पंचाराम
आन्ध्र प्रदेश के पाँच पावन शिव क्षेत्र
पंचाराम आंध्र प्रदेश के पाँच शिव क्षेत्र हैं, जो तारकासुर पर कार्तिकेय की विजय में टूटे आत्मलिंग के खंडों से पावन हुए।
संक्षिप्त दर्शन संदर्शिका (एक दृष्टि में)
- •क्या है: आन्ध्र प्रदेश के पाँच अत्यंत प्राचीन पावन शिव क्षेत्र (अमराराम, द्राक्षाराम, सोमाराम, क्षीराराम, तथा कुमाराराम), जहाँ भगवान कार्तिकेय द्वारा तारकासुर का वध किए जाने पर उसके कंठ में स्थित दिव्य प्रणव लिंग के पाँच खंड गिरे थे।
- •दर्शन व जप का फल: पंचाराम लिंगों का दर्शन एवं पूजन संचित पापों का नाश करता है, ग्रह दोषों को शांत करता है, वंश वृद्धि और आरोग्य देता है तथा अंत में शिव-सायुज्य (मोक्ष) प्रदान करता है।
- •कब जाएँ: संपूर्ण कार्तिक मास (अक्टूबर-नवंबर), विशेषकर कार्तिक सोमवार, क्षीराब्धि द्वादशी एवं महाशिवरात्रि (फरवरी-मार्च)।
- •कहाँ स्थित है: तटीय आन्ध्र प्रदेश के गुंटूर, काकीनाडा तथा पश्चिम गोदावरी जनपदों में, पवित्र कृष्णा एवं सप्त गोदावरी नदियों के पावन तटों पर।
- •दर्शन एवं पूजन विधि:
- •कार्तिक मास में संभव हो तो एक ही दिन में पंचाराम तीर्थों की परिक्रमा (यात्रा) पूर्ण करने की प्राचीन परंपरा है।
- •प्रत्येक मंदिर में प्रवेश से पूर्व संबंधित पुष्करिणी (जैसे कृष्णा नदी, सप्त गोदावरी, सोम गुंड) में पवित्र स्नान करें।
- •पारंपरिक वस्त्र अनिवार्य हैं: पुरुषों के लिए धोती-उत्तरीय और महिलाओं के लिए साड़ी।
- •शिवलिंग पर पंचामृत एवं क्षीराभिषेक करें, और ॐ नमः शिवाय मंत्र का जप करते हुए त्रिशूल-दल बिल्वपत्र अर्पित करें।
पावन उद्गम एवं पौराणिक पृष्ठभूमि
तारकासुर-वध का वर्णन शिव पुराण की रुद्र संहिता के कुमार खंड (अध्याय ७ से १२) में है, और आंध्र की भूमि खंडित शिवलिंग की स्थानीय परंपरा संजोए है। उस परंपरा के अनुसार, महाप्रतापी असुरराज तारकासुर ने कठोर तपस्या करके भगवान शिव का आदि 'प्राणलिंग' (आत्मलिंग) प्राप्त कर अपने कंठ में धारण किया था। इस शिवलिंग के प्रभाव से वह अजेय हो गया और तीनों लोकों में अत्याचार करने लगा।
जब भगवान शिव और माता पार्वती के तेज से जन्मे देवसेनापति भगवान कार्तिकेय (स्कन्द) ने तारकासुर के साथ युद्ध किया, तो कार्तिकेय के दिव्य अस्त्रों से तारकासुर का मस्तक कटकर भी पुनः जुड़ जाता था। तब भगवान विष्णु ने कुमार को रहस्य बताया कि पहले आग्नेयास्त्र से तारकासुर के कंठ में स्थित शिवलिंग को खंडित करना होगा। साथ ही उन्होंने चेतावनी दी कि शिवलिंग के टुकड़े यदि भूमि पर मिलकर पुनः एक हो गए, तो असुर पुनः जीवित हो जाएगा; अतः देवताओं को उन टुकड़ों को भूमि पर गिरते ही तुरंत स्थापित करना होगा।
भगवान कार्तिकेय ने अपने बाण से उस विशाल शिवलिंग को पाँच भागों में विभक्त कर दिया। उन दिव्य अंशों को इन्द्र, सूर्य, चन्द्र, विष्णु और स्वयं कार्तिकेय ने तुरंत धारण कर भूमि पर प्रतिष्ठित किया। यही पाँच दिव्य क्षेत्र पंचाराम कहलाए।
पंचाराम तीर्थों का विवरण
संत, ऋषि एवं ऐतिहासिक परंपरा
पंचाराम क्षेत्रों की महिमा युगों-युगों से ऋषियों और सम्राटों द्वारा गाई गई है। परंपरा महर्षि वेदव्यास को द्राक्षाराम में तपस्या करते स्मरण करती है; यह क्षेत्र 'दक्षिण काशी' के रूप में पूजित है। भक्त परंपरा जगद्गुरु आदि शंकराचार्य को द्राक्षाराम के माणिक्याम्बा शक्तिपीठ से भी जोड़ती है।
परंपरा द्राक्षाराम और कुमाराराम के द्वि-मंजिला पाषाण मंदिरों का श्रेय पूर्वी चालुक्य शासक चालुक्य भीम प्रथम (८८८ से ९१८ ई.) को देती है। परवर्ती शासकों ने भी इन मंदिरों को मंडप और अनुदान प्रदान किए। महाकवि श्रीनाथ ने भीमेश्वर पुराणमु में द्राक्षाराम और उसके आराध्य की महिमा गाई है।
पावन श्लोक एवं ध्यान
पंचाराम के दर्शन के समय अथवा कार्तिक मास में आदि शंकराचार्य के नाम से प्रसिद्ध शिव पंचाक्षर स्तोत्र का प्रथम श्लोक स्मरण किया जाता है:
नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय भस्माङ्गरागाय महेश्वराय ।
नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय तस्मै नकाराय नमः शिवाय ॥
भावार्थ: "जिनके गले में नागराज का हार है, जो त्रिनेत्रधारी हैं, जिनका शरीर भस्म से विभूषित है, जो महेश्वर, नित्य, शुद्ध और दिगंबर हैं, उन 'न' अक्षर स्वरूप शिव को नमस्कार है।"
क्या आप जानते हैं?
द्राक्षाराम का शिवलिंग लगभग १४ फीट ऊँचा है और मंदिर की दो मंजिलों में फैला हुआ है; पुजारियों द्वारा शिवलिंग का अभिषेक ऊपरी मंजिल पर चढ़कर किया जाता है।
सोमाराम (भीमावरम) का शिवलिंग मान्यतानुसार चंद्र मास के साथ अपना रंग बदलता है—पूर्णिमा के निकट श्वेत और अमावस्या के निकट गहरा दिखाई देता है।
द्राक्षाराम एक साथ पंचाराम क्षेत्र और पूजित शक्तिपीठ है, जहाँ माता माणिक्याम्बा की पूजा होती है।
आंध्र प्रदेश के श्रद्धालु प्रायः कार्तिक मास में, विशेषकर उसके सोमवारों को, पंचाराम यात्रा का संकल्प लेते हैं।
Shiva
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