Bharat Devotion

दोहा

शाब्दिक अर्थ (Shabdartha)

एक तुकांत दोहरा छंद

व्युत्पत्ति एवं धातु मूल (Vyutpatti)

प्राकृत/अपभ्रंश 'दोहा' से — हिंदी और अवधी भक्ति-काव्य में प्रचलित दो-पंक्ति का तुकांत छंद।

आध्यात्मिक भावार्थ व संदर्भ

एक संक्षिप्त, स्वतः पूर्ण दो-पंक्ति पद्य — हनुमान चालीसा जैसे स्तोत्र दोहे से आरंभ और समापन करते हैं, जो मुख्य पदों को संकल्प या आशीर्वाद के कथन से घेरता है।

प्रमुख दोहा पाठ व भजन

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दोहे

यह एक प्रसिद्ध भक्ति दोहा है जो गुरु की महिमा को गोविंद (भगवान) से भी ऊपर बताता है।

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दोहे

कबीर के नाम से प्रचलित यह दोहा सिखाता है कि दूसरों में बुराई खोजने से पहले अपने मन को देखो; भीतर झाँकने पर अपनी ही कमी सबसे बड़ी दिखती है।

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दोहे

यह एक छोटा सा दोहा है जो हमें सिखाता है कि हमें ऐसी वाणी बोलनी चाहिए जो दूसरों को शीतलता और सुकून दे, और खुद भी शीतल बने रहें। इसमें अहंकार को त्यागने और विनम्रता से बोलने की सीख दी गई है।

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दोहे

यह एक प्रसिद्ध दोहा है जो हमें सिखाता है कि जो काम कल करना है, उसे आज करो, और जो आज करना है, उसे अभी करो। क्योंकि पल भर में प्रलय आ सकती है, फिर करने का समय नहीं मिलेगा।

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दोहे

यह एक छोटा सा दोहा (दो पंक्तियों की कविता) है, जो हमें सिखाता है कि धैर्य से सब कुछ होता है। जैसे माली पानी डालता है, लेकिन फल ऋतु आने पर ही लगता है, वैसे ही हमें मन को शांत रखकर प्रतीक्षा करनी चाहिए।

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दोहे

कबीर का प्रसिद्ध दोहा (दोहावली 210): पोथियाँ पढ़-पढ़कर संसार थक गया, पर पंडित वही है जो प्रेम के ढाई आखर पढ़ ले।

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दोहा का उल्लेख इन लेखों में