जेतवन में संपूर्ण संघ के लिए जूते
भगवान बुद्ध ने यह कथा जेतवन में 'सभी आवश्यक वस्तुओं के दान' के प्रसंग में सुनाई। श्रावस्ती के एक श्रद्धावान गृहस्थ ने संपूर्ण भिक्षु-संघ को उत्तम जूते भेंट किए थे—बुद्ध के लिए एक हजार मुद्रा मूल्य का जोड़ा, दो प्रमुख शिष्यों के लिए पांच सौ मूल्य के जोड़े, और पांच सौ भिक्षुओं में से प्रत्येक के लिए सौ मूल्य का जोड़ा। जब पूछा गया कि ऐसा सामान्य दान इतना महत्वपूर्ण क्यों है, बुद्ध ने उत्तर दिया कि प्राचीन काल में एक प्रत्येकबुद्ध को जूतों का एक जोड़ा दान करने मात्र से एक डूबते हुए व्यक्ति को ऐसे समुद्र से पार कराया गया था जहां कोई शरण संभव नहीं दिखती थी। उन्होंने यह कथा सुनाई, जो आज खुद्दकनिकाय के जातक-संग्रह के दसकनिपात में संख्या ४४२ के रूप में संरक्षित है, इसके प्रमाण स्वरूप।
एक ब्राह्मण की छह दानशालाएं
प्राचीन काल में वाराणसी में राजा ब्रह्मदत्त के राज्य में बोधिसत्व एक कुलीन ब्राह्मण परिवार में उत्पन्न हुए और उनका नाम शंख रखा गया। बड़े होने पर उन्हें अपने पूर्वजों की अपार संपत्ति प्राप्त हुई। नगर के दीन-दुखियों, अनाथों और यात्रियों के कष्टों को देखकर शंख ने अपने धन का सदुपयोग करने का संकल्प लिया। उन्होंने नगर में छह विशाल दानशालाएं बनवाईं: चार नगर के चारों मुख्य द्वारों पर, एक नगर के मुख्य बाजार में, और एक अपने विशाल भवन के सामने। वे प्रतिदिन हजारों भिक्षुओं, संन्यासियों और भूखों को स्वादिष्ट भोजन, वस्त्र और औषधियां दान करते थे।
सुवर्णभूमि की ओर प्रस्थान
कई वर्षों तक इस प्रकार महादान करते रहने के बाद शंख ने देखा कि उनके खजाने का धन धीरे-धीरे कम होने लगा है। उन्होंने विचार किया: 'यदि मेरा धन समाप्त हो गया, तो मेरी दानशालाओं के चूल्हे ठंडे पड़ जाएंगे और मेरे आश्रित गरीब भूख से रोएंगे। दान बंद करना धर्म नहीं है। मैंने सुना है कि सुदूर पूर्व में सुवर्णभूमि (सोने का देश) है जहां अथाह स्वर्ण और रत्न पाए जाते हैं। मैं स्वयं जहाज लेकर सुवर्णभूमि जाऊंगा, वहां से विपुल धन कमाकर लाऊंगा और जीवन भर अपने दान-सत्र को बिना रुके चलाऊंगा।'
एक प्रत्येकबुद्ध के फफोले पड़े पैर
शंख ने एक मजबूत जहाज में व्यापारिक वस्तुएं भरवाईं और स्वयं पैदल ही गंभीर नामक बंदरगाह की ओर चल पड़े। दोपहर का समय था; सूर्य आग बरसा रहा था और सड़क की रेत जलते हुए अंगारों की भांति तप रही थी। बोधिसत्व अपने सिर पर रेशमी सफेद छत्र लगाए और पैरों में सुंदर चमड़े के जूते पहने चले जा रहे थे। अचानक उन्होंने देखा कि सामने से एक प्रत्येकबुद्ध नंगे पैर चले आ रहे हैं। उस तपती हुई बालू पर चलने के कारण उन शांत मुनि के कोमल तलवे जलकर फफोलेदार हो गए थे और उनसे रक्त बह रहा था, किंतु उनका मुखमंडल परम शांत और तेजस्वी था।
श्रद्धा से अर्पित जूते और छत्र
यह देखकर शंख का हृदय करुणा से भर आया। उन्होंने सोचा: 'यह साक्षात पुण्य का सर्वोत्तम क्षेत्र मेरे सामने उपस्थित है! जीवों को संसार की इस जलती हुई मरुभूमि में इसलिए नंगे पैर भटकना पड़ता है क्योंकि उन्होंने पूर्वजन्मों में दान नहीं दिया। ऐसे सिद्ध संत के पैर जल रहे हों और मैं जूते पहनकर छत्र की छाया में चलूं, यह मेरे लिए धिक्कार है!' वे तुरंत दौड़कर मुनि के पास पहुंचे, उन्हें आदरपूर्वक एक घने वृक्ष की छाया में ले गए, अपने कमंडल के शीतल जल से उनके चरणों को धोया, उन्हें अपने दुपट्टे से पोंछा और अपने जूते आदरपूर्वक उनके चरणों में पहना दिए। फिर उन्होंने अपना श्वेत छत्र मुनि के हाथों में देते हुए प्रार्थना की: 'हे भगवन! इस धूप से रक्षा के लिए मेरे ये जूते और छत्र स्वीकार करें, ताकि इस दान के पुण्य से मुझे भी भव-सागर के ताप से मुक्ति मिले।' प्रत्येकबुद्ध ने करुणापूर्वक वह दान स्वीकार किया और शंख के मन में श्रद्धा बढ़ाने के लिए आकाश में हंस की भांति उड़कर हिमालय की ओर चले गए।
सात दिन समुद्र में, फिर तूफान
परम आनंदित होकर शंख बंदरगाह पहुंचे और अपने साथ बनारस से आए एक विश्वासपात्र सेवक को लेकर सैकड़ों व्यापारियों के साथ जहाज पर सवार हो गए। सात दिनों तक जहाज अनुकूल वायु के सहारे तेजी से आगे बढ़ता रहा। किंतु सातवीं रात को समुद्र में एक भयानक तूफान आया। तूफानी लहरों के थपेड़ों से जहाज की तख्तियां टूट गईं और पानी तेजी से अंदर भरने लगा। जहाज पर हाहाकार मच गया; लोग रोने लगे, अपने कुलदेवताओं को पुकारने लगे और प्राण बचाने के लिए चीखते हुए समुद्र में कूदने लगे, जहां हिंसक शार्क मछलियां उन्हें नोंच-नोंचकर खाने लगीं।
शार्क मछलियों से परे छलांग
किंतु शंख विचलित नहीं हुए। उन्होंने सोचा: 'रोना-धोना किसी काम नहीं आता; ऐसे संकट में केवल पुरुषार्थ और धैर्य ही रक्षा कर सकते हैं।' उन्होंने तुरंत शुद्ध घी, शक्कर और सत्तू खाकर अपनी शारीरिक शक्ति बढ़ाई, अपने सेवक को भी वही भोजन दिया, और दोनों के शरीर पर तेल मला ताकि खारा पानी त्वचा को न गला सके, फिर दोनों जहाज के मुख्य मस्तूल की चोटी पर चढ़ गए। जैसे ही जहाज डूबने लगा, शंख और उनके सेवक ने पूरी शक्ति से बाहर की ओर एक लंबी छलांग लगाई, जिससे वे भंवर और शार्क मछलियों के घेरे से बहुत दूर जा गिरे।
समुद्र में सात दिन और सात रात अपने सेवक के साथ
सात दिनों और सात रातों तक वह दानवीर ब्राह्मण अपने सेवक के साथ महासागर के खारे पानी में तैरता रहा। हाथ-पैर शिथिल हो गए थे, कंठ प्यास से सूख गया था और चमड़ी गलने लगी थी, किंतु उन्होंने तैरना बंद नहीं किया और न ही हिम्मत हारी। सातवें दिन, जो पूर्णमासी का उपोसथ दिन था, उन्होंने समुद्र के जल से कुल्ला कर अपना मुख शुद्ध किया, उपोसथ के नियमों का स्मरण किया और पूरे वेग से तैरते रहे।
मणिमेखला की उपेक्षित प्रहरी-ड्यूटी
उसी समय समुद्र-देवी मणिमेखला, जिन्हें चार लोकपाल देवों ने समुद्र में संकटग्रस्त पुण्यात्माओं की रक्षा का भार सौंपा था, सात दिनों बाद स्वर्ग से लौटीं। उन्होंने देखा कि एक मनुष्य अपने सेवक के साथ सात दिनों से लगातार तैरकर अगाध समुद्र को पार करने का प्रयास कर रहा है। दिव्य दृष्टि से देखकर उन्होंने पहचान लिया कि यह वही दानवीर शंख है जिसने प्रत्येकबुद्ध को जूते दान किए थे।
लहरों के बीच एक परीक्षा
मणिमेखला तुरंत आकाश से उतरकर दिव्य भोजन से भरी सोने की थाली लिए उनके सामने हवा में प्रकट हुईं। तैरते हुए शंख प्रलोभन में नहीं आए। उन्होंने कहा: 'अपना भोजन ले जाइए, क्योंकि मैं उपोसथ का व्रत रख रहा हूँ।' वह उपोसथ का दिन था, और खुले समुद्र में भी उन्होंने अपना व्रत नहीं तोड़ा।
देवी ने अपनी पहचान बताई
सेवक देवी को देख नहीं सका, उसे केवल आवाज़ें सुनाई दीं। स्वामी को भूख और भय से विक्षिप्त समझकर वह उन्हें सांत्वना देने लगा। शंख ने कहा कि वे प्रलाप नहीं कर रहे, बल्कि एक ऐसे प्राणी से बात कर रहे हैं जिसे वे देख सकते हैं। सेवक ने पूछा कि वह मानवी है या देवी, तो उन्होंने स्वयं को देवी बताया। उन्होंने शंख से कहा कि जलती राह पर प्रत्येकबुद्ध को दिया गया जूतों और छत्र का दान ही उनकी 'कामधेनु' बनकर इस रक्षा का कारण बना है। फिर उन्होंने सात रत्नों से बना एक जहाज प्रकट किया: आठ सौ हाथ लंबा, छह सौ हाथ चौड़ा और बीस पुरुष-गहरा, तीन मस्तूल नीलम के, रस्सियाँ सोने की, पाल चाँदी के, तथा चप्पू और पतवार सोने के। उन्होंने उसे सात प्रकार के रत्नों से भर दिया।
रत्नजड़ित जहाज घर लौटा
देवी ने तत्काल एक विशाल दिव्य जहाज प्रकट किया जो सोने, चांदी और मणियों से बना था, जिसमें मोतियों के पाल लगे थे और जिसका खजाना सात प्रकार के अमूल्य रत्नों से भरा था। शंख अपने सेवक के बिना जहाज पर चढ़ने को तैयार नहीं हुए, और उनके आग्रह पर देवी ने दोनों को उठाकर जहाज पर बिठाया, दिव्य वस्त्र पहनाए और वह जहाज गंगा नदी के मार्ग से होता हुआ सीधे वाराणसी में शंख के राजमहल के द्वार पर आकर रुक गया। देवी ने सारा धन उनके खजाने में भर दिया और कहा: 'हे शंख! इस अक्षय धन से जीवन भर दान करो और धर्म का प्रकाश फैलाओ।' शंख ने जीवन भर महादान दिया और अंत में सद्गति प्राप्त की।
बुद्ध की पहचान-उद्घोषणा
कथा समाप्त करते हुए बुद्ध ने जेतवन में उपस्थित संघ के लिए उस जन्म की पहचान बताई। शंख की यात्रा में साथ देने वाला सेवक आनंद स्थविर था, और उस सभा में उपस्थित उप्पलवण्णा नामक उपासिका समुद्र-देवी मणिमेखला थीं। जिस दानवीर ब्राह्मण शंख ने प्रत्येकबुद्ध को अपने जूते भेंट किए और समुद्र की गहराई से बचाए गए, वह स्वयं बुद्ध का पूर्वजन्म था।
क्या आप जानते हैं?
यह दसकनिपात की संख्या ४४२ की प्रामाणिक कथा है, जो जेतवन में संघ को जूते दान करने के प्रसंग में सुनाई गई।
यह वीर्य पारमिता (साहसिक पुरुषार्थ) और दान पारमिता (निःस्वार्थ दानशीलता) की जोड़ी का उत्सव मनाती है।
इसमें बौद्ध समुद्र-देवी मणिमेखला का वर्णन है, जो दक्षिण-पूर्व एशियाई और तमिल साहित्य में भी प्रसिद्ध जलपोत-रक्षिका हैं।
यह दर्शाती है कि तपती रेत पर प्रत्येकबुद्ध को जूते और छत्र देने का कर्म-फल कैसे तपते समुद्र से बचाव के रूप में लौटा।
पहचान
शंख का सेवक आनंद था, उपासिका उप्पलवण्णा मणिमेखला थी, और दानवीर ब्राह्मण स्वयं बुद्ध थे।
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