एक पुत्र जो हर प्राणी की भाषा समझता था
प्राचीन काल में, जब ब्रह्मदत्त वाराणसी में राज्य करते थे, बोधिसत्व उनकी प्रमुख रानी के पुत्र के रूप में जन्मे। तक्षशिला में शिक्षा पूर्ण करने के बाद वे समस्त विद्याओं के साथ एक दुर्लभ सिद्धि भी लेकर लौटे—सभी पशु-पक्षियों की बोली समझने का मंत्र। लौटने पर पिता ने उन्हें उपराजा नियुक्त किया। परंतु अपने ही गुणवान पुत्र से ईर्ष्या और भय के कारण राजा उससे मिलना भी टालने लगे।
सियारी की निराश भूख
एक रात एक सियारी अपने भूखे बच्चों को लेकर नाले के रास्ते नगर में घुसी। उपराजा के कक्ष के पास एक यात्री सोया हुआ था, जिसने अपने जूते भूमि पर रख दिए थे। सियारी ने अपने बच्चों से कहा कि जब यात्री गहरी नींद में सो जाएगा, वह जूते लाकर उन्हें खिलाएगी। मंत्र-बल से बोधिसत्व ने उसकी बात समझ ली और यात्री को चेतावनी दे दी। सियारी भूखी और क्रुद्ध लौट गई।
कुछ रातों बाद वह फिर आई और उसने राजमहल के सरोवर में डूबे एक मृत व्यक्ति को देखा, जिसके वस्त्र और स्वर्ण-मुद्रिका अभी भी उसके साथ थे। उसने फिर अपने बच्चों से यह भोजन का वादा किया, परंतु बोधिसत्व ने यह भी सुन लिया और शव को संपत्ति हटाकर जल में डुबा दिया। दो बार निराश सियारी ने क्रोध में राजकुमार को शाप दिया: तीसरे दिन शत्रु राजा नगर को घेर लेगा, पिता उसे युद्ध में भेजेगा, वह वहीं मारा जाएगा, और वह स्वयं उसके कटे हुए गले का रक्त पिएगी।
घेरा और पिता का पलायन
तीसरे दिन सचमुच एक शत्रु राजा ने नगर को घेर लिया। राजा ब्रह्मदत्त ने पुत्र को युद्ध में भेजा। राजकुमार शाप से भयभीत था, परंतु आज्ञा मानी। वह शत्रु के द्वार से न जाकर दूसरे द्वार से निकला, और सारी प्रजा उसके विश्वास में उसके पीछे चल दी। स्वयं को निराश्रित देख वृद्ध राजा भयभीत हो गया। वह केवल अपनी प्रमुख रानी, कुल-पुरोहित और परांतप नामक एक सेवक को, जिसके नाम पर यह जातक है, लेकर रातोंरात वन में भाग गया। पिता के पलायन का समाचार सुनकर बोधिसत्व ने नगर में लौटकर घेरा तोड़ा और वाराणसी का राज्य स्वयं धारण कर लिया।
वन-निर्वासन और गुप्त विश्वासघात
वन में निर्वासित राजा ने नदी के किनारे पत्तों की कुटिया बनाई और जंगली फलों पर जीवन-यापन करने लगा। वह और पुरोहित प्रतिदिन फल लाने जाते, जबकि परांतप रानी की रक्षा के लिए पीछे रह जाता, जो राजा के गर्भ से थी। एकांत में बार-बार साथ रहने से रानी और परांतप में अनुचित संबंध बन गया। राजा को ज्ञात होने के भय से रानी ने परांतप को राजा की हत्या के लिए उकसाया। उसने योजना बताई: राजा स्नान के समय परांतप से ही तलवार और स्नान-वस्त्र उठवाता है। उसे असावधान पाकर वहीं उसका वध कर उसका शव वन में छिपा दे।
साक्षी जो बोल न सका
उस दिन पुरोहित फल तोड़ने के लिए उसी स्नानघाट के निकट एक वृक्ष पर चढ़ा हुआ था। ऊपर से उसने परांतप को राजा पर झपटते देखा और राजा की भय-भरी चीख सुनी, जो क्षण भर में शांत हो गई। भय से कांपते हुए पुरोहित का पैर फिसला और शाखाओं से आवाज़ हुई। परांतप ने आवाज़ सुनी पर किसी को न देखकर स्नान कर वहां से चला गया।
पुरोहित छिपकर बाहर निकला। अपनी जान बचाने के लिए उसने कुटिया लौटकर यह कह दिया कि वन में किसी सर्प के विष-श्वास से उसकी आंखें चली गई हैं। परांतप ने विश्वास कर लिया और तभी से स्वयं फल लाने लगा तथा पुरोहित की देखभाल करने लगा।
सत्य से अनजान पला हुआ बालक
समय के साथ रानी ने एक पुत्र को जन्म दिया—जो वास्तव में मृत राजा का ही पुत्र था, परंतु वह परांतप को ही अपना पिता मानकर बड़ा हुआ। पुरोहित ने अपने अंधेपन के बहाने के पीछे वर्षों तक अपना रहस्य और दुःख छुपाए रखा। कभी-कभी अनजाने में डाल हिलने की आवाज़ से उठे पुराने भय का उल्लेख वह स्वयं से बड़बड़ाकर करता, जिसे रानी और परांतप सामान्य बकबक समझते रहे।
जब राजकुमार सोलह वर्ष का हुआ, पुरोहित उसे उसी स्नानघाट पर ले गया, अपनी आंखें खोलकर दिखाईं और सत्य बताया। परांतप उसका पिता नहीं था। वास्तविक पिता वाराणसी के राजा थे, जिन्हें इसी स्थान पर उसके सगे माने जाने वाले व्यक्ति ने, माता की सहमति से, मार डाला था। फिर कुछ दिनों तक उसने राजकुमार को तलवार चलाना सिखाया।
नदी तट पर हिसाब
एक प्रभात राजकुमार ने परांतप को नदी पर स्नान के लिए आमंत्रित किया। जल में उतरते ही राजकुमार ने उसकी चोटी पकड़ ली, ठीक जैसे उसने राजा की पकड़ी थी, और कहा कि उस पुराने अपराध का हिसाब अब चुकता होगा। उसने परांतप को वही अंत दिया जो उसने राजा को दिया था, शव को वहीं दबाया, स्नान कर शांतिपूर्वक कुटिया लौटा। वहां उसने पुरोहित को सब बताया, माता को उसके कृत्य के लिए धिक्कारा, और तीनों साथ मिलकर वाराणसी लौट आए।
पुनः स्थापित राज्य
वाराणसी में बोधिसत्व, जो घेरे के दिन से ही न्यायपूर्वक राज्य कर रहे थे, ने राजकुमार का स्वागत किया और उसे अपना उपराजा नियुक्त किया। स्वयं बोधिसत्व ने दान और अन्य सत्कर्मों के साथ शासन जारी रखा और अंततः सद्जीवन के फलस्वरूप स्वर्ग-पथ की ओर अग्रसर हुए।
बुद्ध की पहचान
शिक्षक ने यह कथा वेणुवन में उन भिक्षुओं को सुनाई जो देवदत्त के बार-बार किए गए प्राण-हरण के प्रयासों से व्यथित थे—धनुर्धारी भाड़े पर रखना, चट्टान लुढ़काना, और हाथी नालागिरि को छोड़ना। बुद्ध ने उन्हें बताया कि देवदत्त ने उन्हें पहले भी मारने का प्रयास किया था, परंतु इन प्रयासों ने उन्हें कभी भयभीत नहीं किया। फिर उन्होंने जन्म का परिचय दिया: उस समय देवदत्त वही वृद्ध राजा था, और वे स्वयं वह युवा उपराजा थे।
एक शिक्षा जो विश्वासघात से भी आगे तक पहुँची
परन्तप जातक पालि त्रिपिटक के खुद्दक निकाय अंतर्गत जातक संग्रह की प्रामाणिक कथा सं. ४१६ है, जो संग्रह के तृतीय खंड में संकलित है। इस कथा से स्पष्ट है कि पिता का भय और सेवक का विश्वासघात भी उसे स्पर्श नहीं कर सके जिसने उनका सामना द्वेष रहित होकर किया। वृद्ध राजा का वही द्वेष जिसने उसे अपने ही पुत्र को निर्वासित करने पर विवश किया, अंततः उसी के विनाश और शोक का कारण बना—ठीक वैसे ही जैसे यह द्वेष जन्म-जन्मांतर में देवदत्त को बुद्ध के विरुद्ध उसके बार-बार के प्रयासों में विनाश की ओर ले गया।
क्या आप जानते हैं?
जातक #416 पालि जातक संग्रह के सत्तकनिपात (सात गाथाओं के खंड) की इकीसवीं और अंतिम कथा है, जो अष्टकनिपात के आरंभ से पूर्व इस खंड को समाप्त करती है।
कथा के केंद्र में स्थित दुर्लभ सिद्धि—सर्व-रुत-ज्ञान-मंत्र, जो समस्त पशु-पक्षियों की बोली समझने की शक्ति देता है—अन्य जातकों में भी असाधारण अंतर्दृष्टि के प्रतीक के रूप में प्रकट होती है।
राजा का अपने ही गुणवान पुत्र से भय, और सियारी का राजकुमार को दिया गया शाप, जातक-साहित्य के एक बारंबार विषय को दर्शाते हैं—कि परिवार के भीतर की ईर्ष्या और संदेह किसी बाहरी शत्रु से अधिक हानि पहुंचा सकते हैं।
कुल-पुरोहित का सोलह वर्षों तक बनाए रखा गया झूठा अंधत्व—अपनी जान और अपने भीतर छिपे रहस्य दोनों की रक्षा हेतु—उपयुक्त समय पर प्रकट किए गए दीर्घकालिक, धीरजपूर्ण साक्ष्य का एक असाधारण उदाहरण है।
बुद्ध ने यह कथा विशेष रूप से देवदत्त द्वारा बार-बार किए गए प्राण-हरण के प्रयासों के प्रसंग में सुनाई, और प्रतिशोधी वृद्ध राजा को स्वयं देवदत्त के रूप में पहचाना—यह स्मरण कराते हुए कि ऐसा द्वेष उसे धारण करने वाले को ही सबसे अधिक हानि पहुंचाता है, जिसके विरुद्ध वह निर्देशित है उससे कहीं अधिक।
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