देवशयनी एकादशी व्रत कथा (आषाढ़ शुक्ल)
आषाढ़ शुक्ल पक्ष की हरिशयनी एकादशी की पावन कथा, जिससे चातुर्मास का शुभारम्भ होता है और भगवान विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा में प्रविष्ट होते हैं।
भविष्योत्तर एवं पद्म पुराण से उद्गम
भविष्योत्तर पुराण एवं पद्म पुराण के उत्तर खण्ड के तिरपनवें अध्याय के अनुसार धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा:
"हे मधुसूदन! आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का क्या नाम है? इस दिन किस देवता का पूजन किया जाता है तथा इसका क्या महत्व है? कृपा कर मुझे विस्तार से बताइए।"
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा:
"हे राजन्! आषाढ़ शुक्ल एकादशी को देवशयनी एकादशी अथवा हरिशयनी एकादशी और पद्मा एकादशी कहा जाता है। इसी दिन से मैं चार मास के लिए क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर योगनिद्रा में शयन करता हूँ। इस दिन व्रत रखने वाले के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और वह परम गति को प्राप्त होता है।"
चक्रवर्ती राजा मान्धाता के राज्य का अकाल
श्रीकृष्ण ने प्राचीन काल के सूर्यवंशी, श्रीराम के पूर्वज, धर्मात्मा राजा मान्धाता की पावन कथा सुनाई। मान्धाता अपनी प्रजा का पालन इतनी धर्मपूर्वक करते थे कि प्रजा उन्हें पिता के समान मानती थी। फिर भी प्रारब्धवश उनके राज्य में लगातार तीन वर्षों तक घोर अकाल पड़ा; वर्षा का एक बूँद भी धरती पर न गिरा, अन्न सूख गया, नदियाँ-सरोवर धूल में बदल गए, और प्रजा अन्न-जल के बिना तड़पकर हाहाकार करने लगी।
राजा की उपाय-खोज
अपनी धर्मपूर्ण राजसत्ता के बावजूद प्रजा पर टूटे इस संकट से व्यथित होकर राजा मान्धाता निवारण की खोज में एकाकी वन की ओर निकल पड़े। उनकी खोज उन्हें ब्रह्मा जी के मानस पुत्र महर्षि अंगिरा के आश्रम तक ले गई। राजा ने महर्षि के चरणों में प्रणाम कर अपने राज्य का सम्पूर्ण संकट विस्तार से बताया और इसके निवारण का उपाय पूछा।
महर्षि अंगिरा का परामर्श
महर्षि अंगिरा ने कहा कि जिस सत्ययुग में मान्धाता राज्य कर रहे थे, उसमें इतने ही शुद्ध उपाय की आवश्यकता थी, और उन्होंने आदेश दिया:
"हे राजन्! समस्त संकटों का नाश करने वाली आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी का व्रत करो। अपनी प्रजा सहित भगवान विष्णु का विधि-विधान से पूजन करो, श्वेत पुष्प और दीप अर्पित करो। इससे अवश्य ही भगवान की कृपा से वृष्टि होगी।"
व्रत का पालन और अकाल का अन्त
राजा मान्धाता राज्य लौटकर महर्षि के कहे अनुसार पूरी प्रजा के साथ श्रद्धापूर्वक देवशयनी एकादशी का व्रत किया। इस सम्मिलित व्रत से प्राप्त पुण्य के प्रभाव से कुछ ही दिनों में आकाश में काले मेघ घिर आए और मूसलाधार वर्षा हुई। अकाल समाप्त हो गया, खेत पुनः हरे-भरे हो गए, और राज्य में शांति लौट आई।
अकाल क्यों आया: धर्मपूर्ण राजा की परीक्षा
यह कथा अकाल को मान्धाता के किसी विशेष दोष का दण्ड बताकर नहीं समझाती, और यह विवरण स्मरणीय है। इन पौराणिक आख्यानों में राज्य की समृद्धि केवल शासक की वैयक्तिक सदाचारिता पर नहीं, अपितु शासक और प्रजा दोनों की सम्मिलित भक्ति-भावना पर भी निर्भर करती है। मान्धाता का यह खोज किसी दोषी को दण्डित करने के लिए नहीं, अपितु उस सम्मिलित साधना को पुनः स्थापित करने के लिए था जो राज्य और वृष्टि के बीच संतुलन बनाए रखती है।
चातुर्मास का शुभारम्भ
देवशयनी एकादशी से चातुर्मास (श्रावण, भाद्रपद, आश्विन और कार्तिक—चार पवित्र माह) आरम्भ होता है, जिस अवधि में श्रीहरि योगनिद्रा में विश्राम करते माने जाते हैं। इस अवधि में विवाह आदि मांगलिक कार्य वर्जित होते हैं और गृहस्थ अपना समय ध्यान, स्वाध्याय और साधना में लगाते हैं। अनेक श्रद्धालु इन चार महीनों में एक समय भोजन (एकभुक्त) अथवा विशेष शाक-अन्न के त्याग का व्रत भी लेते हैं।
इस एकादशी के कई नाम
देवशयनी एकादशी को हरिशयनी भी कहा जाता है, क्योंकि इस दिन हरि अपनी योगनिद्रा आरम्भ करते हैं, और पद्मा एकादशी भी, जो इसके पद्म पुराण-वर्णित नाम से जुड़ा है। कुछ परम्पराओं में इसे आषाढ़ी एकादशी भी कहा जाता है, और महाराष्ट्र में यह दिन पण्ढरपुर की वार्षिक वारी का चरम बिंदु है, जब हजारों वारकरी भक्त विठ्ठल मंदिर में इसी तिथि पर उपस्थित होने के लिए पैदल यात्रा करते हैं। इतने नामों की बहुलता यह दर्शाती है कि यह व्रत विविध क्षेत्रीय परम्पराओं में कितनी व्यापकता से मनाया जाता है, जबकि मूल व्रत—विष्णु के विश्राम को समर्पित उपवास—सर्वत्र एक समान रहता है।
संकल्प, व्रत-नियम तथा पूजा का समय
भक्त सूर्योदय से पूर्व संकल्प लेकर व्रत आरम्भ करते हैं, जिसमें श्रीहरि के विश्राम को समर्पित उपवास का उद्देश्य निश्चित किया जाता है। व्रत में सामान्यतः पूरे दिन अन्न का त्याग किया जाता है, और अनेक भक्त रात्रि के जागरण में जल अथवा फलाहार का ही कठोर नियम रखते हैं। प्रातःकाल भगवान की प्रतिमा को पंचामृत और जल से स्नान कराया जाता है, और सायंकाल भगवान को शयन कराने हेतु "सुप्ते त्वयि जगन्नाथ जगत् सुप्तं भवेदिदम्। विबुद्धे त्वयि बुध्येत जगत् सर्वं चराचरम्॥" मन्त्र के साथ पीले वस्त्र, पीले गेंदे के पुष्प और तुलसीदल अर्पित किए जाते हैं।
द्वादशी पारण
व्रत का पारण द्वादशी के प्रातःकाल सूर्योदय के पश्चात और उस दिन की पूजा सम्पन्न होने के बाद किया जाता है, जब भक्त गौ-सेवा और अतिथि-भोजन के पश्चात ही स्वयं भोजन करते हैं। इस कथा की शिक्षा यही है कि देवशयनी एकादशी का पुण्य केवल एक घर की भक्ति तक सीमित नहीं रहता: एक राज्य की सम्मिलित, सच्ची आस्था ही उस तीन वर्ष के अकाल को समाप्त करने में पर्याप्त हुई, जिसे राजा की अपनी धर्मपूर्ण सत्ता भी अकेले न रोक सकी थी, और प्रतिवर्ष यही व्रत भक्ति तथा वृष्टि के बीच के उस संतुलन को पुनः स्थापित करने वाला माना जाता है।
क्या आप जानते हैं?
इस दिन से पवित्र चातुर्मास (चार मास का तप एवं साधना काल) आरम्भ होता है।
भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग पर चार महीने के लिए योगनिद्रा में शयन करते हैं।
इस व्रत के पुण्य प्रभाव से राजा मान्धाता के राज्य में तीन वर्ष का भीषण सूखा समाप्त हुआ था।
चार माह बाद कार्तिक शुक्ल देवउठनी एकादशी को भगवान विष्णु के जागने पर चातुर्मास समाप्त होता है।
पीठासीन स्वरूप एवं पारण
यह व्रत भगवान वामन (श्रीहरि) को समर्पित है; इसका पारण द्वादशी तिथि में सूर्योदय के पश्चात तथा हरि वासर समाप्त होने के बाद ही सात्विक रूप से किया जाता है।
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