वर्तमान प्रसंग
भगवान बुद्ध के समय में कुछ भिक्षु यह सुनकर अत्यंत व्याकुल हो उठे कि ईर्ष्या और प्रतिद्वंद्विता से भरा देवदत्त एक बार फिर तथागत के प्राण लेने की साजिश रच रहा है। जब उन्होंने बांस के वन (वेणुवन) के विहार में अपनी यह पीड़ा व्यक्त की, तो बुद्ध ने उन्हें आश्वस्त करते हुए कहा कि देवदत्त ने पूर्वजन्मों में भी उनका विनाश करने का प्रयास किया था, और जिस प्रकार वह तब असफल रहा था, उसी प्रकार अब भी असफल होगा। इस बात को स्पष्ट करने के लिए उन्होंने एक अत्यंत प्राचीन जन्म की यह कथा सुनाई, जब वे स्वयं मनुष्यों के बीच एक ऋषि के रूप में नहीं, वरन पक्षियों के बीच एक सतर्क पक्षी के रूप में विचरण करते थे।
प्रसंग और परिस्थिति
प्राचीन काल में जब गंगा-तट के नगर कौशाम्बी में राजा कोसम्बक राज्य करते थे, तब बोधिसत्व का जन्म बांस के एक वन में जंगली मुर्गे (कुक्कुट) के रूप में हुआ और वे वन के सैकड़ों मुर्गों के नेता बने।
उसी वन में एक अत्यंत धूर्त और हिंसक बाज़ रहता था। उसने घात लगाकर और झपट्टा मारकर जंगल के अनेक भोले-भाले पक्षियों को अपना शिकार बना लिया था। बाज़ उन्हें एक-एक करके पकड़कर खाता गया, यहां तक कि केवल बोधिसत्व शेष रह गए। भोजन खोजने में सावधान रहने वाले बोधिसत्व बांस की उस झाड़ी में रहने लगे जहां बाज़ प्रवेश नहीं कर सकता था।
कपटपूर्ण प्रयास
बलपूर्वक मुर्गे को पकड़ने में असमर्थ होकर बाज़ ने कपट का सहारा लिया। वह बांस की झाड़ी के पास एक शाखा पर बैठ गया और पूछने लगा कि मुर्गा उससे इतना क्यों डरता है। उसने कहा कि वह मित्रता चाहता है और मुर्गे को ऐसे स्थान पर बुलाया जहां भोजन प्रचुर है और दोनों साथ चुग सकते हैं। मुर्गे ने मना कर दिया। तब बाज़ ने अपने पुराने अपराध स्वीकार किए और फिर कभी न दोहराने का वचन देकर विश्वास की याचना की। मुर्गे ने दूसरी और तीसरी बार भी यह कहकर मना कर दिया कि ऐसा प्राणी कभी मित्र नहीं हो सकता।
बोधिसत्व का उत्तर
बोधिसत्व ने उस चाटुकार शिकारी की ओर अत्यंत तीक्ष्ण दृष्टि से देखा। वे भली-भांति जानते थे कि मीठी बातों से किसी का हिंसक स्वभाव नहीं बदलता और शिकारी तथा शिकार के बीच कभी सच्ची मित्रता नहीं हो सकती। फिर उन्होंने सात गाथाएँ कहीं, जिनका भावार्थ यह है: झूठ बोलने वाले, केवल अपने स्वार्थ की सेवा करने वाले, पाप कर चुके, या अत्यधिक धर्मात्मा होने का दिखावा करने वाले पर विश्वास न करो; कुछ लोग प्यासे लालची पशुओं जैसे होते हैं, जो मित्रता की बातें करते हैं पर कर्म कुछ नहीं करते, खाली हाथ बढ़ाते हैं और वाणी में असली इरादा छिपाते हैं; चंचल लोगों या संधि करके तोड़ देने वालों पर विश्वास न करो; जो बुरे मार्ग पर चलकर सबको धमकाता है, वह म्यान में रखी तेज तलवार की तरह अस्थिर और खतरनाक है; कुछ लोग हृदय से न निकली मधुर बातें कहकर कृत्रिम मित्रता से कृपा पाना चाहते हैं; और ऐसा दुष्ट मन वाला भोजन या लाभ देखकर अनिष्ट करता है और अंत में छोड़ जाता है, पर पहले विनाश कर जाता है।
बाज़ का प्रस्थान
बाज़ को ठुकराने के बाद बोधिसत्व ने उसे पुनः बुलाया और अंतिम चेतावनी दी कि यदि वह इस स्थान पर रहा तो मुर्गा जान लेगा कि क्या करना है।
परिणाम
अपनी चाल को पूरी तरह विफल देखकर बाज़ किसी दूसरे स्थान पर उड़ गया और बोधिसत्व ने सुरक्षित रहकर अपना जीवन बिताया।
कथा पूर्ण करने के पश्चात, पूर्ण रूप से बुद्धत्व प्राप्त कर चुके भगवान बुद्ध ने चार गाथाएँ अपनी ओर से जोड़ीं, जिनका भावार्थ है: बहुत-से शत्रु मित्र बनकर सहायता का प्रस्ताव रखते हैं, और बुरे लोगों को छोड़ देना ही श्रेष्ठ है, जैसे मुर्गे ने बाज़ को छोड़ा; जो घटनाओं का अर्थ समझने में धीमा होता है, वह शत्रुओं के वश में पड़कर पछताता है; जो उसे शीघ्र समझ लेता है, वह शत्रुओं से बच निकलता है, जैसे मुर्गा बाज़ के फंदे से बचा; और ऐसे कपटी फंदों से स्पष्टदर्शी बुद्धिमान को दूर रहना चाहिए, जैसे मुर्गा बाज़ से दूर भागा। तत्पश्चात उन्होंने स्पष्ट रूप से बताया कि वह कपटी बाज़ देवदत्त ही था, और बुद्धिमान मुर्गा वे स्वयं — उस पूर्वजन्म में — थे।
शास्त्रीय प्रमाण
यह कथा पालि त्रिपिटक की खुद्दक निकाय में, जातक ग्रंथ के दसक-निपात — अर्थात दस गाथाओं में कही गई कथाओं के दसवें खंड — में कुक्कुट-जातक, क्रमांक ४४८ के रूप में संरक्षित है, जो चतुद्वार-वग्ग (चतुद्वार-जातक, क्रमांक ४३९ से नामित अध्याय) के अंतर्गत आती है। यह उस खंड की सोलह कथाओं (क्रमांक ४३९-४५४) में दसवीं कथा है। शास्त्र स्वयं इस कथा को समान नाम वाली दो अन्य, असंबंधित जातक कथाओं से स्पष्टतः पृथक करता है: कुक्कुट-जातक क्रमांक २०९, जिसमें एक पक्षी टहनियों से ढके चलती झाड़ी बने बहेलिये का उपहास करता है (वहाँ बोधिसत्व वृक्ष-देवता के रूप में देखते हैं और देवदत्त बहेलिया है), और कुक्कुट-जातक क्रमांक ३८३, जिसमें एक मुर्गा बाज़ के बजाय एक चापलूस बिल्ली के सामने आता है। तीनों कथाएं एक ही नाम और एक ही चरित्र-प्रकार — शिकारी के छल को पहचान लेने वाला मुर्गा — साझा करती हैं, परंतु प्रत्येक एक पृथक शास्त्रीय पाठ है, अपनी अपनी परिस्थिति, प्रतिपक्षी और गाथाओं के साथ।
क्या आप जानते हैं?
कुक्कुट जातक धूर्त शत्रुओं की कपटपूर्ण चापलूसी को तुरंत पहचानने में बोधिसत्व के प्रज्ञा (पञ्ञा) पारमिता के कौशल को दर्शाता है।
कथा के अंत में बुद्ध की अपनी चार गाथाएँ हैं
बुरे लोगों को वैसे छोड़ दो जैसे मुर्गे ने बाज़ को छोड़ा, और कपटी फंदों से दूर रहो।
मुर्गे की सात गाथाएँ झूठों, दिखावटी धर्मात्माओं, मीठा बोलने वालों और चंचल लोगों से सावधान करती हैं और छिपे खतरे को म्यान में रखी तेज तलवार से उपमित करती हैं।
व्यावहारिक नीतिशास्त्र में यह कथा शासकों को चापलूस और अवसरवादी दरबारियों से सतर्क रहने का अमूल्य संदेश देती है।
भगवान बुद्ध ने उद्घाटित किया कि वह कपटी बाज़ देवदत्त था और बुद्धिमान मुर्गा स्वयं तथागत बुद्ध थे।
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