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Embroidered artwork for करवा चौथ: पति की लंबी उम्र के लिए रखा जाने वाला यह व्रत और इससे जुड़ी कहानियां: Embroidered Om symbol above a brass diya, marigolds and a temple spire at sunrise

करवा चौथ

पति की लंबी उम्र के लिए रखा जाने वाला यह व्रत और इससे जुड़ी कहानियां

करवा चौथ

पति की लंबी उम्र के लिए रखा जाने वाला यह व्रत और इससे जुड़ी कहानियां

करवा चौथ विवाहित हिंदू महिलाओं द्वारा पति की आयु और स्वास्थ्य हेतु रखा गया व्रत है, जिसमें इसकी विधि, समय और पारंपरिक कथा शामिल है।

पौराणिक पृष्ठभूमि एवं आध्यात्मिक महत्व

करवा चौथ, जिसे करक चतुर्थी भी कहा जाता है, सनातन धर्म में सुहागिन स्त्रियों द्वारा रखा जाने वाला अत्यंत प्राचीन व्रत है। इस व्रत का उल्लेख वामन पुराण तथा शिव पुराण में मिलता है, और यह प्रत्येक वर्ष कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है, जो सामान्यतः अक्टूबर या नवंबर में पड़ती है।

करवा शब्द टोंटीदार मिट्टी के उस घड़े का नाम है जो दिन भर के अनुष्ठानों में प्रयुक्त होता है, एक ऐसा पात्र जो जीवनदायिनी अमृत और शुभता का प्रतीक है। चौथ का अर्थ केवल चंद्र मास की वह चतुर्थी तिथि है जिस दिन यह व्रत पड़ता है। भक्त इस दिन को भगवान शिव, माता पार्वती, श्री गणेश तथा चंद्रदेव को समर्पित करते हैं, अपने पति की दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य और सुरक्षा के साथ दांपत्य बंधन की स्थिरता हेतु प्रार्थना करते हुए। सुहागिन कहलाने वाली विवाहित स्त्रियाँ इस व्रत को सबसे अधिक रखती हैं, जबकि कुंवारी स्त्रियाँ भी एक सुयोग्य जीवन-साथी की कामना से इसे रखती हैं।

ब्रह्म मुहूर्त सरगी विधान एवं प्रातः संकल्प

अनुष्ठान शुभ ब्रह्म मुहूर्त में, प्रातः लगभग चार से पाँच बजे के मध्य, पौ फटने से बहुत पहले आरंभ होते हैं।

  1. 1.सरगी की पावन परंपरा: सास अपनी बहू को सरगी भेंट करती है, जो सूर्योदय से पहले खाया जाने वाला पावन भोजन है। पारंपरिक सरगी में दीर्घकालिक जलयोजन हेतु अनार, सेब और केले जैसे मौसमी फल, धीमी ऊर्जा हेतु बादाम, काजू, किशमिश, अखरोट और खजूर जैसे सूखे मेवे, दूध में पकाई गई सेवई या फेनी, तथा मिठाई, नारियल और मठरी सम्मिलित होते हैं।
  2. 2.सरगी ग्रहण का समय: व्रती महिला यह भोजन प्रचुर जल के साथ पौ फटने से पूर्व ग्रहण करती है। समस्त खाना-पीना सूर्योदय से पहले ही पूर्णतः समाप्त कर लिया जाता है।
  3. 3.प्रातः कालीन संकल्प: स्नान के पश्चात् व्रती लाल, मैरून या पीले रंग के मांगलिक वस्त्र धारण करती है और पूर्व दिशा की ओर मुख करके यह पावन संकल्प लेती है:

मम सुखसौभाग्य पुत्रपौत्रादि सुस्थिर श्रीप्राप्तये करकचतुर्थी व्रतमहं करिष्ये।

अर्थ: मैं अपने अखंड सौभाग्य, संतान की कुशलता तथा स्थिर समृद्धि की प्राप्ति हेतु यह करक चतुर्थी व्रत करने का संकल्प लेती हूँ।

दिनचर्या एवं निर्जला व्रत के कठोर नियम

सूर्योदय के साथ ही व्रती निर्जला उपवास आरंभ करती है, अर्थात् दिन भर जल की एक बूंद या अन्न का एक कण भी ग्रहण नहीं किया जाता।

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    मानसिक संयम व नाम जप: दिनभर मन शांत चिंतन, शास्त्र-पाठ और जप में व्यतीत होता है। भक्त शिव-गौरी मंत्र 'ॐ उमामहेश्वराभ्यां नमः' तथा चंद्र मंत्र 'ॐ सोमाय नमः' का जप करते हैं।
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    पारंपरिक निषेध: स्त्रियाँ परंपरागत रूप से इस दिन कैंची, सुई या किसी भी धारदार औजार से जुड़े कार्य छोड़ देती हैं, अपनी ऊर्जा सामान्य कार्य के स्थान पर प्रार्थना की ओर मोड़ते हुए।
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    षोडश शृंगार: दोपहर में स्त्रियाँ हाथों व पैरों में मेहंदी रचाती हैं और संध्या की पूजा के लिए सोलह पारंपरिक शृंगार तैयार करती हैं, जिनमें लाल चूड़ियाँ, बिंदी, आलता और सिंदूर सम्मिलित हैं।

सायंकालीन पूजा विधि एवं बाया भेंट

दोपहर बाद, सामान्यतः चार से साढ़े पाँच बजे के मध्य, स्त्रियाँ सामूहिक पूजा के लिए एक साथ एकत्र होती हैं।

  1. 1.पूजा वेदी की स्थापना: एक स्वच्छ दीवार के सम्मुख वेदी सजाई जाती है, जिसमें करवा माता का चित्र, जो माता पार्वती का ही एक स्वरूप हैं, तथा शिव, पार्वती और गणेश की मिट्टी की प्रतिमाएँ रखी जाती हैं।
  2. 2.करवे का पूजन: करवा नामक मिट्टी के टोंटीदार घड़े में शुद्ध जल या कच्चा दूध भरा जाता है। इसकी टोंटी पर मौली नामक पावन धागा बांधा जाता है और रोली से स्वास्तिक बनाया जाता है। करवे के मुख पर रखे ढक्कन को सराई कहा जाता है, जिसमें गेहूं के दाने और शक्कर रखी जाती है।
  3. 3.पावन व्रत कथा का श्रवण:
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    रानी वीरावती की कथा: सात भाइयों की लाडली इकलौती बहन वीरावती अपने पहले करवा चौथ व्रत में भूख से मूर्छित होने लगी। चिंतित भाइयों ने दूर स्थित पीपल के पेड़ के पीछे दर्पण में दीपक की परछाई दिखाकर झूठा चंद्रोदय दिखा दिया, और वीरावती ने इस मिथ्या चंद्रमा को देखकर व्रत खोल दिया। तुरंत ही समाचार आया कि उसके पति की मृत्यु हो गई है। वह रोते हुए कठोर तप के साथ उसके शरीर की रखवाली करती रही, जब तक देवी पार्वती ने उसे इस छल के विषय में नहीं बताया। वीरावती ने तब पूर्ण श्रद्धा से व्रत को दोबारा रखा, और यमराज ने उसके पति को पुनः जीवन दिया।
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    सती करवा की कथा: पतिव्रता करवा ने देखा कि नदी में स्नान करते समय उसके पति को एक मगरमच्छ ने पकड़ लिया। अपने सत्य के बल पर उसने कच्चे सूत के धागे से उस जीव को बांध दिया और यमराज के सम्मुख जाकर अपने पति का प्राण माँगा। जब यमराज ने संकोच किया, तो उसने चेताया कि उसका सतीत्व स्वयं किसी भी अन्याय को ठीक कर सकता है। उसकी भक्ति से प्रभावित होकर यमराज ने मगरमच्छ को नरक भेजा और उसके पति को दीर्घ व सुखी जीवन का वरदान दिया।
  1. 4.थाली फेरने की रस्म: जब वरिष्ठ महिला कथा सुनाती है, तब स्त्रियाँ गोल घेरे में बैठकर अपनी पूजा-थालियों को सात बार दाएँ से बाएँ घुमाती हैं और पारंपरिक पंजाबी मंगल-गीत गाती हैं, जो 'वीरो कुड़िये करवाड़ा, सर्व सुहागन करवाड़ा' से आरंभ होता है।
  2. 5.सास को बाया अर्पण: पूजा के पश्चात् स्त्रियाँ अपनी सास को बाया भेंट करती हैं, जिसमें मिठाई, मेवे, वस्त्र और दक्षिणा होती है, उनके चरण स्पर्श करके 'सदा सुहागन रहो' का आशीर्वाद प्राप्त करती हैं।

चंद्र दर्शन, अर्घ्य एवं पारण विधान

चंद्रमा के उदय होने के साथ ही व्रत अपनी पूर्णता तक पहुँचता है।

  1. 1.पूजा थाल की सामग्री: व्रती पीतल या चांदी की थाली में टोंटीदार करवा, शुद्ध जल, कच्चा दूध और अक्षत, एक बारीक छलनी, घी का दीपक, धूप, फूल और मिठाई लेकर आती है।
  2. 2.चंद्रदेव को अर्घ्य: चंद्रमा दिखते ही व्रती दीपक जलाकर उसे छलनी पर रखती है। वह छलनी की जाली से चंद्रमा के दर्शन करती है और करवे की टोंटी से भूमि पर तीन बार जल की धारा अर्पित करती हुई यह मंत्र बोलती है:

क्षीरोदार्णवसम्भूत अत्रिनेत्रसमुद्भव। गृहाणार्घ्यं शशाङ्केश रोहिण्या सहितो मम॥

अर्थ: हे चंद्रदेव, जो क्षीरसागर और अत्रि मुनि के नेत्रों से प्रकट हुए, रोहिणी के सहित यह अर्घ्य स्वीकार करें।

  1. 3.पति दर्शन: चंद्रदेव को अर्घ्य देने के ठीक बाद पत्नी उसी छलनी को पति की ओर मोड़कर दीपक के प्रकाश में उसका मुख देखती है, फिर उसके चरण स्पर्श करके आशीर्वाद लेती है।
  2. 4.पारण का नियम: पति अपने हाथों से करवे का जल पत्नी को पिलाता है और उसे मिठाई का एक अंश खिलाता है। इस भाव के साथ दिन भर का निर्जला व्रत समाप्त होता है, और दंपति का बंधन साथ तथा सम्मान में नवीनीकृत होता है।

क्या आप जानते हैं?

तिथि और महत्व

करवा चौथ हर साल कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है। यह व्रत विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि के लिए रखती हैं। पूरे दिन निर्जला (बिना पानी) रहकर चंद्रमा देखने के बाद ही भोजन करने की परंपरा है।

वीरावती की कहानी

एक राजकुमारी वीरावती ने अपने भाइयों के कहने पर झूठे चंद्रमा (पेड़ पर लगी आग) को देखकर व्रत तोड़ दिया, जिससे उसका पति मर गया। बाद में भगवान शिव और पार्वती ने उसे पुनर्जीवन का वरदान दिया। इस कहानी से सीख मिलती है कि व्रत को सच्चे मन और श्रद्धा से रखना चाहिए।

करवा की कहानी

करवा नामक पतिव्रता स्त्री के पति को नदी में मगरमच्छ ने पकड़ लिया। करवा ने मगरमच्छ को अपने करवा (पानी के घड़े) से बांधकर यमराज के पास जाकर पति की जान मांगी। यमराज ने मगरमच्छ को मृत्यु के मुंह में भेजकर पति को जीवनदान दिया। यह कहानी स्त्री की शक्ति और समर्पण को दर्शाती है।

सरगी और व्रत विधि

व्रत के दिन महिलाएं सूर्योदय से पहले उठकर 'सरगी' (सास द्वारा भेजा गया विशेष भोजन) खाती हैं। फिर दिनभर निराहार रहकर शाम को सामूहिक रूप से व्रत की कथा सुनती हैं। चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद पति की उंगली से पानी पीकर व्रत खोलती हैं।

प्रतीकात्मकता

करवा चौथ केवल उपवास नहीं, बल्कि पति-पत्नी के प्रेम और पारिवारिक एकता का प्रतीक है। क्षेत्रीय मतभेदों के बावजूद मूल संदेश एक ही है—पत्नी अपने पति के प्रति निष्ठा और समर्पण बनाए रखे। आज भी भारत के कई हिस्सों में इसे बड़ी श्रद्धा से मनाया जाता है।

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