नारायण के चरणों में अनन्य भक्ति की प्राप्ति।
नन्दप्रयाग
क्षेत्र व भूगोल:अलकनन्दा एवं नन्दाकिनी संगम, चमोली जनपद
पौराणिक स्वरूप व कथा:राजा नन्द के नाम पर, जिन्हें यहाँ पुत्र का वरदान मिलने की स्मृति है।
मुख्य अनुष्ठान व पर्व:गोपाष्टमी एवं श्रीकृष्ण जन्माष्टमी; गोपाल मन्दिर पूजन।
आध्यात्मिक महत्त्व:संतान सुख, पारिवारिक शांति और चित्त की निर्मलता का वरदान।
कर्णप्रयाग
क्षेत्र व भूगोल:अलकनन्दा एवं पिण्डर संगम, चमोली जनपद
पौराणिक स्वरूप व कथा:योद्धा कर्ण ने यहाँ सूर्य देव की आराधना कर उनका आशीर्वाद पाया, ऐसी स्मृति है।
मुख्य अनुष्ठान व पर्व:प्रातःकालीन सूर्य अर्घ्य; नवरात्रि में उमा देवी मन्दिर में पूजन।
आध्यात्मिक महत्त्व:सूर्य दोष निवारण, दानशीलता, आंतरिक तेज और निर्भयता की प्राप्ति।
रुद्रप्रयाग
क्षेत्र व भूगोल:अलकनन्दा एवं मन्दाकिनी संगम, रुद्रप्रयाग जनपद
पौराणिक स्वरूप व कथा:परंपरा है कि भगवान शिव ने नारद मुनि को नाद ब्रह्म का ज्ञान दिया।
मुख्य अनुष्ठान व पर्व:महाशिवरात्रि जागरण; संगम के ऊपर स्थित शिव मन्दिर में रुद्राभिषेक।
आध्यात्मिक महत्त्व:क्रोध पर विजय, संगीत व वाणी की सिद्धि, शिव-शक्ति कृपा।
देवप्रयाग
क्षेत्र व भूगोल:अलकनन्दा एवं भागीरथी संगम, टिहरी गढ़वाल जनपद
पौराणिक स्वरूप व कथा:भगीरथ की तपस्या की स्मृति; रघुनाथ मन्दिर श्रीराम को समर्पित है, जिन्होंने यहाँ तप किया, ऐसी मान्यता है।
मुख्य अनुष्ठान व पर्व:गंगा दशहरा, मकर संक्रांति स्नान और ब्रह्मकुण्ड तथा वशिष्ठ कुण्ड पर पितृ कर्म।
आध्यात्मिक महत्त्व:गंगा का वास्तविक प्राकट्य स्थल; अक्षय पुण्य और मोक्ष दायिनी भूमि।

संत, मनीषी एवं ऐतिहासिक परम्परा

पंच प्रयाग अनादि काल से तीर्थयात्रा और तपस्या का मार्ग रहा है। परंपरा महर्षि वशिष्ठ और नारद को इन तटों पर ध्यानमग्न स्मरण करती है। आठवीं शताब्दी के संत-दार्शनिक आदि शंकराचार्य को कर्णप्रयाग के उमा देवी मन्दिर और गढ़वाल हिमालय में उपासना के पुनरुद्धार के लिए स्मरण किया जाता है।

आधुनिक युग में स्वामी विवेकानन्द सन् १८९० की अपनी हिमालय यात्रा में कर्णप्रयाग में ठहरे थे, ऐसा स्मरण किया जाता है। विष्णुप्रयाग का अष्टकोणीय विष्णु मन्दिर इन्दौर की महारानी द्वारा निर्मित माना जाता है, और पीढ़ियों के भक्तों ने पाँचों संगमों के घाटों और मन्दिरों को सँजोया है।

पावन स्तोत्र एवं ध्यान

पंच प्रयाग में स्नान और पूजन के समय आद्य शंकराचार्य के नाम से प्रसिद्ध गंगा स्तोत्र का प्रथम श्लोक पठनीय है:

देवि सुरेश्वरि भगवति गङ्गे त्रिभुवनतारिणि तरलतरङ्गे ।

शङ्करमौलिविहारिणि विमले मम मतिरास्तां तव पदकमले ॥

"हे देवताओं की स्वामिनी भगवती गंगे, तीनों लोकों को तारने वाली, चंचल तरंगों वाली, शिव के मस्तक पर विहार करने वाली निर्मल माँ! मेरा मन आपके चरण-कमलों में स्थिर रहे।"

क्या आप जानते हैं?

देवप्रयाग वह स्थान है जहाँ अलकनन्दा और भागीरथी मिलती हैं और संयुक्त नदी 'गंगा' कहलाती है।

विष्णुप्रयाग संगम के दोनों ओर दो विशाल पर्वत हैं, जिन्हें परंपरा से वैकुंठ के द्वारपाल 'जय' और 'विजय' का नाम दिया गया है।

देवप्रयाग में प्राचीन रघुनाथ मन्दिर है, और यह नगर आलवार संतों द्वारा स्तुत 108 दिव्य देशमों में गिना जाता है।

रुद्रप्रयाग में 'नारद शिला' स्थित है, जिसे देवर्षि नारद की ध्यान-स्थली के रूप में स्मरण किया जाता है।

देवप्रयाग में मिलते समय दोनों नदियों के रंग प्रायः भिन्न दिखते हैं: भागीरथी स्वच्छ हरी और अलकनन्दा गहरी नीली-स्लेटी।

Shiva की संपूर्ण स्तुति एवं पाठ

Shiva

Shiva के सभी पाठ देखें →