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Embroidered artwork for कपोत जातक: संयमी कबूतर और पेटू कौआ: Embroidered Buddha seated in meditation on a pink lotus, with a golden dharma wheel and a white stupa in the mountains

कपोत जातक

संयमी कबूतर और पेटू कौआ

संतुष्ट कबूतर पेटू कौए को व्यापारी की रसोई से मांस चुराने से मना करता है; अनसुना करने पर कौए के पंख नुचते हैं, जलते मसाले मले जाते हैं, और वह अपने ही लोभ से मर जाता है।

व्यापारी की रसोई में कबूतर की करुणा

प्राचीन काल में जब राजा ब्रह्मदत्त वाराणसी में राज्य करते थे, तब बोधिसत्व एक शांत, संयमी और प्रज्ञावान कबूतर के रूप में उत्पन्न हुए। एक धनी व्यापारी के रसोइए ने उस कबूतर के सौम्य स्वभाव से प्रसन्न होकर रसोई की छत पर उसके लिए एक सुंदर टोकरी टांग दी थी, जिसमें वह विश्राम करता था और दिन में वन में जाकर घास के बीज चुगता था।

लोभी कौए की चापलूसी

एक दिन एक लोभी, पेटू कौए ने रसोई के झरोखों से भुने हुए मांस और मछली की सुगंध सूंघी। वह कबूतर के पीछे-पीछे आ गया और व्यापारी की मेज़ के लिए तैयार किए जा रहे भोजन तक पहुँचने के लोभ में, चिकनी-चुपड़ी बातें बनाकर कबूतर का मित्र बन गया। बोधिसत्व ने उसके लोभ को पहचानकर समझाया: 'मित्र! हम दोनों का स्वभाव भिन्न है। हम कबूतर दाना चुगते हैं और किसी की चोरी नहीं करते, जबकि कौवे मांस के भूखे होते हैं। दूसरों की रसोई में लोभवश प्रवेश करना प्राणलेवा हो सकता है।'

पेट-दर्द का बहाना

कौए ने ऊपरी मन से सहमति जताई, परंतु अगले दिन जब कबूतर वन जाने लगा, तो कौए ने पेट दर्द का बहाना बना दिया: 'हाय भाई! मेरे उदर में तीव्र पीड़ा है; तुम आगे जाओ, मुझे इस गरम टोकरी में विश्राम करने दो।' कबूतर ने उसे पुनः सचेत किया: 'सावधान! अपने उदर को अपना वधिक मत बनने दो!' कबूतर के जाते ही रसोइया मसालेदार मांस की उबलती हांडी मेज़ पर रखकर मसाले लेने भंडार-गृह में गया।

हांडी में पकड़ा गया

कौआ तुरंत झपटा, अपनी चोंच उबलते बर्तन में डुबोई और मांस का बड़ा टुकड़ा खींचने लगा, जिससे भारी ढक्कन खनककर गिर पड़ा। आवाज सुनते ही रसोइया दौड़ा आया, द्वार बंद कर दबोच लिया। अपना भोजन बिगड़ने के क्रोध में रसोइए ने कौए के शरीर का एक-एक पंख नोच डाला, जब तक कि उसकी गुलाबी त्वचा पूर्णतः नग्न न हो गई।

चोरी के बदले कटु लेप

फिर गीली अदरक और सफेद राई को एक सड़े हुए खजूर के साथ पीसकर रसोइए ने यह जलता हुआ मिश्रण एक ठीकरे से कौए के नग्न शरीर के हर रोएँ में मल दिया, प्रत्येक रगड़ के साथ नया घाव करते हुए। अंत में उसने एक दूसरा ठीकरा डोरी से कौए के गले में बांध दिया और उसे टोकरी में फेंक कर उसकी पीड़ा में छोड़ दिया।

पांच गाथाएं लोभ के मूल्य पर

संध्या समय जब बोधिसत्व लौटे, तो उन्होंने कौए को रक्त और नमक के बीच भयंकर पीड़ा में छटपटाते देखा। बोधिसत्व ने शोकपूर्ण वैराग्य से गाथाएं कहीं—पक्षियों को वह भोजन नहीं लेना चाहिए जो मनुष्य भोगता है; जो मित्र की हितकारी वाणी की उपेक्षा कर अपनी जिह्वा का दास बनता है, वह इसी प्रकार दुर्गति को प्राप्त होता है, जैसे यह दुर्भागी कौआ अपनी ही मूढ़ता से पंखहीन और लेपित पड़ा है। यह कहते हुए कि बुरी आदतें, एक बार अपना ली जाएं, तो प्राण जाने पर भी छोड़ना कठिन होता है, बोधिसत्व शांत वन की ओर उड़ गए। कौआ अपने घावों और अपने ही लोभ के भार तले उठ न सका, और टोकरी में वहीं प्राण त्याग गया।

शास्त्रीय प्रमाण

यह आख्यान पालि त्रिपिटक के खुद्दक निकाय में, जातक-ग्रंथ के पञ्चकनिपात में, 'कपोत जातक' संख्या ३७५ के रूप में संरक्षित है—यह पांच-गाथा कथाओं के इस पंचम पुस्तक का अंतिम जातक है। यह संग्रह के आरंभिक भाग के एक छोटे, स्वतंत्र जातक संख्या ४२ के साथ नाम और मुख्य दो पात्र साझा करता है, जिसमें वही संतुष्ट कबूतर और वही लोभी कौआ एक भिन्न घराने की रसोई में प्रकट होते हैं; दोनों विषय में संबंधित हैं परंतु पृथक शास्त्रीय पाठ हैं, प्रत्येक की अपनी पांच या छह गाथाएं और कौए के विनाश की अपनी कथा है।

क्या आप जानते हैं?

यह आख्यान खुद्दकनिकाय के पञ्चकनिपात (पंचम पुस्तक) का अंतिम और ३७५वां जातक है।

यद्यपि यह जातक संख्या ४२ (एककनिपात) के समान शीर्षक साझा करता है, किंतु यह पांच विस्तृत गाथाओं में रसास्वाद के भयानक परिणाम को उद्घाटित करता है।

पंख नोचकर नमक-राई मलने का यह लोक-दंड प्राचीन भारतीय पाकशालाओं की यथार्थवादी न्याय-पद्धति को दर्शाता है।

कबूतर का संतोष (संतुट्ठि) और कौए का लोभ (लोलुप्प) बौद्ध आचारशास्त्र में संयम बनाम असंयम का आदर्श उदाहरण है।

भगवान बुद्ध ने जेतवन में स्वादिष्ट भिक्षाटन के लोभी एक असंयमी भिक्षु को सचेत करने के लिए यह कथा कही।

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