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Embroidered artwork for वट सावित्री व्रत कथा: सावित्री का सतीत्व और यमराज को मात देने की कहानी: Embroidered Om symbol above a brass diya, marigolds and a temple spire at sunrise

वट सावित्री व्रत कथा

सावित्री का सतीत्व और यमराज को मात देने की कहानी

वट सावित्री व्रत कथा

सावित्री का सतीत्व और यमराज को मात देने की कहानी

यह लेख वट सावित्री व्रत के महत्व, इसके पालन के समय, और उस प्रसिद्ध कथा को समझाता है जिसमें सावित्री ने अपनी भक्ति और चतुराई से यमराज को पराजित कर अपने पति सत्यवान को मृत्यु से वापस लाया। यह भी बताया गया है कि विवाहित स्त्रियाँ यह व्रत बरगद के पेड़ के नीचे क्यों रखती हैं।

पौराणिक पृष्ठभूमि एवं दो पंचांग परंपराएं

वट सावित्री व्रत सनातन संस्कृति में सुहाग की अमरता, सतीत्व की अमोघ शक्ति, तीक्ष्ण बुद्धि और मृत्यु पर जीवन के विजय का परम पावन महापर्व है।

इस व्रत का सर्वमान्य और प्रामाणिक आख्यान महाभारत के वन पर्व (पतिव्रता माहात्म्य पर्व, अध्याय 293–299) में प्राप्त होता है, जहाँ महर्षि मार्कंडेय ने वनवास के दौरान शोकाकुल धर्मराज युधिष्ठिर को सांत्वना देने हेतु सती सावित्री और सत्यवान की अमर कथा सुनाई थी। इसके अतिरिक्त स्कंद पुराण और भविष्य पुराण में भी इस व्रत की महिमा का विस्तृत गान किया गया है।

भारत के विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में पंचांग की गणना के भेद से यह पर्व दो अलग-अलग तिथियों को मनाया जाता है:

  1. 1.वट सावित्री अमावस्या (पूर्णिमांत पंचांग): ज्येष्ठ मास की कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि को मनाया जाता है। यह मुख्य रूप से उत्तर और पूर्वी भारत (उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, पंजाब, बंगाल तथा ओडिशा, जहाँ इसे 'सावित्री अमावस्या' कहते हैं) में अत्यधिक श्रद्धा से मनाया जाता है।
  2. 2.वट पूर्णिमा (अमांत पंचांग): ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है। यह मुख्य रूप से पश्चिम और दक्षिण भारत (महाराष्ट्र, गुजरात, गोवा और कर्नाटक) में 'वट पूर्णिमा' के रूप में धूमधाम से मनाया जाता है।

दोनों तिथियों में पक्ष भर, अर्थात पंद्रह दिनों, का अंतर होने के उपरांत भी दोनों का आध्यात्मिक उद्देश्य, पूजा विधान, सामग्री और पावन कथा सर्वथा एक समान हैं।

पावन व्रत कथा: सावित्री की अदम्य मेधा और अखंड तप

दिव्य कन्या का प्राकट्य

मद्र देश के धर्मात्मा राजा अश्वपति संतानहीन थे। उन्होंने संतान की कामना से अठारह वर्षों तक प्रतिदिन एक लाख सावित्री गायत्री मंत्रों का जप करते हुए घोर तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर देवी सावित्री ने प्रकट होकर उन्हें एक परम रूपवती, विदुषी और तेजस्वी कन्या का वरदान दिया। राजा ने देवी के नाम पर उस कन्या का नाम 'सावित्री' रखा।

जब सावित्री विवाह योग्य हुईं, तो उनके दिव्य तेज और ज्ञान के आगे कोई भी राजकुमार उनके समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखने का साहस न कर सका। तब राजा अश्वपति ने सावित्री से स्वयं देशाटन कर अपने योग्य वर चुनने का निवेदन किया।

सत्यवान का वरण और देवर्षि नारद की भविष्यवाणी

वन-उपवनों में भ्रमण करते हुए सावित्री की दृष्टि शाल्व देश के निर्वासित राजकुमार सत्यवान पर पड़ी। सत्यवान के पिता राजा द्युमत्सेन अंधे हो चुके थे और उनके शत्रुओं ने उनका राज्य छीन लिया था, जिससे वे वन में संन्यासियों जैसा जीवन व्यतीत कर रहे थे। सत्यवान सत्यवादी, धर्मपरायण, माता-पिता के परम भक्त और समस्त सद्गुणों से संपन्न थे। सावित्री ने उन्हें अपने पति के रूप में चुन लिया।

जब सावित्री राजमहल लौटीं, तो वहां देवर्षि नारद उपस्थित थे। सावित्री द्वारा सत्यवान का वरण करने की बात सुनकर नारद जी ने भारी मन से कहा:

“हा! सावित्री ने अनजाने में यह क्या अनर्थ कर दिया! सत्यवान में हरिश्चंद्र जैसा सत्य, रंतिदेव जैसी उदारता और श्रीराम जैसा धर्म है, किंतु उसके जीवन में केवल एक ही भारी दोष है—आज से ठीक एक वर्ष पश्चात उसकी आयु समाप्त हो जाएगी और वह काल का ग्रास बन जाएगा।”

राजा अश्वपति घबरा गए और उन्होंने सावित्री से किसी अन्य राजकुमार को चुनने का आग्रह किया। किंतु दृढ़निश्चयी सावित्री ने कहा:

सकृदंशो निपतति सकृत्कन्या प्रदीयते। सकृदाह ददानीति त्रीण्येतानि सकृत्सकृत्॥

(अर्थ: “पैतृक संपत्ति का विभाजन जीवन में एक बार होता है; कन्यादान एक बार किया जाता है; और दिया हुआ वचन एक बार दिया जाता है। मेरा मन सत्यवान का एक बार वरण कर चुका है, अब वे चाहे अल्पायु हों या दीर्घायु, मेरे पति केवल वही हैं।”)

सावित्री का विवाह सत्यवान से हुआ और वे राजसी सुख-वैभव का त्याग कर वन में सास-ससुर और पति की सेवा में लीन हो गईं।

तीन दिन का कठोर त्रिरात्र व्रत

सावित्री सत्यवान की मृत्यु की तिथि का गुप्त रूप से एक-एक दिन गिन रही थीं। जब मृत्यु का समय निकट आया, तो उन्होंने तीन दिन और तीन रात का अत्यंत कठोर 'त्रिरात्र व्रत' रखा, जिसमें उन्होंने अन्न और जल का पूर्ण त्याग कर दिया। नियत दिन सत्यवान कुल्हाड़ी लेकर लकड़ी काटने वन में जाने लगे, तो सावित्री भी उनके साथ वन में गईं।

दोपहर के समय लकड़ी काटते हुए सत्यवान को अचानक असहनीय सिरदर्द हुआ। वे व्याकुल होकर एक विशाल वट वृक्ष, अर्थात बरगद के पेड़, के नीचे सावित्री की गोद में सिर रखकर लेट गए और मूर्छित हो गए।

यमराज से संवाद एवं पांच दुर्लभ वरदान

उसी समय दिशाओं में अंधकार छा गया और यमराज (धर्मराज) साक्षात प्रकट हुए—रक्तवर्ण वस्त्र, हाथ में कालपाश और श्याम वर्ण। यमराज ने सत्यवान के शरीर से अंगूठे के बराबर जीवात्मा को पाश में बांधकर दक्षिण दिशा की ओर प्रस्थान किया।

सावित्री बिना किसी भय के यमराज के पीछे-पीछे चलने लगीं। यमराज ने उन्हें वापस लौटने का आदेश दिया, किंतु सावित्री ने धर्म, सत्य, सत्संग और अहिंसा पर ऐसे सारगर्भित और शास्त्रीय विचार प्रकट किए कि मृत्यु के देवता विस्मित रह गए। प्रसन्न होकर यमराज ने पति के प्राणों के अतिरिक्त कोई भी वर मांगने को कहा।

सावित्री ने अपनी कुशाग्र बुद्धि से एक के बाद एक पांच वरदान मांगे:

  1. 1.प्रथम वरदान: मेरे अंधे सास-ससुर की आंखों की ज्योति वापस मिल जाए और वे स्वस्थ हों। (यमराज ने कहा—तथास्तु)।
  2. 2.दूसरा वरदान: मेरे ससुर का छीना हुआ राज्य उन्हें पुनः प्राप्त हो जाए। (तथास्तु)।
  3. 3.तीसरा वरदान: मेरे पिता अश्वपति को सौ पुत्र प्राप्त हों ताकि उनका वंश आगे बढ़े। (तथास्तु)।
  4. 4.चौथा वरदान: मुझे सत्यवान से सौ पराक्रमी और धर्मात्मा पुत्र प्राप्त हों। (यमराज ने बिना सोचे कह दिया—तथास्तु!)।

जब यमराज चलने लगे, तो सावित्री ने मुस्कुराकर कहा:

“हे धर्मराज! आपने मुझे सौ पुत्रों का वरदान दिया है, किंतु एक पतिव्रता नारी अपने पति के बिना किसी अन्य पुरुष का स्पर्श भी नहीं कर सकती। अतः आपका वरदान तभी सत्य सिद्ध हो सकता है जब आप मेरे पति सत्यवान को जीवित करें!”

यमराज सावित्री की बुद्धिमत्ता, पातिव्रत धर्म और अगाध प्रेम से पराजित हो गए। उन्होंने तत्काल सत्यवान के प्राण पाश से मुक्त कर दिए और उन्हें चार सौ वर्ष की नव-आयु प्रदान की। साथ ही वरदान दिया कि जो भी सुहागिन इस दिन वट वृक्ष के नीचे सावित्री का स्मरण कर व्रत रखेगी, उसका सुहाग सदा अखंड रहेगा। सावित्री जब वट वृक्ष के नीचे लौटीं, तो सत्यवान ऐसे जाग उठे जैसे कोई मीठी नींद से जागा हो। घर लौटने पर उनके सास-ससुर की आंखें और राज्य सब वापस मिल चुके थे।

वट वृक्ष (अक्षय वृक्ष) की त्रिदेवात्मक महिमा

इस व्रत का पूजन अनिवार्य रूप से वट वृक्ष, अर्थात बरगद, के नीचे किया जाता है:

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    त्रिदेवों का साक्षात वास: स्कंद पुराण के अनुसार वट वृक्ष की जटाओं व जड़ों में भगवान ब्रह्मा, तने में भगवान श्री विष्णु और शाखाओं व पत्तों में देवाधिदेव महादेव शिव वास करते हैं।
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    अक्षय एवं अमरता का प्रतीक: बरगद का पेड़ कभी नष्ट नहीं होता; इसकी जटाएं जमीन में धंसकर नए तने का रूप ले लेती हैं, इसलिए इसे 'अक्षय वट' कहा जाता है। इसके पूजन से पति को भी वृक्ष की भांति दीर्घायु प्राप्त होती है।
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    सावित्री का संजीवन स्थल: इसी वट वृक्ष की छाया में सावित्री ने सत्यवान के निर्जीव शरीर की रक्षा की थी और यमराज से उनके प्राण पुनः प्राप्त किए थे।

संकल्प एवं दिन का व्रत अनुशासन

प्रातःकालीन पूजा से पूर्व सुहागिन महिला भगवान विष्णु और देवी सावित्री के समक्ष विधिवत संकल्प लेती है। दाहिने हाथ में जल लेकर वह तिथि का नाम लेती है और अपने पति के अखंड सौभाग्य व दीर्घायु हेतु वट सावित्री व्रत तथा पूजन करने का संकल्प लेती है, तथा दिन भर के तप और आगामी वृक्ष परिक्रमा को इसी उद्देश्य हेतु समर्पित करती है।

अनेक महिलाएं इस दिन सावित्री के त्रिरात्र व्रत के स्मरण में पूर्ण उपवास रखती हैं और पारण तक अन्न-जल ग्रहण नहीं करतीं। जो महिलाएं पूर्ण उपवास नहीं रख सकतीं, वे एक समय सात्विक भोजन लेती हैं, परन्तु प्याज-लहसुन से दूर रहकर दिन को पूजा और प्रार्थना में व्यतीत करती हैं।

पूजन सामग्री एवं 108 परिक्रमा विधान

प्रातःकाल सभी सुहागिन महिलाएं सोलह शृंगार कर एकत्रित होती हैं:

  1. 1.पूजन सामग्री:
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    भीगा हुआ काला चना (पूजा का मुख्य नैवेद्य)।
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    मौसमी फल (पके आम, कटहल, खरबूजा, तरबूज, केला)।
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    गेहूं के आटे और गुड़ से बने मीठे गुलगुले या पुए।
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    कच्चा सूत (सफेद या पीला बिना कता हुआ धागा) अथवा कलावा।
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    बांस का हाथ से झलने वाला पंखा (बेंत का पंखा)।
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    रोली, अक्षत, सिंदूर, फूल, धूप, दीप और तांबे के लोटे में जल।
  1. 2.वट वृक्ष की पूजा एवं परिक्रमा:
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    वट वृक्ष की जड़ में जल अर्पित कर रोली, अक्षत और सिंदूर लगाएं। भीगा चना और फल अर्पित करें।
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    हाथ में कच्चे सूत की अटी लेकर वट वृक्ष के तने पर लपेटते हुए 7 बार, या परम्परानुसार 108 बार, परिक्रमा की जाती है।
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    परिक्रमा करते हुए सुहाग रक्षा मंत्र का जप किया जाता है:

अवैधव्यं च सौभाग्यं देहि मे वरदे शिवे। पुत्रान् पौत्रांश्च सौख्यं च गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तु ते॥

  1. 3.पंखा झलने की रस्म: बांस के पंखे से वट वृक्ष और भगवान को हवा झली जाती है, जो सावित्री द्वारा मूर्छित सत्यवान को पंखा झलने की पावन स्मृति का प्रतीक है।
  2. 4.कथा श्रवण: वृक्ष की छांव में बैठकर सभी महिलाएं महाभारत कालीन सावित्री-सत्यवान की अमर कथा सुनती हैं और एक-दूसरे की मांग में सिंदूर लगाकर अखंड सुहाग की शुभकामनाएं देती हैं।

भीगे चने से पारण का विशिष्ट नियम

वट सावित्री व्रत का पारण सनातन परंपरा में अत्यंत अनूठा है:

  1. 1.सात या ग्यारह चने निगलने का नियम: पूजा समाप्त होने के पश्चात व्रती महिला 7 या 11 भीगे हुए साबुत काले चने तथा वट वृक्ष की एक कोमल कली (वट-अंकुर) को बिना दांतों से चबाए जल के साथ साबुत निगलती है। यह निगलना उस नव-जीवन और प्राण-शक्ति का प्रतीक है जो सावित्री ने सत्यवान के भीतर पुनः स्थापित की थी।
  2. 2.पति व सास का सम्मान: घर आकर पत्नी बांस के पंखे से पति को हवा झलती है और पूजा का भीगा चना, फल, मिठाई व दक्षिणा अपनी सास को भेंट कर उनके चरण स्पर्श करती है।
  3. 3.सात्विक पारण: इसके पश्चात आम, पूरी और सात्विक पकवान खाकर व्रत का पारण किया जाता है।

क्या आप जानते हैं?

व्रत का नाम और समय

वट सावित्री व्रत का नाम बरगद (वट) वृक्ष और सावित्री की कथा से जुड़ा है। यह व्रत ज्येष्ठ महीने में रखा जाता है, लेकिन तारीख में क्षेत्रीय भिन्नता है – कुछ जगह अमावस्या को तो कुछ पूर्णिमा को मनाते हैं।

कथा का स्रोत

यह कहानी महाभारत के वनपर्व में आती है। इसमें राजा अश्वपति की पुत्री सावित्री ने अपनी बुद्धि और भक्ति से यमराज को पराजित कर अपने पति सत्यवान को मृत्यु से वापस लाया।

सावित्री का व्रत और यमराज का पीछा

सावित्री ने विवाह के एक वर्ष पूरे होने से तीन दिन पहले निर्जला व्रत रखा। जब सत्यवान की मृत्यु हुई, तो वह यमराज के पीछे चलती गई और उन्होंने तीन वरदान दिए – सास-ससुर की दृष्टि और राज्य, पिता को पुत्र, और राज्य में वंश की निरंतरता।

बरगद के पेड़ का महत्व

इस व्रत में बरगद के पेड़ की पूजा की जाती है क्योंकि यह दीर्घायु और स्थिरता का प्रतीक है। स्त्रियाँ पेड़ की जड़ों में जल चढ़ाती हैं और उसके चारों ओर सूत लपेटती हैं।

व्रत का उद्देश्य

यह व्रत विवाहित स्त्रियाँ अपने पति की लंबी उम्र और अच्छे स्वास्थ्य के लिए रखती हैं। यह पत्नी की भक्ति और बुद्धि का अद्भुत उदाहरण है, जो सावित्री की कहानी से प्रेरित है।

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