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इन्दिरा एकादशी व्रत कथा (पितृ पक्ष / आश्विन कृष्ण पक्ष)

इन्दिरा एकादशी व्रत कथा (पितृ पक्ष / आश्विन कृष्ण पक्ष)

ब्रह्मवैवर्त पुराण में वर्णित आश्विन कृष्ण पक्ष (पितृ पक्ष) की इन्दिरा एकादशी की पावन कथा, जिसमें देवर्षि नारद के उपदेश से राजा इन्द्रसेन ने अपने पितरों को यमलोक के कष्ट से मुक्त कराकर वैकुण्ठ भेजा था।

ब्रह्मवैवर्त पुराण से श्रीकृष्ण-युधिष्ठिर संवाद

ब्रह्मवैवर्त पुराण और पद्म पुराण के अनुसार धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा:

"हे प्रभु! आश्विन मास के कृष्ण पक्ष (पितृ पक्ष) की एकादशी का क्या नाम है? इसकी पावन कथा और पितरों के उद्धार का क्या महत्व है? कृपा करके मुझे बताइए।"

भगवान श्रीकृष्ण ने कहा:

"हे राजन्! आश्विन कृष्ण पक्ष की एकादशी को इन्दिरा एकादशी कहा जाता है। यह एकादशी पितरों को यमलोक के कष्टों से मुक्त कराकर सीधे वैकुण्ठ लोक भेजने वाली परम कल्याणकारी तिथि है।"

पाठ देखने के इच्छुक पाठकों के लिए: पद्म पुराण के उत्तरखण्ड (समापन खण्ड) में, एन. ए. देशपांडे के अंग्रेज़ी अनुवाद की अध्याय-संख्या के अनुसार, यह एकादशी अध्याय 58 में कही गई है, जहाँ श्रीकृष्ण युधिष्ठिर को महिष्मती के राजा इन्द्रसेन के पास देवर्षि नारद के आगमन की कथा सुनाते हैं। संस्करणों और अनुवादों में अध्याय-संख्या भिन्न हो सकती है, इसलिए इसे केवल उस अनुवाद के लिए मार्गदर्शक मानें।

देवर्षि नारद का राजा इन्द्रसेन की सभा में आगमन

प्राचीन काल में माहिष्मती नगरी में राजा इन्द्रसेन राज्य करते थे। वे भगवान विष्णु के परम भक्त और धर्मात्मा राजा थे।

एक दिन देवर्षि नारद वीणा बजाते हुए राजा इन्द्रसेन की राजसभा में पधारे। राजा ने मुनि का पाद्य-अर्घ्य से स्वागत किया।

नारद जी ने कहा:

"हे राजन्! मैं यमलोक गया था। वहाँ यमराज की सभा में मैंने आपके स्वर्गीय पिता को देखा। उन्होंने मुझे आपके लिए एक सन्देश दिया है।"

पिता का सन्देश और नारद जी का उपदेश

राजा इन्द्रसेन ने व्याकुल होकर पूछा:

"हे मुनिवर! मेरे पिता धर्मात्मा थे, फिर वे यमलोक में क्यों हैं?"

नारद जी ने कहा:

"हे राजन्! पूर्वजन्म में किसी व्रत के भंग होने के कारण वे अभी तक स्वर्ग नहीं जा सके हैं। उन्होंने कहा है कि मेरा पुत्र इन्द्रसेन यदि आश्विन कृष्ण पक्ष की इन्दिरा एकादशी का व्रत रखकर उसका पुण्य मुझे समर्पित कर दे, तो मेरी यमलोक से मुक्ति हो जाएगी।"

राजा इन्द्रसेन ने हाथ जोड़कर इन्दिरा एकादशी के व्रत की विधि पूछी।

इन्दिरा एकादशी की विधि एवं पितृ तर्पण

नारद जी ने विधि बताई:

  1. 1.दशमी नियम: दशमी को नदी में स्नान कर पितरों का तर्पण करें और एक समय भोजन करें।
  2. 2.एकादशी उपवास: एकादशी के दिन प्रातः स्नान कर भगवान शालिग्राम का पूजन करें, पितरों के निमित्त काले तिल व जल से तर्पण करें।
  3. 3.पुण्य समर्पण: भगवान के समक्ष हाथ में जल लेकर संकल्प करें:

"हे प्रभु! मैं इस इन्दिरा एकादशी के व्रत का सम्पूर्ण फल अपने पिता के उद्धार हेतु समर्पित करता हूँ।"

  1. 4.रात्रि जागरण: रात्रि में भगवान के पावन नामों का कीर्तन करें।

पिता का उद्धार एवं वैकुण्ठ गमन

राजा इन्द्रसेन ने परिवार सहित इन्दिरा एकादशी का पूर्ण निष्ठा से व्रत रखा और अपने पिता को पुण्य समर्पित किया।

उसी क्षण आकाश से पुष्प-वृष्टि हुई। राजा ने देखा कि उनके पिता दिव्य पीताम्बर धारण कर पुष्पक विमान में बैठे हैं। पिता ने पुत्र को दीर्घायु और धर्म का आशीर्वाद दिया और कहा:

"हे पुत्र! तुम्हारे इन्दिरा एकादशी व्रत के प्रभाव से मुझे यमलोक से मुक्ति मिल गई है और मैं वैकुण्ठ जा रहा हूँ।"

राजा इन्द्रसेन ने भी जीवन पर्यन्त धर्मपूर्वक राज्य किया और अंत में वैकुण्ठ धाम को प्राप्त हुए।

पूजन एवं व्रत विधि

  1. 1.पितृ उद्धार का महाव्रत: पितृ पक्ष में पड़ने के कारण यह पितरों की शांति का सर्वश्रेष्ठ व्रत है।
  2. 2.शालिग्राम पूजन: भगवान शालिग्राम को पंचामृत से स्नान कराकर तुलसी दल अर्पित करें।
  3. 3.तिल तर्पण व गौ-सेवा: पितरों के निमित्त तिल तर्पण करें तथा गाय, कौवे और ब्राह्मण को भोजन कराएं।
  4. 4.पारण: द्वादशी के दिन प्रातः ब्राह्मण भोजन कराकर व्रत खोलें।

संकल्प और व्रत के समय का महत्व

दशमी की तैयारी आरम्भ होने से पहले ही गृहस्थ घर के मन्दिर या नदी-तट पर संकल्प लेता है, जिसमें इन्दिरा एकादशी का नाम लिया जाता है, जिस पूर्वज के लिए पुण्य समर्पित किया जाना है उसका नाम लिया जाता है, और व्रत को पारण तक बिना किसी त्रुटि के पूर्ण करने का संकल्प किया जाता है। यही संकल्प एक सामान्य संयम के दिन को एक विधिवत समर्पण में बदल देता है, जो शास्त्रानुसार यमलोक में स्थित आत्मा तक पहुँच सकता है; नारद जी राजा से कहते हैं कि इस संकल्प के बिना व्रत केवल तपस्या रहता है, समर्पण नहीं बनता।

दशमी का भोजन, एकादशी का उपवास और शालिग्राम-पूजन, तीनों का अपना निश्चित समय है। दशमी का एक समय भोजन सूर्यास्त से पहले लेना चाहिए, जिससे शरीर एकादशी में हल्का रहे; एकादशी की पूजा प्रातःकाल करना उत्तम है, और संध्या में पुनः जब परिवार तर्पण और रात्रि-जागरण के लिए एकत्र होता है। नारद जी चेतावनी देते हैं कि इन निश्चित समयों के बाहर व्रत और पूजा करने से वह पुण्य क्षीण हो जाता है जो यमलोक में प्रतीक्षा कर रहे पूर्वज तक पहुँचना चाहिए।

आध्यात्मिक शिक्षा

इन्दिरा एकादशी की शिक्षा उन एकादशियों से भिन्न है जो धन या सन्तान का वचन देती हैं: यह कहती है कि जीवित सन्तान का अपने दिवंगत पूर्वजों के प्रति एक ऋण है, और सही ढंग से समर्पित भक्ति जीवित और मृत के बीच की सीमा को पार कर सकती है। श्रीकृष्ण युधिष्ठिर को बताते हैं कि राजा इन्द्रसेन का व्रत केवल भगवान विष्णु को अमूर्त रूप से प्रसन्न करने के लिए नहीं था; संकल्प, तर्पण और रात्रि के जप के माध्यम से उसका सम्पूर्ण पुण्य एक ही पीड़ित आत्मा की ओर लक्षित था, और वह उस तक पहुँचा। यह कथा हर व्रती से यह स्मरण रखने को कहती है कि उनका सबसे सामान्य संयम भी, यदि स्पष्ट संकल्प के साथ समर्पित किया जाए, तो वही हो सकता है जिसकी प्रतीक्षा कोई पूर्वज कर रहा हो।

क्या आप जानते हैं?

आश्विन कृष्ण पक्ष में पितृ पक्ष (श्राद्ध पक्ष) के दौरान पड़ने वाली परम पावन एकादशी।

इसके व्रत का पुण्य समर्पित करने से पूर्वजों को यमलोक की यातनाओं से तत्काल मुक्ति मिलती है।

देवर्षि नारद के उपदेश से राजा इन्द्रसेन ने अपने पिता को वैकुण्ठ धाम भेजा था।

यह एकादशी व्रत और पितृ तर्पण दोनों के महापुण्य को एक साथ प्रदान करती है।

पीठासीन स्वरूप एवं पारण

यह व्रत भगवान पद्मनाभ को समर्पित है; इसका पारण द्वादशी तिथि में सूर्योदय के पश्चात तथा हरि वासर समाप्त होने के बाद ही सात्विक रूप से किया जाता है।

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