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Embroidered artwork for श्री वृषभानुसुता आरती: Embroidered Om symbol above a brass diya, marigolds and a temple spire at sunrise

श्री वृषभानुसुता आरती

श्री वृषभानुसुता आरती

यह एक भक्ति गीत (आरती) है जो देवी राधा की स्तुति में गाया जाता है, जिन्हें श्रीकृष्ण की प्रियतमा और वृषभानु की पुत्री माना जाता है। इसमें उनकी मनमोहक मूर्ति, दिव्य गुणों और भक्तों को मुक्ति देने वाली शक्ति का वर्णन है।

श्लोक

आरती श्री वृषभानुसुता की, मंजुल मूर्ति मोहन ममता की
Aarti Shri Vrishbhanusuta Ki, Manjul Murti Mohan Mamta Ki.

श्लोक 1

त्रिविध तापयुत संसृति नाशिनि, विमल विवेकविराग विकासिनि पावन प्रभु पद प्रीति प्रकाशिनि, सुन्दरतम छवि सुन्दरता की आरती श्री वृषभानुसुता की..
Trividh Tapyut Sansriti Nashini, Vimal Vivek-Virag Vikasini. Pawan Prabhu Pad Preeti Prakashini, Sundartam Chhavi Sundarta Ki. Aarti Shri Vrishbhanusuta Ki..

श्लोक 2

मुनि मन मोहन मोहन मोहनि, मधुर मनोहर मूरति सोहनि अविरलप्रेम अमिय रस दोहनि, प्रिय अति सदा सखी ललिता की आरती श्री वृषभानुसुता की..
Muni Man Mohan Mohan Mohani, Madhur Manohar Murti Sohani. Aviral-Prem Amiya Ras Dohani, Priya Ati Sada Sakhi Lalita Ki. Aarti Shri Vrishbhanusuta Ki..

श्लोक 3

संतत सेव्य सत मुनि जनकी, आकर अमित दिव्यगुन गनकी आकर्षिणी कृष्ण तन मनकी, अति अमूल्य सम्पति समता की आरती श्री वृषभानुसुता की.. आरती श्री वृषभानुसुता की
Santat Sevya Sat Muni Janki, Aakar Amit Divyagun Ganki. Aakarshini Krishna Tan Manki, Ati Amulya Sampati Samta Ki. Aarti Shri Vrishbhanusuta Ki.. Aarti Shri Vrishbhanusuta Ki.

श्लोक 4

कृष्णात्मिका, कृष्ण सहचारिणि, चिन्मयवृन्दा विपिन विहारिणि जगजननि जग दुखनिवारिणि, आदि अनादिशक्ति विभुता की आरती श्री वृषभानुसुता की..
Krishnatmika, Krishna Sahcharini, Chinmay-Vrinda Vipin Viharini. Jagjanani Jag Dukh-Nivarini, Aadi Anadishakti Vibhuta Ki. Aarti Shri Vrishbhanusuta Ki..

श्लोक 5

आरती श्री वृषभानुसुता की, मंजुल मूर्ति मोहन ममता की
Aarti Shri Vrishbhanusuta Ki, Manjul Murti Mohan Mamta Ki.

श्लोक 6

पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)

शुभ दिन व तिथि

नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर

उत्तम मुहूर्त / समय

ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल

पूजन सामग्री व अर्पण

शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल

फलश्रुति एवं आध्यात्मिक लाभ
  • मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पाठ विधि सुझाव:संध्याकालीन पूजा के अंत में सपरिवार मिलकर दीपक घुमाते हुए आरती गाएं।

पृष्ठभूमि

यह आरती भगवान श्रीकृष्ण की प्रिय श्री राधा जी को समर्पित है, जिन्हें वृषभानुसुता (वृषभानु जी की पुत्री) कहा जाता है। यह पारंपरिक रूप से भक्ति की भावना से शाम या पूजा के समय गाई जाती है। यह पद वैष्णव परंपरा का हिस्सा है, विशेष रूप से पुष्टिमार्ग और गौड़ीय संप्रदायों में राधा जी की महिमा का गुणगान करने के लिए प्रयोग किया जाता है।

क्या आप जानते हैं?

रचना और संदर्भ

यह आरती श्री राधा जी को समर्पित है, जिन्हें 'वृषभानुसुता' (वृषभानु गोप की पुत्री) कहा गया है। ब्रज परंपरा में यह आरती विशेष रूप से राधा जी की पूजा के दौरान गाई जाती है और इसमें उनकी मधुर मूर्ति का वर्णन है।

त्रिविध ताप का नाश

पहले पद में राधा जी को 'त्रिविध तापयुत संसृति नाशिनि' कहा गया है—अर्थात वे तीन प्रकार के तापों (आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक) का नाश करने वाली हैं। यह उनकी मोक्षदायिनी और दुखहारिणी भूमिका को दर्शाता है।

ललिता सखी का उल्लेख

दूसरे पद में 'प्रिय अति सदा सखी ललिता की' कहा गया है। ललिता राधा जी की प्रमुख सखी हैं; इस उल्लेख से राधा-कृष्ण लीलाओं में सखियों के महत्व और उनके प्रति राधा के विशेष स्नेह का पता चलता है।

राधा-कृष्ण की आत्मिक एकता

चौथे पद में राधा जी को 'कृष्णात्मिका' (कृष्ण की आत्मा) और 'कृष्ण सहचारिणी' (कृष्ण की संगिनी) कहा गया है। यह गौड़ीय वैष्णव दर्शन की मान्यता को स्पष्ट करता है कि राधा और कृष्ण एक ही दिव्य तत्त्व के दो पहलू हैं।

वृंदावन के चिन्मय विपिन में विहार

'चिन्मयवृन्दा विपिन विहारिणि' पंक्ति में राधा जी को चेतनामय वृंदावन के वनों में विचरण करने वाली कहा गया है। यह उनके नित्य शाश्वत वृंदावन में कृष्ण के साथ निरंतर लीलाओं की ओर संकेत करता है।

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