तीज व्रत कथा
देवी पार्वती का तप और सावन में व्रत का महत्व
यह लेख तीज व्रत की कहानी बताता है, जो देवी पार्वती द्वारा भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए किए गए कठोर तप से जुड़ी है। सावन मास में महिलाएं यह व्रत पति की लंबी उम्र और सुखी दांपत्य जीवन के लिए रखती हैं।
सनातन संस्कृति में तीज के तीन पावन पर्व
तीज सनातन धर्म में सुहाग, दांपत्य प्रेम, प्रकृति और शिव-पार्वती के मिलन का महापर्व है। वर्षा ऋतु के आगमन पर जब प्रकृति हरितिमा की चादर ओढ़ लेती है, तब यह पर्व मनाया जाता है। वर्ष भर में तीन प्रमुख तीज व्रत मनाए जाते हैं, प्रत्येक की अपनी विशेष परम्परा है:
- 1.हरियाली तीज (श्रावण शुक्ल तृतीया): सावन मास में प्रकृति के पुनर्जन्म और शिव-पार्वती के मिलन के उपलक्ष्य में यह पर्व मनाया जाता है। महिलाएं हरे वस्त्र व चूड़ियां धारण करती हैं, मेहंदी रचाती हैं और झूले डालकर लोकगीत गाती हैं।
- 2.कजरी तीज / बड़ी तीज (भाद्रपद कृष्ण तृतीया): राजस्थान, उत्तर प्रदेश और बिहार में प्रचलित। महिलाएं नीम की पूजा करती हैं और सत्तू के पकवानों से व्रत खोलती हैं।
- 3.हरितालिका तीज (भाद्रपद शुक्ल तृतीया): तीनों में सर्वाधिक कठिन। इसमें निर्जला उपवास और रात भर चार प्रहर की पूजा माता पार्वती के तप की स्मृति में की जाती है।
पौराणिक कथा: शिव को पाने हेतु पार्वती का तप
हरितालिका तीज की कथा भविष्योत्तर पुराण में वर्णित है, और इसके मूल तप की कथा शिव पुराण के रुद्र संहिता, पार्वती खण्ड, अध्याय 22 में मिलती है, जहाँ स्वयं भगवान शिव माता पार्वती को उनके पूर्व तप की स्मृति कराते हैं।
शिव के प्रति अटूट प्रेम
सती रूप में दक्ष प्रजापति के यज्ञ में देहत्याग करने के पश्चात, जगदंबा ने पर्वतराज हिमालय और रानी मैना की पुत्री पार्वती के रूप में जन्म लिया। बाल्यावस्था से ही उनका हृदय भगवान शिव में पूर्णतः समर्पित था। विवाह योग्य होने पर राजा हिमालय चिन्तित हुए। देवर्षि नारद ने भगवान विष्णु के साथ विवाह का प्रस्ताव लाया, और हिमालय ने पार्वती से पूछे बिना ही इसे स्वीकार कर लिया।
सखियों का गुप्त हरण (हरितालिका)
जब पार्वती को यह ज्ञात हुआ, तो वे शोक से भर गईं। उन्होंने मन में निश्चय किया कि भगवान शिव ही उनके पति होंगे, अन्यथा वे प्राण त्याग देंगी। उनकी व्यथा देखकर उनकी सखियों ने एक साहसी कदम उठाया। वे पार्वती को एक घने, दुर्गम वन में, परम्परा के अनुसार गंगा के समीप, गुप्त रूप से ले गईं।
'हरितालिका' शब्द दो संस्कृत मूलों से बना है: 'हरित', जिसका अर्थ है गुप्त रूप से ले जाया गया, और 'आलिका', जिसका अर्थ है सखी। सखियों द्वारा गुप्त रूप से वन में ले जाए जाने के कारण यह तिथि हरितालिका तीज कहलाई।
घोर हिमालयी तपस्या
उस निर्जन गुफा में माता पार्वती ने असाधारण तप किया। बारह वर्षों तक उन्होंने केवल सूखे पत्ते खाकर तप किया। तदुपरांत उन्होंने पत्ते भी त्याग दिए और केवल जल बिन्दुओं पर, फिर केवल वायु पर जीवित रहीं, और इसी से उन्हें 'अपर्णा' नाम मिला, जिसका अर्थ है पत्रहीन।
कड़कड़ाती बर्फीली शीत में वे गले तक शीतल जल में खड़ी रहीं। ग्रीष्म की तपिश में वे मध्याह्न सूर्य के नीचे प्रज्वलित अग्नियों के मध्य बैठीं। मूसलाधार वर्षा में वे बिना किसी आश्रय के शिलाखंडों पर ध्यानस्थ रहीं।
भाद्रपद शुक्ल तृतीया के दिन माता पार्वती ने स्वच्छ नदी-रेत से शिवलिंग बनाया और रात्रि भर बेलपत्र और आंसुओं से उसकी पूजा की। उनकी अचल भक्ति से कैलाश पर्वत पर भगवान शिव का आसन डोल उठा। वे प्रकट हुए और कहा कि उनकी तपस्या ने उन्हें जीत लिया है, और वर मांगने को कहा।
चरणों में झुककर पार्वती ने अपनी अर्धांगिनी स्वीकार करने की प्रार्थना की। 'तथास्तु' कहकर भगवान शिव ने उन्हें अपनी पत्नी स्वीकार किया।
फल: यह व्रत क्यों रखा जाता है
इस कथा की शिक्षा है कि पार्वती का शिव से मिलन अटूट तप से प्राप्त हुआ, न कि संयोग से, और यही प्रत्येक भक्त के लिए आदर्श बन गया। सुहागिन महिलाएं अपने पति की दीर्घायु और कल्याण हेतु हरितालिका तीज रखती हैं, जबकि अविवाहित कन्याएं शिव जैसे गुणवान पति की कामना से यह व्रत करती हैं। यह व्रत पार्वती द्वारा अपने तप में विकसित की गई वही धीरता और आन्तरिक शक्ति भक्त में भरता है।
संकल्प, व्रत अनुशासन एवं समय
यह व्रत भाद्रपद शुक्ल तृतीया के सूर्योदय से पूर्व विधिवत संकल्प के साथ आरम्भ होता है। महिला स्नान करके शिव-पार्वती की प्रतिमा के समक्ष बैठती है, हाथ में जल लेकर संकल्प लेती है कि वह दिन और आगामी रात्रि निर्जला व्रत रखेगी, तथा इसका पुण्य सुखी और समर्पित दाम्पत्य जीवन के लिए समर्पित करेगी।
हरितालिका तीज सनातन धर्म के सबसे कठोर व्रतों में गिना जाता है:
- 1.अखंड निर्जला उपवास: व्रती महिलाएं तृतीया के सूर्योदय से लेकर अगले दिन चतुर्थी की प्रातः पूजा तक जल की एक बूंद भी नहीं पीतीं और अन्न का एक दाना भी नहीं लेतीं।
- 2.रात्रि जागरण: रात्रि में सोना सर्वथा वर्जित है। महिलाएं जागकर भजन गाती हैं तथा शिव तांडव स्तोत्र, ललिता सहस्रनाम और शिव चालीसा का पाठ करती हैं।
- 3.मन की निर्मलता: दिन भर क्रोध और सांसारिक विचलन से दूर रहकर चित्त को केवल उमा-महेश्वर के ध्यान में स्थिर रखा जाता है।
- 4.पूजा का समय: दिन की पूजा प्रदोष काल की सन्ध्या से आरम्भ होकर रात्रि के चार प्रहरों में चतुर्थी की प्रभात तक चलती है।
शिवलिंग निर्माण एवं चार प्रहर पूजा विधि
संध्या काल में प्रदोष वेला में पूजा आरम्भ होती है:
- 1.पार्थिव प्रतिमा निर्माण: नदी की स्वच्छ रेत या शुद्ध मिट्टी से अपने हाथों से भगवान शिव, माता पार्वती और श्री गणेश की मूर्तियां बनाई जाती हैं।
- 2.पूजा मंडप: केले के पत्तों और फूलों से वेदी सजाई जाती है। कलश पर आम के पत्ते और नारियल रखा जाता है।
- 3.सोलह पत्तों का अर्पण: भगवान शिव को सोलह दिव्य पत्र अर्पित किए जाते हैं, जिनमें बेलपत्र, धतूरा, शमी, दूर्वा, आक और मंदार सम्मिलित हैं।
- 4.सुहाग पिटारी का अर्पण: माता पार्वती को सोलह शृंगार सामग्री से भरी सुहाग पिटारी भेंट की जाती है, जिनमें सिंदूर, महावर, चूड़ियां, बिंदी, काजल, मेहंदी, चुनरी, बिछिया, कंघी, दर्पण और इत्र सम्मिलित हैं।
- 5.चार प्रहर पूजा: रात्रि के प्रत्येक तीन घंटे पर पार्थिव शिवलिंग का अभिषेक किया जाता है। प्रथम प्रहर में कच्चे दूध से, द्वितीय में दही से, तृतीय में शुद्ध घी से और चतुर्थ में मधु व गन्ने के रस से अभिषेक होता है। प्रत्येक अभिषेक के पश्चात हरितालिका व्रत कथा का पाठ होता है और दीप जलाए जाते हैं।
पारण का समय एवं पावन विसर्जन
व्रत की पूर्णता भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी की प्रभात में होती है।
- 1.प्रभात आरती एवं भोग: सूर्योदय पर स्नान कर अन्तिम आरती की जाती है, तथा देवताओं को हलवा, खीर और ऋतु फल अर्पित किए जाते हैं।
- 2.दान: पूजित सुहाग पिटारी, वस्त्र और दक्षिणा किसी पूज्य सुहागिन महिला या ब्राह्मण को भेंट की जाती है, जिनके चरण स्पर्श किए जाते हैं।
- 3.पार्थिव विसर्जन: व्रत में हुई किसी भी त्रुटि के लिए क्षमा-प्रार्थना के पश्चात मूर्तियों का किसी नदी या पावन जलस्रोत में विसर्जन किया जाता है, अथवा किसी पावन वृक्ष की जड़ में रखा जाता है।
- 4.व्रत का समापन: पहले चरणामृत, फिर खीरा और मीठा भीगा हुआ चना व हलवा खाकर व्रत खोला जाता है। यह दिव्य प्रेम और तपस्यापूर्ण संकल्प की पूर्णता का प्रतीक है।
क्या आप जानते हैं?
व्रत की उत्पत्ति
देवी पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की, जिसमें वे वर्षों बिना अन्न-जल के रहीं। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर शिव ने उन्हें वरदान दिया, और इसी घटना की याद में तीज व्रत मनाया जाता है।
व्रत की तिथि और नियम
यह व्रत सावन मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को रखा जाता है। महिलाएं निर्जला व्रत (बिना पानी पिए) रखती हैं और सुबह स्नान कर शिव-पार्वती की पूजा करती हैं।
पूजा में सोलह श्रृंगार
पूजा के दौरान सोलह श्रृंगार की वस्तुएं चढ़ाई जाती हैं, जैसे सिंदूर, चूड़ियां, बिंदी और फूल। यह सुहाग का प्रतीक है और पार्वती के शिव से मिलन की खुशी को दर्शाता है।
108 बार व्रत और मंत्र जाप
मान्यता है कि पार्वती ने शिव को पाने के लिए 108 बार तीज का व्रत किया था। इसलिए महिलाएं भी 108 बार 'ऊँ नमः शिवाय' मंत्र का जाप करती हैं।
प्रतीक और उत्सव
तीज पर महिलाएं लाल चूड़ियां और हरी चुनरी पहनती हैं, जो पार्वती के शिव से मिलन के समय की सजावट का प्रतीक है। झूले पर बैठना, गीत गाना और मेहंदी लगाना इस व्रत के उल्लासपूर्ण पहलू हैं।
व्रत का उद्देश्य
यह व्रत सुहागिन महिलाएं पति की लंबी उम्र और सुखी दांपत्य जीवन के लिए करती हैं, जबकि अविवाहित लड़कियां मनपसंद वर पाने के लिए। यह स्त्री-शक्ति और धैर्य की कहानी को जीवित रखता है।
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