श्री हरिमंदिर साहिब
अमृतसर का पावन स्वर्ण मंदिर एवं अमृत सरोवर
अमृतसर स्थित श्री हरिमंदिर साहिब (स्वर्ण मंदिर) सिख पंथ का सर्वोच्च आध्यात्मिक केंद्र है। पंचम पातशाह गुरु अर्जुन देव जी द्वारा परिकल्पित एवं सूफी संत मियाँ मीर द्वारा १५८९ में शिलान्यास किया गया यह पावन धाम चारों दिशाओं में खुले चार द्वारों के माध्यम से संपूर्ण मानवता के लिए समरसता का संदेश देता है।
विनम्रता व समरसता की पावन वास्तुकला
पंचम पातशाह गुरु अर्जुन देव जी ने जब श्री हरिमंदिर साहिब की रचना की, तब उन्होंने इसे सामान्य भूमि से नीचे बनवाया ताकि मंदिर में प्रवेश करते समय हर व्यक्ति को नीचे उतरना पड़े, जो अहंकार त्याग और विनम्रता का प्रतीक है।
मंदिर के चारों दिशाओं में बने चार द्वार यह संदेश देते हैं कि संसार के किसी भी कोने से आने वाले व्यक्ति के लिए इस धाम के द्वार सदैव खुले हैं।
हरिमंदिर साहिब परिसर के पावन अंग
नित्य पावन मर्यादा
हरिमंदिर साहिब में प्रतिदिन अमृत वेले से लेकर रात्रि सुखासन तक मर्यादापूर्वक सेवा चलती है:
- •अमृत वेले (प्रातः ३ बजे) स्वर्ण पालकी में श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी को अकाल तख्त से हरिमंदिर साहिब लाया जाता है।
- •दिन भर राग-बद्ध गुरबाणी कीर्तन का अखंड प्रवाह रहता है।
- •रात्रि में अत्यंत श्रद्धा के साथ सुखासन साहिब संपन्न होता है।
पावन गुरबाणी शबद
डिठे सभे थाव
नहीं तुधु जेहा।
बधोहु पुरखि बिधातै
तां तूं सोहिया॥
क्या आप जानते हैं?
सूफी संत मियाँ मीर द्वारा शिलान्यास
पंचम पातशाह ने लाहौर के प्रसिद्ध सूफी संत हजरत मियाँ मीर को आमंत्रित कर १५८९ में हरिमंदिर साहिब की नींव रखवाई थी।
महाराजा रणजीत सिंह का स्वर्ण दान
१८३० में शेर-ए-पंजाब महाराजा रणजीत सिंह ने मंदिर के गुंबदों पर सोने की चादरें चढ़वाई थीं।
विश्व का सबसे बड़ा निःशुल्क लंगर
यहाँ प्रतिदिन एक लाख से अधिक लोगों को श्रद्धापूर्वक निःशुल्क लंगर परोसा जाता है।
अखंड गुरबाणी कीर्तन
हरिमंदिर साहिब में पूरे दिन शास्त्रीय रागों में अखंड कीर्तन का प्रवाह रहता है।
Guru Arjan Dev Ji
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