Bharat Devotion
Embroidered artwork for सालिकेदार जातक: पितृभक्त शुकराज और धान का खेत: Embroidered Buddha seated in meditation on a pink lotus, with a golden dharma wheel and a white stupa in the mountains

सालिकेदार जातक

पितृभक्त शुकराज और धान का खेत

शुकराज (संख्या ४८४) ब्राह्मण के खेत से प्रतिदिन अन्न लाते हैं; पकड़े जाने पर वे अन्न के तिहरे उपयोग—बच्चों को उधार, माता-पिता का ऋण-चुकारा और असहायों के लिए संचय—का रहस्य बताते हैं, जिससे ब्राह्मण मुग्ध होकर हज़ार एकड़ देना चाहता है, पर शुकराज केवल आठ एकड़ स्वीकार करते हैं।

माता की सेवा करने वाला भिक्षु

बुद्ध ने यह कथा जेतवन में उस भिक्षु के प्रसंग में सुनाई जो अपने भिक्षा-अन्न से अपनी वृद्ध माता का पालन करता रहा, जिसे कुछ भिक्षुओं ने गृहस्थ-त्याग के लिए अनुचित माना। बुद्ध ने उसका समर्थन करते हुए कहा कि अतीत में पशु-पक्षियों ने भी अपने माता-पिता की सेवा की थी, और प्रमाण स्वरूप यह कथा सुनाई, जो आज खुद्दकनिकाय के जातक-संग्रह के पकिण्णकनिपात में संख्या ४८४ के रूप में संरक्षित है।

एक ब्राह्मण का सहस्र-एकड़ खेत

प्राचीन मगध में, राजगृह के निकट सालिन्दिय गांव में, कोसियगोत्त नामक एक धनी ब्राह्मण भूस्वामी रहता था। उसके पास सिंचित भूमि का एक हजार करीस (एकड़) का विशाल खेत था, जिसमें सुगंधित सालि धान बोया जाता था। इतना विस्तृत था यह खेत कि उसने पांच सौ एकड़ की सीधी देखरेख के लिए एक मुख्य रक्षक नियुक्त किया और बाकी भाग स्थानीय मजदूरों की निगरानी में छोड़ दिया।

शुकराज की भक्ति

खेत के उत्तर में एक शाल्मली वन था जहां तोतों का एक विशाल समूह निवास करता था, जिसका नेतृत्व बोधिसत्व करते थे, जो उन्हीं में एक शक्तिशाली शुकराज के रूप में जन्मे थे। जब उनके अपने पिता वृद्ध हो गए और समूह का नेतृत्व नहीं कर सके, तो बोधिसत्व ने नेतृत्व अपने हाथ में लिया, किंतु उन्होंने अपने वृद्ध माता-पिता को कभी स्वयं भोजन खोजने नहीं दिया। वे प्रतिदिन अकेले दूर हिमालय की पहाड़ियों तक उड़ते, वहां जंगली चावल खाकर पेट भरते, और अपनी चोंच में भोजन लेकर उनके लिए घर लौटते।

धान के खेत की खोज

एक दिन समूह के कुछ सदस्यों ने बताया कि कोसिय के खेत का धान पक गया है। शुकराज पूरे समूह को वहां ले गए; जब बाकी सभी पेट भरकर उड़ गए, तो केवल वे ही रुके और अपनी चोंच में उदारतापूर्वक अन्न भरकर अपने माता-पिता के लिए घर ले गए।

रक्षक के फंदे में फंसना

मुख्य रक्षक ने देखा कि यह एक तोता, बाकी सभी से भिन्न, प्रतिदिन अन्न ले जाता है, और यह बात अपने स्वामी को बताई। कोसिय ने क्रोधित होने के बजाय जिज्ञासावश आदेश दिया कि पक्षी को बिना हानि पहुंचाए फंदे में पकड़ा जाए। रक्षक ने उस विशेष डाल पर घोड़े के बाल का एक सूक्ष्म फंदा लगाया, और अगली सुबह शुकराज का पैर उसमें फंस गया।

ब्राह्मण के समक्ष प्रस्तुत

रक्षक ने पकड़े गए पक्षी को कोसिय के सामने लाकर रखा। कोसिय ने उस सुंदर, बंदी तोते को देखकर स्पष्टीकरण मांगा: 'क्या तेरा पेट अन्य तोतों से बड़ा है, या मुझसे तेरी कोई पुरानी शत्रुता है कि तू ही दिन-प्रतिदिन मेरा धान ले जाता है?'

अन्न का तिहरा विभाजन

शुकराज ने मधुर स्वर में उत्तर दिया और उन श्लोकों में, जो तभी से प्रसिद्ध हो गए, अपनी फसल के तिहरे उपयोग को समझाया। उन्होंने कहा कि एक भाग वे अपने असहाय नन्हे बच्चों को उधार के रूप में देते हैं, जो अभी स्वयं भोजन खोजने में असमर्थ हैं, इस विश्वास के साथ कि जब वे वृद्ध होंगे तब बच्चे उनका भरण-पोषण करेंगे—जैसे उधार भविष्य में चुकाए जाने की आशा से दिया जाता है। दूसरा भाग वे अपने अंधे और वृद्ध माता-पिता को प्राचीन ऋण के रूप में चुकाते हैं, जिन्होंने उनकी असहाय शिशु-अवस्था में उनका पालन किया था। और तीसरा भाग वे वन के अन्य दुर्बल और असहाय पक्षियों को निःस्वार्थ दान में देते हैं, जिनकी देखभाल करने वाला कोई नहीं है; इसी को ज्ञानी संचित निधि कहते हैं।

ब्राह्मण के आंसू

कृतज्ञता के ऋण, बच्चों के पालन और असहायों के प्रति दान का यह स्पष्ट लेखा सुनकर कोसिय की आंखों से आंसू बह निकले। उन्होंने स्वयं शुकराज के पैर से फंदा खोला, उन्हें स्नान कराया, अपने हाथों से चावल और मधु खिलाया, और घोषणा की: 'हे पक्षियों के श्रेष्ठ राजा! यह सहस्र-एकड़ खेत ले लो और जितना चाहो उतना यहां से खाओ।' पर शुकराज ने पूरी जागीर अस्वीकार कर दी और केवल आठ एकड़ माँगे। ब्राह्मण ने सीमा-पत्थर लगवाकर वह भाग उन्हें और उनके कुल को सौंप दिया।

एक स्थायी अभयारण्य

शुकराज ने वे आठ एकड़ स्वीकार किए, घर उड़कर अपने वृद्ध माता-पिता को भोजन और यह आनंददायक समाचार दिया, और शुकराज के मार्गदर्शन में कोसिय ने स्वयं पंचशील अपनाया और अधिक उदारता का जीवन जीने लगे, सदैव उस पक्षी को स्मरण करते हुए जिसने उन्हें चुकाए गए ऋण का सच्चा अर्थ सिखाया था।

बुद्ध की पहचान-उद्घोषणा

कथा समाप्त करते हुए बुद्ध ने अपनी माता की सेवा करने वाले भिक्षु के लिए उस जन्म की पहचान बताई: अपने माता-पिता की इतनी निष्ठा से सेवा करने वाला शुकराज उस जन्म में स्वयं बुद्ध था; उसके तोता-माता-पिता उस भिक्षु के ही माता-पिता थे; भूस्वामी ब्राह्मण कोसियगोत्त आनंद स्थविर था; और फंदा लगाने वाला रक्षक छन्न स्थविर था।

क्या आप जानते हैं?

सालिकेदार जातक जीविका के तिहरे उपयोग (उधार, ऋण और संचय) और माता-पिता की सेवा (मातापितु-उपट्ठान) के कर्तव्य का सर्वोत्कृष्ट शास्त्रीय प्रमाण है।

इस कथा की पृष्ठभूमि वह भिक्षु है जो अपने भिक्षा-अन्न से अपनी माता का पालन करता रहा; बुद्ध ने इसी प्राचीन शुकराज के उदाहरण से उसका समर्थन किया।

शुकराज द्वारा सिखाया गया तिहरा विभाजन है

अपने नन्हे बच्चों को उधार, अपने वृद्ध माता-पिता को प्राचीन ऋण, और असहाय पक्षियों को दान के रूप में संचित निधि।

यह कथा प्राचीन मगध की विशाल धान-कृषि व्यवस्था—रक्षक, घोड़े के बाल के फंदे और भूमि-मापक 'करीस'—का प्रामाणिक ऐतिहासिक विवरण देती है।

शुकराज स्वयं बुद्ध थे, उनके तोता-माता-पिता उस भिक्षु के ही माता-पिता थे, भूस्वामी कोसियगोत्त आनंद स्थविर थे, और रक्षक छन्न स्थविर था।

विषय के अनुसार खोजें

Buddha की संपूर्ण स्तुति एवं पाठ

Buddha

Buddha के सभी पाठ देखें →

संबंधित शिक्षाएं

एक ही शिक्षा, विभिन्न परंपराओं में प्रतिध्वनित