श्री सम्मेद शिखरजी
बीस तीर्थंकरों की निर्वाण भूमि और सिद्ध क्षेत्र का महातीर्थ
झारखंड के गिरिडीह में पारसनाथ पहाड़ी पर स्थित श्री सम्मेद शिखरजी जैन धर्म का सर्वोच्च सिद्ध क्षेत्र है, जहाँ चौबीस में से बीस तीर्थंकरों ने मोक्ष प्राप्त किया। 27 किलोमीटर की नंगे पांव वंदना और टोंकों के दर्शन से जन्म-जन्मांतर के कर्म कट जाते हैं और आत्मा को परम शांति व मुक्ति प्राप्त होती है।
त्वरित भक्ति मार्गदर्शिका (संक्षिप्त विवरण)
- •यह क्या है: जैन ब्रह्मांड विज्ञान का सर्वोच्च सिद्ध क्षेत्र। यह वह परम पावन पर्वत है जहाँ चौबीस में से बीस तीर्थंकरों (भगवान अजितनाथ से लेकर भगवान पार्श्वनाथ तक) ने अपनी नश्वर काया का त्याग कर मोक्ष (संसार चक्र से मुक्ति) प्राप्त किया।
- •दर्शन व जप का फल: शास्त्र वचन है कि इस पवित्र भूमि पर निष्कपट भाव से रखा गया एक-एक कदम जन्म-जन्मांतर के संचित कर्मों को भस्म कर देता है। यहाँ णमोकार महामंत्र का जप और प्रत्येक टोंक पर चरण पादुकाओं का पूजन आत्मा को निर्मल कर मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।
- •कब जाएं: यात्रा के लिए सर्वोत्तम समय अक्टूबर से मार्च तक का है जब मौसम सुहावना और शीतल रहता है। कार्तिक पूर्णिमा, चैत्र सुद तेरस (महावीर जयंती), पौष दशमी (पार्श्वनाथ निर्वाण कल्याणक) तथा पर्युषण/दशलक्षण महापर्व पर यहाँ की वंदना अत्यंत पुण्यदायी मानी जाती है।
- •कहाँ स्थित है: गिरिडीह जिला, झारखंड। पारसनाथ वन्यजीव अभयारण्य में स्थित पारसनाथ पहाड़ी (सर्वोच्च शिखर लगभग 1,350 मीटर / 4,430 फीट)। आधार स्थल: मधुबन (निकटतम रेलवे स्टेशन: पारसनाथ, दूरी लगभग 22 किमी)।
- •विधि एवं नियम:
- 1.पवित्रता व वेशभूषा: पूर्णतः अहिंसक आचरण; चमड़े, रेशम अथवा किसी भी पशु उत्पाद का प्रवेश वर्जित है। सादे, शुद्ध, बिना सिले श्वेत सूती वस्त्र (पुरुषों के लिए धोती-दुपट्टा, महिलाओं के लिए सादा साड़ी/सूट) पहनें।
- 2.यात्रा समय: यात्री ब्रह्म मुहूर्त (रात्रि 2:30 से 3:30 बजे) में मधुबन से नंगे पांव 27 किलोमीटर की वंदना प्रारंभ करते हैं ताकि दोपहर की धूप से पहले अधिकांश टोंकों के दर्शन हो सकें।
- 3.उपवास व मौन: अधिकांश श्रद्धालु निर्जल या सजल उपवास रखते हैं और मौनपूर्वक भक्तामर स्तोत्र अथवा णमोकार मंत्र का निरंतर ध्यान करते हैं।
- 4.परिक्रमा मार्ग: गंधर्व नाला मार्ग से चढ़ाई कर मुख्य पर्वत कटक पर 31 टोंकों के दर्शन करें, भगवान पार्श्वनाथ टोंक (स्वर्णभद्र कूट) पर सर्वोच्च भक्ति अर्पित करें और शीतल नाला मार्ग से सूर्यास्त से पूर्व मधुबन लौटें।
पावन उद्गम एवं शास्त्रोक्त पृष्ठभूमि
जैन कालचक्र के अनुसार प्रत्येक उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी काल में चौबीस तीर्थंकर धर्म तीर्थ का प्रवर्तन करते हैं। जहाँ प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव ने अष्टापद (कैलाश), भगवान वासुपूज्य ने चंपापुरी, भगवान नेमिनाथ ने गिरनार और भगवान महावीर ने पावापुरी में निर्वाण पाया, वहीं अन्य सभी बीस तीर्थंकरों ने अपने अंतिम शुक्ल ध्यान और निर्वाण के लिए श्री सम्मेद शिखरजी की शांत एवं दिव्य पर्वत श्रेणियों को चुना।
आवश्यक सूत्र और निर्वाण काण्ड के अनुसार, यह पर्वत अनादि काल से सिद्ध भूमि रहा है। यहाँ की मिट्टी अनंत केवलज्ञानियों और मुनिराजों के चरण रज से पावन है। जब किसी तीर्थंकर का अंतिम समय निकट आता था, तो वे यहाँ आकर अनशन व्रत अंगीकार करते थे। निर्वाण के क्षण देवगण स्वर्ग से उतरकर मोक्ष कल्याणक महोत्सव मनाते थे।
इस पर्वत की सर्वोच्च चोटी 'स्वर्णभद्र कूट' तेईसवें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ को समर्पित है। ईसा पूर्व 8वीं शताब्दी में यहीं भगवान पार्श्वनाथ ने घोर तपस्या के उपरांत मोक्ष प्राप्त किया था। उनके इस पावन संबंध के कारण ही इस संपूर्ण पर्वतमाला को 'पारसनाथ पहाड़' के नाम से जाना जाने लगा।
प्रमुख पावन टोंक एवं तीर्थ स्थल
संत परंपरा एवं ऐतिहासिक धरोहर
सहस्राब्दियों से यह पर्वतराज महान आचार्यों और सम्राटों की तपस्या का साक्षी रहा है। मगध और मौर्य काल के राजाओं से लेकर आचार्य कुंदकुंद, आचार्य समंतभद्र, आचार्य हेमचंद्रसूरी तक सभी ने इस पावन भूमि की वंदना कर अपने जीवन को धन्य माना।
मध्यकाल में सेठ आनंदजी कल्याणजी पेढ़ी और सेठ जगडूशाह जैसे परम श्रावकों ने विशाल संघ निकालकर इन टोंकों और मंदिरों का जीर्णोद्धार कराया। आज भी दिगंबर और श्वेतांबर दोनों परंपराएं इस पर्वत के कण-कण को पूजनीय मानकर इसकी पवित्रता और पर्यावरण की रक्षा के लिए समर्पित हैं।
पवित्र स्तोत्र एवं ध्यान
निर्वाण काण्ड, गाथा 2 (प्राकृत):
वीसं तु जिणवरिंदा अमरासुरवंदिदा धुदकिलेसा ।
सम्मेदे गिरिसिहरे णिव्वाणगया णमो तेसिं ॥
भावार्थ:
"देवों और असुरों से वन्दित, क्लेशों को नष्ट कर चुके बीस जिनवरेन्द्र सम्मेद पर्वत के शिखर पर निर्वाण को प्राप्त हुए; मैं उन्हें नमन करता हूँ।"
क्या आप जानते हैं?
वर्तमान काल के २४ तीर्थंकरों में से २० तीर्थंकरों ने इसी पावन पर्वत से मोक्ष प्राप्त किया, जो इसे ब्रह्मांड का सबसे बड़ा सिद्ध क्षेत्र बनाता है।
शिखरजी की वंदना लगभग २७ किलोमीटर की अत्यंत कठिन पैदल परिक्रमा है, जिसे श्रद्धालु प्रायः नंगे पैर और उपवास रखकर एक ही दिन में पूर्ण करते हैं।
पारसनाथ पहाड़ी झारखंड राज्य की सबसे ऊंची पर्वत चोटी है, जिसकी समुद्र तल से ऊंचाई लगभग १,३५० मीटर (४,४३० फीट) है।
पर्वत पर स्थित प्रत्येक 'टोंक' उस सटीक स्थान को दर्शाती है जहाँ संबंधित तीर्थंकर ने अंतिम शुक्ल ध्यान लगाकर मोक्ष प्राप्त किया था।
श्रद्धालु पर्वत पर कभी भी सूर्यास्त के बाद अन्न-जल ग्रहण नहीं करते तथा टोंकों पर केवल शुद्ध लौंग, कपूर और भाव-पूजा अर्पित करते हैं।
Mahavira
जैन धर्म से और
संबंधित शिक्षाएं
एक ही शिक्षा, विभिन्न परंपराओं में प्रतिध्वनित
