पंच द्वारका
पश्चिमी भारत के पांच पावन कृष्ण धाम
पंच द्वारका गुजरात और राजस्थान के पांच कृष्ण धामों की यात्रा है: द्वारका, बेट द्वारका, डाकोर, नाथद्वारा और कांकरोली।
त्वरित भक्ति मार्गदर्शिका (संक्षिप्त विवरण)
- •यह क्या है: पंच द्वारका पश्चिमी भारत में भगवान श्रीकृष्ण के पांच परम पावन धामों का तीर्थ-परिपथ है, जो प्रभु के ऐश्वर्य, वात्सल्य, अनुग्रह और रक्षक स्वरूपों को समर्पित है। इसमें द्वारका का द्वारकाधीश जगत मंदिर, बेट द्वारका, डाकोर का रणछोड़रायजी मंदिर, नाथद्वारा का श्रीनाथजी मंदिर और कांकरोली का द्वारकाधीश मंदिर सम्मिलित हैं।
- •दर्शन एवं जप का फल: भागवत पुराण और स्कन्द पुराण पर आधारित भक्त परंपरा के अनुसार इन पांच धामों में प्रभु के दर्शन त्रिविध तापों का नाश करते हैं, जन्म-जन्मांतर के पाप धोते हैं तथा भगवान श्रीहरि के चरणों में शरण प्रदान करते हैं।
- •यात्रा का श्रेष्ठ समय: अक्टूबर से मार्च के मध्य मौसम सुखद रहता है। प्रमुख पर्व: जन्माष्टमी, राधाष्टमी, अन्नकूट और गोवर्धन पूजा, होली तथा तुलसी विवाह।
- •भौगोलिक स्थिति: गुजरात और दक्षिणी राजस्थान में, द्वारका और बेट द्वारका के सागर-तट से लेकर मध्य गुजरात के डाकोर, उदयपुर के समीप अरावली में नाथद्वारा और राजसमंद झील के तट पर कांकरोली तक।
- •विधि एवं नियम:
- •यात्रा क्रम: द्वारका के द्वारकाधीश से आरंभ कर नौका से बेट द्वारका जाएं, फिर पूर्व में डाकोर और उसके बाद उत्तर में नाथद्वारा तथा कांकरोली के दर्शन करें। यह तीर्थयात्रियों का प्रचलित क्रम है; सुविधा अनुसार इसमें परिवर्तन भी किया जाता है।
- •पवित्र स्नान: प्रथम दर्शन से पूर्व द्वारका में गोमती घाट पर, जहां नदी सागर से मिलती है, तीर्थ स्नान करें।
- •वेशभूषा: पारंपरिक मर्यादित वस्त्र, पुरुषों के लिए धोती-कुर्ता और महिलाओं के लिए साड़ी अथवा सलवार-सूट। चमड़े की वस्तुएं और पादत्राण मंदिर के बाहर रखें।
- •भोग: तुलसी मंजरी, माखन-मिश्री और बेट द्वारका में सुदामा जी की स्मृति में पोहे का भोग।
पावन उद्भव एवं पौराणिक संदर्भ
भागवत पुराण के स्कंध १०, अध्याय ५० के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने मथुरावासियों को बार-बार के आक्रमणों से दूर ले जाने का निर्णय लिया और देवशिल्पी विश्वकर्मा से पश्चिमी सागर में एक भव्य नगरी बसवाई। यह नगरी द्वारवती, अर्थात द्वारका, कहलाई, जहां प्रभु द्वारकाधीश के रूप में धर्म की स्थापना करते रहे।
भक्त परंपरा सिखाती है कि प्रभु की उपस्थिति किसी एक नगर तक सीमित नहीं है। बेट द्वारका में प्रभु ने बालसखा सुदामा के प्रेमपूर्वक लाए गए पोहे को प्रसन्नता से स्वीकार किया, जिसकी कथा भागवत पुराण के स्कंध १०, अध्याय ८० और ८१ में है। डाकोर में माना जाता है कि प्रभु बारहवीं शताब्दी में द्वारका से आकर अपने वृद्ध भक्त बोडाणा के साथ रणछोड़राय के रूप में विराजित हुए।
मेवाड़ के नाथद्वारा में गोवर्धन धारण किए बालकृष्ण श्रीनाथजी का श्रीविग्रह वल्लभाचार्य जी द्वारा प्रवर्तित पुष्टिमार्ग का प्राण है। सत्रहवीं शताब्दी में यह विग्रह ब्रज से मेवाड़ आया, और परंपरा कहती है कि सिहाड़ गांव में रथ रुक गया, जिसे प्रभु की यहीं रहने की इच्छा माना गया। राजसमंद झील के तट पर कांकरोली में पुष्टिमार्ग के सात प्रधान स्वरूपों में से एक द्वारकाधीशजी विराजमान हैं, जो राजस्थान की पहाड़ियों में इस परिपथ को पूर्ण करते हैं।
पंच द्वारका के पावन धाम
संत, मनीषी एवं ऐतिहासिक परंपरा
- •जगद्गुरु आदि शंकराचार्य (८वीं शताब्दी): परंपरा उन्हें द्वारका शारदा पीठ की स्थापना से जोड़ती है, जो चार मठों में पश्चिमी पीठ है।
- •महाप्रभु वल्लभाचार्य एवं विट्ठलनाथजी (१५वीं से १६वीं शताब्दी): उन्होंने पुष्टिमार्ग का प्रवर्तन किया और श्रीनाथजी तथा अन्य प्रधान स्वरूपों की सेवा परंपरा को स्वरूप दिया।
- •भक्त बोडाणा एवं गंगाबाई: डाकोर के भक्त दंपति, जो तुलसी का पौधा लेकर द्वारका जाते थे; परंपरा कहती है कि उनकी भक्ति से प्रभु डाकोर पधारे।
- •संत मीराबाई (१६वीं शताब्दी): राजपूत राजकुमारी और संत-कवयित्री, जिनके कृष्ण-विरह के पद द्वारका से जुड़े माने जाते हैं, जहां मान्यता है कि वे प्रभु के श्रीविग्रह में समा गईं।
- •संत नरसी मेहता (१५वीं शताब्दी): गुजरात के संत-कवि, जिनके कृष्ण भजन घर-घर गाए जाते हैं।
पावन श्लोक एवं ध्यान
श्रीमद्भागवत माहात्म्य का आरंभिक मंगलाचरण, जिसका पाठ भागवत कथा से पूर्व किया जाता है, द्वारकाधीश के ध्यान के लिए स्मरणीय है:
सच्चिदानन्दरूपाय विश्वोत्पत्त्यादिहेतवे ।
तापत्रयविनाशाय श्रीकृष्णाय वयं नुमः ॥
भावार्थ: "जिनका स्वरूप सत्, चित् और आनंद है, जो विश्व की उत्पत्ति आदि के कारण हैं और तीनों तापों का नाश करने वाले हैं, उन भगवान श्रीकृष्ण को हम नमन करते हैं।"
क्या आप जानते हैं?
द्वारकाधीश जगत मंदिर के शिखर पर विशाल ध्वजा प्रतिदिन कई बार बदली जाती है और दूर से तीर्थयात्रियों को दिखाई देती है।
परंपरा है कि डाकोर में प्रभु बारहवीं शताब्दी में द्वारका से अपने वृद्ध भक्त बोडाणा के साथ पधारे; वर्तमान रणछोड़रायजी मंदिर अठारहवीं शताब्दी का है।
बेट द्वारका में पोहे का भोग सुदामा द्वारा मित्र श्रीकृष्ण को दिए गए उपहार की स्मृति है, जिसकी कथा भागवत पुराण में है।
नाथद्वारा के श्रीनाथजी का विग्रह सत्रहवीं शताब्दी में ब्रज से मेवाड़ आया; परंपरा कहती है कि रथ सिहाड़ में रुक गया और प्रभु वहीं विराजित हैं।
कांकरोली का द्वारकाधीश मंदिर राजसमंद झील के दक्षिणी तट पर स्थित है और पुष्टिमार्ग की तीसरी पीठ माना जाता है।
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