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Embroidered artwork for घट जातक: घटपण्डित का राजा कान्हा हेतु शोक-निवारण: Embroidered Buddha seated in meditation on a pink lotus, with a golden dharma wheel and a white stupa in the mountains

घट जातक

घटपण्डित का राजा कान्हा हेतु शोक-निवारण

शोकग्रस्त राजा कान्हा खरगोश और फिर चंद्रमा का खरगोश मांगते हैं; भाई घटपण्डित दिखाते हैं कि असंभव के लिए रोना, मृतक के लिए रोने से कम पागलपन नहीं।

द्वारवती के दस राजकुमार भाई

प्राचीन काल में समृद्ध समुद्रतटीय नगरी द्वारवती (द्वारका) में दस अंधक-वेण्हू (वृष्णि) राजकुमार राज्य करते थे, जिनमें सबसे बड़े राजा कान्हा (कृष्ण) थे और सबसे प्रबुद्ध उनके छोटे भाई घटपण्डित (बोधिसत्व) थे। दसों भाइयों ने अपने पराक्रम और विवेक से अपने शत्रुओं को परास्त कर एक विशाल और शांतिपूर्ण साम्राज्य की स्थापना की थी।

असहनीय शोक जिसे कोई मंत्री शांत न कर सका

कुछ समय पश्चात, राजा कान्हा के परम प्रिय युवा पुत्र की एक आकस्मिक असाध्य रोग से मृत्यु हो गई। पुत्र-शोक में राजा अपनी सुध-बुध खो बैठे। उन्होंने अपना राजमुकुट और बहुमूल्य वस्त्र फेंक दिए और धूल भरी भूमि पर लोट-लोटकर छाती पीटते हुए विलाप करने लगे: 'हाय मेरे प्यारे बच्चे! तुम अपने असहाय पिता को छोड़कर कहां चले गए? तुम्हारे बिना यह जीवन अंधकारमय है!' कई सप्ताह बीत गए; राजा ने अन्न-जल त्याग दिया, राजकाज छोड़ दिया और दिन-रात अपने कक्ष में पड़े रोते रहे।

मंत्रियों और अन्य भाइयों ने उन्हें समझाने का बहुत प्रयास किया, किंतु राजा का विलाप और अधिक बढ़ जाता था। यह देखकर कि राजा शोक के कारण मृत्यु के कगार पर पहुंच रहे हैं, घटपण्डित ने विचार किया: 'साधारण उपदेशों से मोह की इस गहरी खाई को नहीं पाटा जा सकता। केवल एक तीव्र मनोवैज्ञानिक आघात ही इनके अज्ञान को तोड़ सकता है।'

पागलपन का नाटक और चंद्रमा का खरगोश

घटपण्डित ने तुरंत अपने बाल बिखरा लिए, फटे-पुराने वस्त्र पहने, माथे पर राख मली और द्वारवती की सड़कों पर पागलों की तरह दौड़ते हुए आकाश की ओर देखकर जोर-जोर से चिल्लाने लगे: 'मुझे खरगोश दो! अरे नगरवासियों, मुझे खरगोश पकड़कर दो! यदि मुझे खरगोश नहीं मिला तो मैं मर जाऊंगा!'

नगर में हाहाकार मच गया कि परम ज्ञानी घटपण्डित पागल हो गए हैं। यह समाचार राजमहल में राजा कान्हा तक पहुंचा: 'महाराज! आपके परम बुद्धिमान भाई घट का मानसिक संतुलन बिगड़ गया है! वे सड़कों पर रो-रोकर खरगोश मांग रहे हैं!' अपने प्रिय भाई के पागल होने का समाचार सुनकर राजा का अपना शोक क्षण भर के लिए दब गया। वे तुरंत उठकर चौक में पहुंचे, घट के कंधे पकड़कर बोले: 'भाई घट! संभलो! तुम तो हमारे कुल के सबसे बड़े ज्ञानी हो! तुम इस प्रकार खरगोश के लिए क्यों विलाप कर रहे हो? मैं द्वारवती का राजा हूं! मेरे शिकारी जंगलों से तुम्हारे लिए हजारों सुनहरे, रूपहले और चितकबरे खरगोश पकड़ लाएंगे!'

घटपण्डित ने जोर-जोर से सिर हिलाया और पूर्णिमा के चमकते हुए चंद्रमा की ओर उंगली उठाकर रोते हुए कहा: 'भ्राता! मुझे जंगल का कोई साधारण खरगोश नहीं चाहिए! मुझे वह खरगोश चाहिए जो उस चंद्रमा के भीतर बैठा है! आकाश में हाथ डालकर उस चंद्रमा के खरगोश को निकाल लाओ और मुझे दे दो! यदि वह नहीं मिला, तो मैं रो-रोकर अपने प्राण त्याग दूंगा!'

राजा कान्हा ने चकित होकर कहा: 'भाई! तुम्हारा शोक तुम्हारी मति हर ले गया है! चंद्रमा तो आकाश में करोड़ों कोस दूर है, जिसे कोई मनुष्य या देवता भी कभी छू नहीं सकता! तुम एक सर्वथा असंभव वस्तु के लिए रो रहे हो!'

गहरा शोक उजागर

उसी क्षण घटपण्डित का पागलपन समाप्त हो गया। वे शांत और गंभीर मुद्रा में सीधे खड़े हो गए और मेघगर्जना के समान स्वर में बोले: 'हे राजा कान्हा! आप मुझे इसलिए पागल कह रहे हैं क्योंकि मैं चंद्रमा के खरगोश के लिए रो रहा हूं। किंतु वह चंद्रमा तो आकाश में प्रत्यक्ष दिखाई देता है; उसका रूप सत्य है और संसार का प्रत्येक बच्चा उसे देख सकता है! किंतु हे राजन! आप उस मरे हुए पुत्र के लिए रात-दिन रो रहे हैं जिसकी देह चिता पर जलकर राख हो चुकी है, जिसका धुआं शून्य में विलीन हो चुका है और जिसे ब्रह्मांड की कोई भी शक्ति दोबारा जीवित नहीं कर सकती! अब आप ही बताइए, हम दोनों में से बड़ा मूर्ख और सच्चा पागल कौन है—वह जो आकाश में दिखने वाली वस्तु के लिए रोता है, या वह जो राख बन चुके शव के लिए रोता है?'

यह सुनते ही राजा कान्हा के हृदय पर ज्ञान का वज्रपात हुआ। मोह और अज्ञान का सारा कुहासा क्षण भर में छंट गया। राजा ने एक गहरी सांस ली, अपने आंसू पोंछे और अपने छोटे भाई के चरणों में झुककर कहा: 'हे घट! तुम वास्तव में आत्मा के महान वैद्य हो! जैसे कोई जलती हुई आग को शीतल जल से बुझा दे, वैसे ही तुम्हारे वचनों ने मेरे हृदय के शोक की ज्वाला को शांत कर दिया है। तुमने मेरे मन में फंसे शोक के विषैले बाण को निकाल फेंका है!'

सिंहासन पर पुनः राजा

राजा कान्हा ने स्नान किया, राजसी वस्त्र धारण किए और पुनः सिंहासन पर बैठकर न्यायपूर्वक शासन करने लगे, जबकि घटपण्डित ने धर्म की ज्योति को सदैव प्रज्वलित रखा।

शास्त्रीय प्रमाण

यह आख्यान पालि त्रिपिटक के खुद्दक निकाय में, जातक-ग्रंथ के दसकनिपात (दस गाथाओं के विभाग) में, 'घट जातक' संख्या ४५४ के रूप में संरक्षित है। कथा के अंत में बुद्ध ने जन्मों की पहचान बताई: शोकग्रस्त भाई के पास सूचना ले जाने वाले सेवक रोहिणेय उस जन्म में आनंद थे; शोकग्रस्त राजा कान्हा सारिपुत्र थे; और सांत्वना देने वाले घटपण्डित स्वयं बुद्ध थे।

क्या आप जानते हैं?

घट जातक बौद्ध त्रिपिटक में प्राचीन कृष्ण-वासुदेव (कान्हा) और दस अंधक-वेण्हू भाइयों की प्रसिद्ध परंपरा का बौद्ध रूपांतरण प्रस्तुत करता है।

'चंद्रमा के खरगोश' (शश-लांछन) को मांगने की मनोवैज्ञानिक युक्ति प्रसिद्ध 'सस जातक' (३१६) के आकाशीय रूपक की सुंदर अनुगूंज है।

यह कथा मृत्यु की अटल अपरिवर्तनीयता का बोध कराकर प्रियजन के वियोग के घातक शोक से मुक्त होने का श्रेष्ठ साधन सिखाती है।

घटपण्डित द्वारा पागलपन का अभिनय करना बौद्ध दर्शन में 'उपाय-कौशल' (कुशल साधन) का अत्यंत प्रभावशाली उदाहरण है।

अंत में बुद्ध ने बताया कि सेवक रोहिणेय आनंद थे, शोकग्रस्त राजा कान्हा सारिपुत्र थे, और ज्ञानदाता घटपण्डित स्वयं तथागत बुद्ध थे।

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