नव वृन्दावन
तुंगभद्रा के पावन तट पर नौ मध्व संतों की पवित्र समाधियाँ
ऐतिहासिक अनेगुंडी और हम्पी के निकट तुंगभद्रा नदी के पावन द्वीप पर स्थित नव वृन्दावन, जगद्गुरु श्री मध्वाचार्य परंपरा के नौ परम यतींद्रों की जाग्रत तपोभूमि है। यह पवित्र क्षेत्र आध्यात्मिक अज्ञान को नष्ट कर, साधकों को परम शांति और भगवान मूलराम का अनुग्रह प्रदान करता है।
त्वरित दर्शन निर्देशिका (Quick Devotional Guide)
- •यह क्या है: पवित्र तुंगभद्रा नदी के शांत द्वीप पर स्थित जगद्गुरु श्री मध्वाचार्य परंपरा के नौ परम पूज्य यतींद्रों (श्री पद्मनाभ तीर्थ, श्री व्यासतीर्थ आदि) की पवित्र समाधियाँ (बृन्दावन)।
- •दर्शन व जप का फल: यहाँ की गई प्रदक्षिणा और मंत्र-जप से नवग्रह दोष शांत होते हैं, संचित पापों का क्षय होता है और भगवान नृसिंह तथा मूलराम की अमोघ कृपा प्राप्त होती है।
- •कब जाएँ: अक्टूबर से मार्च तक का समय सर्वोत्तम है। मध्व नवमी, संतों की वार्षिक आराधना तथा नृसिंह जयंती मुख्य उत्सव हैं।
- •कहाँ स्थित है: तुंगभद्रा नदी के मध्य द्वीप, अनेगुंडी के समीप, कोप्पल जिला, कर्नाटक। निकटतम रेलवे स्टेशन होस्पेट (Hospet) है।
- •विधि एवं नियम:
- •अनेगुंडी घाट से पारंपरिक नाव अथवा गोल नौका (Coracle) द्वारा द्वीप पर पहुँचें।
- •पारंपरिक वेशभूषा अनिवार्य है: पुरुषों के लिए धोती-उत्तरीय और महिलाओं के लिए साड़ी।
- •तुंगभद्रा में संकल्प स्नान कर मौन अथवा भगवन्नाम जप करते हुए परिक्रमा करें।
- •बृन्दावन विग्रहों का स्पर्श वर्जित है; केवल हाथ जोड़कर भावपूर्ण प्रदक्षिणा करें।
पावन उद्गम एवं शास्त्रोक्त इतिहास
नव वृन्दावन त्रेतायुग के सुप्रसिद्ध किष्किन्धा क्षेत्र में स्थित है, जिसका वर्णन वाल्मीकि रामायण के किष्किन्धा काण्ड में भगवान श्री राम तथा परम भक्त हनुमान जी के इस राज्य के रूप में मिलता है। यह द्वीप तुंगभद्रा की कलकल धाराओं के मध्य पहाड़ी ग्रेनाइट शिलाओं से घिरा है, जिसे उसी शास्त्र में पम्पा नदी कहा गया है। यह पावन द्वीप शताब्दियों से तपस्वियों की एकांत साधनास्थली रहा है, जिसमें एक असाधारण आध्यात्मिक ऊर्जा समाहित है।
इस द्वीप की पवित्रता चौदहवीं शताब्दी में तब आरंभ हुई जब जगद्गुरु श्री मध्वाचार्य के प्रमुख शिष्य तथा उत्तराधिकारी श्री पद्मनाभ तीर्थ ने इसी निर्जन स्थल को अपनी शाश्वत समाधि हेतु चुना। सुमध्व विजय, जो मध्वाचार्य के शिष्य के पुत्र नारायण पंडिताचार्य द्वारा रचित हैगियोग्राफी है, अपने अंतिम सर्ग, सर्ग 16, में पीठ की उत्तराधिकार-परंपरा की ओर मुड़ती है तथा उस गुरु-परंपरा को अभिलिखित करती है जिसे पद्मनाभ तीर्थ ने प्रथम वाहक के रूप में आगे बढ़ाया। तत्त्ववाद की यह शिष्य-परंपरा जैसे-जैसे प्रसारित हुई, पीठ के अनुवर्ती आचार्यों ने इस द्वीप की अपार आध्यात्मिक ऊर्जा को पहचाना तथा क्रमशः यहीं अपनी बृन्दावन समाधि ली।
यहाँ विश्राम करने वाले आचार्यों में अग्रगण्य श्री व्यासतीर्थ हैं, जिन्हें श्री व्यासराज भी कहा जाता है, तथा जो विजयनगर साम्राज्य के सम्राट कृष्णदेवराय के प्रसिद्ध राजगुरु थे। उनका जीवन-वृत्त व्यासयोगिचरित में अभिलिखित है, जो कवि सोमनाथ द्वारा रचित जीवनी है तथा परंपरा के अनुसार स्वयं व्यासतीर्थ द्वारा समीक्षित तथा स्वीकृत थी। यह ग्रंथ उन्हें भारत भर में 732 हनुमान विग्रहों की स्थापना का तथा न्यायामृत व तर्कताण्डव जैसी रचनाओं द्वारा वैदिक ज्ञान की रक्षा का श्रेय देता है। आज यह द्वीप इन नौ संतों की सम्मिलित आध्यात्मिक उपस्थिति धारण करता है तथा भक्ति, आध्यात्मिक उपचार एवं मुक्ति हेतु श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है।
पवित्र समाधियाँ एवं तीर्थ स्थल
संत, मनीषी एवं ऐतिहासिक परंपरा
यह पावन भूमि विजयनगर के स्वर्णकाल और हरिदास आंदोलन की साक्षी रही है। श्री पुरंदर दास और श्री कनक दास जैसे संतों ने यहाँ बैठकर भगवद्गुणानुवाद किया। श्री सुधीन्द्र तीर्थ जी ने यहीं अपने परम शिष्य वेंकटनाथ (मंत्रालयम के श्री राघवेंद्र स्वामी) को शास्त्र शिक्षा प्रदान की थी।
पावन स्तोत्र एवं ध्यान
नव वृन्दावन की परिक्रमा करते समय श्री व्यासराज गुरु का यह पावन ध्यान श्लोक जपना चाहिए:
अर्थिकल्पितकल्पोऽयं प्रत्यर्थिकजकेसरी ।
व्यासतीर्थगुरुर्भूयादस्मदिष्टार्थसिद्धये ॥
अर्थ: याचकों के लिए कल्पवृक्ष के समान समस्त मनोरथ पूर्ण करने वाले और विपक्षी कुतर्करूपी हाथियों के लिए सिंह के समान पराक्रमी, जगद्गुरु श्री व्यासतीर्थ हमारे समस्त अभीष्ट कार्यों को सिद्ध करें।
क्या आप जानते हैं?
यहाँ समाधिस्थ श्री व्यासतीर्थ जी महाराज विजयनगर साम्राज्य के राजा कृष्णदेवराय के कुलगुरु थे, जिन्होंने सम्राट के जीवन पर आए भीषण 'कुहू योग' के संकट को स्वयं पर लेकर टाल दिया था।
यह द्वीप रामायण कालीन किष्किन्धा क्षेत्र और पंपा सरोवर के समीप स्थित है, जहाँ मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम ने शबरी से भेंट की थी।
एक ही पवित्र सीमा के भीतर नौ परम यतींद्रों की बृन्दावन समाधियाँ स्थापित होना पूरे भारतवर्ष में अद्वितीय और अलौकिक है।
मंत्रालयम के सुप्रसिद्ध चमत्कारी संत श्री राघवेंद्र स्वामी जी के दीक्षा गुरु, श्री सुधीन्द्र तीर्थ जी की समाधि भी इसी पावन द्वीप पर स्थित है।
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