गुरुद्वारा श्री फतेहगढ़ साहिब
छोटे साहिबजादों के सर्वोच्च बलिदान का पावन स्थल
गुरुद्वारा श्री फतेहगढ़ साहिब पंजाब के सरहिंद में स्थित वह पावन तीर्थ है, जहाँ दशमेश पिता श्री गुरु गोबिंद सिंह जी के छोटे साहिबजादे—बाबा जोरावर सिंह जी और बाबा फतेह सिंह जी—एवं माता गुजरी जी ने धर्म की रक्षा हेतु सर्वोच्च बलिदान दिया। यहाँ दर्शन करने से साधक को अदम्य आत्मिक बल, भयमुक्ति और धर्म-परायणता की प्राप्ति होती है।
त्वरित तीर्थ मार्गदर्शिका (संक्षिप्त अवलोकन)
- •यह क्या है: सिख धर्म के अदम्य आत्मिक बल और शहादत का परम पावन दुर्ग, जहाँ दशमेश पिता श्री गुरु गोबिंद सिंह जी के छोटे साहिबजादे—बाबा जोरावर सिंह जी (९ वर्ष) और बाबा फतेह सिंह जी (७ वर्ष)—को सन् १७०५ में धर्म न त्यागने पर जीवित दीवार में चिनवा दिया गया था।
- •दर्शन एवं फलश्रुति: इस पावन स्थल की यात्रा से साधक को अदम्य आत्मबल (चढ़दी कला) की प्राप्ति होती है, मृत्यु का भय समाप्त होता है, धर्म-निष्ठा सुदृढ़ होती है और छोटे साहिबजादों के पावन त्याग के स्मरण से पूर्वकृत पापों का क्षय होता है।
- •कब जाएँ: यह तीर्थ वर्ष भर खुला रहता है। सबसे पावन समय दिसंबर माह (पौष मास) है, विशेषकर २५ से २८ दिसंबर का वार्षिक शहीदी जोड़ मेला, जब लाखों श्रद्धालु नतमस्तक होते हैं।
- •कहाँ स्थित है: सरहिंद, ज़िला फतेहगढ़ साहिब, पंजाब। चंडीगढ़ से लगभग ५० किमी की दूरी पर ऐतिहासिक ग्रांड ट्रंक मार्ग के निकट स्थित है।
- •नियम व पूजा विधि:
- •परिसर में प्रवेश से पूर्व सिर को स्वच्छ वस्त्र/रुमाल से ढकें।
- •जूते-चप्पल और चमड़े की वस्तुएँ बाहर जमा करें।
- •चरण गंगा में हाथ-पैर धोकर ही मुख्य दरबार में प्रवेश करें।
- •श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के सम्मुख श्रद्धापूर्वक माथा टेकें, कढ़ाह प्रसाद ग्रहण करें तथा भोरा साहिब एवं ठंडा बुर्ज में मौन ध्यान करें।
- •लंगर हाल में बैठकर अत्यंत विनम्रतापूर्वक पवित्र लंगर प्रसादी ग्रहण करें।
पावन उद्गम एवं आध्यात्मिक इतिहास
सन् १७०५ के शीतकाल में, श्री आनंदपुर साहिब छोड़ने के उपरांत सरसा नदी के तट पर गुरु-परिवार बिछड़ गया। दशमेश पिता श्री गुरु गोबिंद सिंह जी की पूज्य माता, माता गुजरी जी और उनके दो छोटे पौत्र—बाबा जोरावर सिंह जी एवं बाबा फतेह सिंह जी—को सरहिंद के नवाब वज़ीर ख़ान द्वारा बंदी बना लिया गया।
इन नन्हे साहिबजादों को कड़ाके की ठंड में खुले 'ठंडा बुर्ज' में कैद रखा गया। मुग़ल सत्ता द्वारा उन्हें धन-सम्पदा, राजसी ठाठ और जीवन का प्रलोभन दिया गया, परंतु गुरु-पुत्रों ने अपने धर्म और सत्य के मार्ग को त्यागने से स्पष्ट इनकार कर दिया। उन्होंने अपने दादा गुरु तेग बहादुर जी और परदादा गुरु अर्जन देव जी के महान बलिदानों की मर्यादा को अक्षुण्ण रखा।
१३ पोह संवत १७६१ को नवाब वज़ीर ख़ान के आदेशानुसार दोनों साहिबजादों को ज़िंदा दीवार में चिनवा दिया गया। इस अमर शहादत का समाचार पाकर माता गुजरी जी ने भी प्रभु-चरणों में अपने प्राण त्याग दिए। इस भूमि का नाम 'फतेहगढ़ साहिब' पड़ा, जिसका अर्थ है 'सत्य और धर्म की शाश्वत विजय का दुर्ग'।
प्रमुख पावन स्थल एवं तीर्थ संरचना
सन्त, भक्त एवं ऐतिहासिक वंश-परम्परा
- •दीवान टोडर मल: वह अनन्य श्रद्धालु जिन्होंने साहिबजादों और माता गुजरी जी के अंतिम संस्कार हेतु भूमि के प्रत्येक इंच पर सोने की मोहरें खड़ी करके ज़मीन खरीदी थी।
- •बाबा मोती राम मेहरा: जिन्होंने अपने परिवार के प्राणों की परवाह न करते हुए बंदी साहिबजादों और माता जी को ठंडा बुर्ज में गुप्त रूप से गर्म दूध पहुँचाया था।
- •बाबा बंदा सिंह बहादुर: जिन्होंने १७१० में खालसा फ़ौज के साथ सरहिंद पर चढ़ाई कर वज़ीर ख़ान के अत्याचार का अंत किया और इस पवित्र भूमि को 'फतेहगढ़ साहिब' नाम दिया।
पावन शबद एवं ध्यान
ਸੂਰਾ ਸੋ ਪਹਿਚਾਨੀਐ ਜੁ ਲਰੈ ਦੀਨ ਕੇ ਹੇਤ ॥
ਪੁਰਜਾ ਪੁਰਜਾ ਕਟਿ ਮਰੈ ਕਬਹੂ ਨ ਛਾਡੈ ਖੇਤੁ ॥੨॥੨॥
सूरा सो पहिचानीयै जु लरै दीन के हेत।
पुरजा पुरजा कटि मरै कबहू न छाडै खेतु॥
भावार्थ: शूरवीर वही है जो धर्म, सत्य और असहायों की रक्षा के लिए युद्ध करता है। भले ही उसका अंग-अंग कट जाए, परंतु वह धर्म और सत्य के मैदान को कभी नहीं छोड़ता।
— श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी (अंग ११०५)
क्या आप जानते हैं?
छोटे साहिबजादों के अंतिम संस्कार हेतु दीवान टोडर मल ने भूमि पर सोने की मोहरें खड़ी करके ज़मीन खरीदी थी, जिससे यह इतिहास में विश्व की सबसे मूल्यवान भूमि मानी जाती है।
बाबा मोती राम मेहरा जी, जिन्होंने कड़कड़ाती ठंड में ठंडा बुर्ज में बंदी साहिबजादों को गुप्त रूप से दूध पिलाया था, उन्हें वज़ीर ख़ान ने सपरिवार कोहलू में पिसवा कर शहीद कर दिया था।
'भोरा साहिब' वह मूल भूमिगत स्थान है जहाँ बाबा जोरावर सिंह जी और बाबा फतेह सिंह जी को दीवार में चिनवाने की नींव रखी गई थी।
सन् १७१० में बाबा बंदा सिंह बहादुर ने सरहिंद के अत्याचारी शासन को समाप्त कर खालसा राज की नींव रखी और इस पावन स्थल का नाम 'फतेहगढ़ साहिब' (विजय का दुर्ग) रखा।
Guru Gobind Singh Ji
सिख धर्म से और
संबंधित शिक्षाएं
एक ही शिक्षा, विभिन्न परंपराओं में प्रतिध्वनित
