बांस-वन में देवदत्त की कृतघ्नता की चर्चा
भगवान बुद्ध ने यह कथा बांस-वन (वेलुवन) में निवास करते समय सुनाई, जब भिक्षु देवदत्त के विश्वासघात की चर्चा कर रहे थे—जिसने प्रव्रज्या, त्रिपिटक की शिक्षा और अनेक दान-सम्मान बुद्ध से पाकर भी उनका कोई ऋण मानने से इनकार कर दिया था। बुद्ध ने कहा, 'देवदत्त का कृतघ्न होना यह पहली बार नहीं है। बहुत पहले भी मैंने उसके प्राण बचाए थे, तब भी उसने उस उपकार का महत्व नहीं समझा था।' यह कहकर उन्होंने यह पूर्वजन्म की कथा सुनाई, जो आज खुद्दकनिकाय के जातक-संग्रह के तेरसकनिपात में संख्या ४८२ के रूप में संरक्षित है।
गंगा तट का स्वर्ण मृग
प्राचीन काल में वाराणसी में राजा ब्रह्मदत्त के राज्य में बोधिसत्व ने 'रुरु' नामक एक अत्यंत तेजस्वी स्वर्ण मृग के रूप में जन्म लिया। उनका शरीर तपे हुए सोने जैसा दमकता था, खुर वैडूर्य मणि के समान थे और आंखें मणियों जैसी चमकती थीं। वे गंगा नदी के तट पर एक अत्यंत गुप्त, सुगंधित कमलों के वन में एकांतवास करते थे।
कर्जदार युवक का पलायन
वाराणसी में 'महाधनक' नामक एक धनी व्यापारी का पुत्र रहता था, जो जुए और विलास में पड़कर अस्सी करोड़ का पैतृक धन लुटा चुका था। कर्जदारों के भय से त्रस्त होकर वह आधी रात को गंगा के किनारे पहुंचा और चिल्लाता हुआ नदी की भयंकर लहरों में कूद गया।
मृग का साहसी बचाव
बोधिसत्व ने जब रात्रि के सन्नाटे में डूबते हुए मनुष्य की आर्त पुकार सुनी: 'बचाओ! मुझे बचाओ!', तो उन्होंने अपने प्राणों की चिंता किए बिना उफनती नदी में छलांग लगा दी। वे तैरकर उस युवक के पास पहुंचे, उसे अपनी पीठ पर बिठाया और घंटों संघर्ष करके सकुशल किनारे ले आए। मृग ने अपनी सांसों से उसके ठंडे शरीर को गर्माहट दी और मीठे फल खिलाए।
बदले में केवल एक वचन
विदा करते समय बोधिसत्व ने कहा: 'मित्र! मेरे इस उपकार के बदले मैं केवल इतना चाहता हूं कि तुम किसी को भी मेरे इस गुप्त स्थान के बारे में न बताना। मनुष्य लोभी होता है, मेरी स्वर्ण-त्वचा के लोभ में वे मेरा वध कर देंगे।' युवक ने रोते हुए मृग के चरण छुए और शपथ ली: 'हे देव! यदि मैं आपका भेद खोलूं, तो मेरी जीभ गलकर गिर जाए!'
रानी का स्वप्न
उधर वाराणसी की महारानी खेमा ने स्वप्न में एक स्वर्ण मृग को राजसिंहासन पर बैठकर धर्मोपदेश देते देखा। रानी ने राजा से हठ किया कि यदि वह स्वर्ण मृग न मिला, तो वे प्राण त्याग देंगी। राजा ने घोषणा करवा दी कि जो स्वर्ण मृग का पता बताएगा, उसे सोने की मंजूषा में एक हज़ार मुद्राओं की थैली, उसे ढोने वाला सजा हुआ हाथी (या उससे भी श्रेष्ठ), और स्वर्ण-पट्टिका पर उत्कीर्ण श्लोक के अनुसार सुंदर स्त्रियाँ तथा उत्तम गांव दिया जाएगा।
लोभ ने शपथ मिटा दी
महाधनक ने जैसे ही यह घोषणा सुनी, उसका सारा कृतज्ञता-भाव लोभ की आग में भस्म हो गया। वह तुरंत राजमहल पहुंचा और राजा को मृग के गुप्त वन में ले गया। राजा की सेना ने पूरे वन को घेर लिया।
कमल-वन में घेराबंदी
बोधिसत्व ने जब सेना को देखा, तो वे डरे नहीं। वे शांत भाव से राजा के रथ के समीप आए। उनकी दिव्य आभा देखकर धनुर्धरों ने बाण नीचे कर लिए। मृग ने मधुर वाणी में पूछा: 'हे राजन! इस बीहड़ वन में तुम्हें मेरा पता किसने बताया?'
राजा ने विश्वासघाती को इंगित किया
राजा ने रथ के पास खड़े महाधनक की ओर संकेत किया: 'इस व्यक्ति ने!'
कृतघ्नता पर तेरह श्लोक
बोधिसत्व ने उस कृतघ्न की ओर देखा और तेरह मार्मिक श्लोकों में मानव-प्रकृति की स्वार्थपरता पर उपदेश दिया: 'हा धिक्कार! पानी में बहती लकड़ी को बचाना अच्छा, किंतु कृतघ्न मनुष्य को बचाना व्यर्थ है। जिस व्यक्ति को मैंने मौत के मुंह से निकाला, वही मुट्ठी भर सोने के लिए अपने रक्षक की जान का सौदा कर बैठा!'
राजा ने धनुष उठाया
यह सुनकर राजा ब्रह्मदत्त क्रोध से भर गए और उन्होंने महाधनक को मारने के लिए धनुष पर बाण चढ़ा लिया। किंतु बोधिसत्व ने तुरंत आगे आकर उस पापी को अपने शरीर की ओट में छिपा लिया और कहा: 'महाराज! इसे मत मारिए। सत्पुरुष बुराई का बदला बुराई से नहीं देते। इसे क्षमा कर दीजिए और इसे वही गांव दे दीजिए जिसका इसने लोभ किया था।'
मृग ने विश्वासघाती की रक्षा की और राज्य में अहिंसा का युग आया
राजा ब्रह्मदत्त इस अद्भुत करुणा को देखकर रो पड़े। वे स्वर्ण मृग को आदरपूर्वक पालकी में बिठाकर वाराणसी ले आए। वहां राजदरबार में मृग ने अहिंसा का अमर उपदेश दिया। राजा ने पूरे राज्य में सभी पशु-पक्षियों के लिए 'अभयदान' की घोषणा कर दी।
बुद्ध की पहचान-उद्घोषणा
कथा समाप्त करते हुए बुद्ध ने बांस-वन में उपस्थित भिक्षुओं के लिए उस जन्म की पहचान बताई: कृतघ्न ऋणी महाधनक उस जन्म में देवदत्त था, महारानी खेमा थेरी खेमा थीं, राजा ब्रह्मदत्त आनंद स्थविर थे, और अपने विश्वासघाती को क्षमा करने वाला स्वर्ण मृग स्वयं बुद्ध का पूर्वजन्म था।
क्या आप जानते हैं?
रुरु जातक बौद्ध परंपरा में राजाओं द्वारा वन्यजीवों को दिए जाने वाले सार्वभौमिक 'अभयदान' (जीव-रक्षा) का मुख्य शास्त्रीय आधार है।
कृतघ्न मनुष्य की तुलना बहती हुई लकड़ी से करना ('पानी में बहती लकड़ी भली, पर कृतघ्न बुरा') भारतीय नीति-साहित्य का एक अमर रूपक है।
यह कथा दर्शाती है कि धन का लोभ मनुष्य के मन से कृतज्ञता (कत्तञ्ञुता) और गंभीर शपथ को किस प्रकार क्षण भर में मिटा देता है।
स्वयं को बेचने वाले पापी को राजा के बाण से बचाने हेतु अपनी देह आगे कर देना बोधिसत्व की क्षमा (खन्ति) का सर्वोच्च आदर्श है।
वह कृतघ्न मनुष्य देवदत्त का पूर्व जन्म था, महारानी खेमा थेरी खेमा थीं और राजा ब्रह्मदत्त आनंद के पूर्व जन्म थे।
यह कथा मध्य तथा पूर्वी एशिया में गुफा-मंदिर भित्तिचित्रों हेतु सर्वाधिक लोकप्रिय विषयों में से एक बन गई, जिनमें दुनहुआंग तथा अजंता शामिल हैं, जहां परवर्ती पूर्वी एशियाई पुनर्कथनों में रुरु को कभी-कभी नौ रंगों वाला मृग भी कहा जाता है।
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