कामुक विमाता के कुत्सित प्रस्ताव को ठुकराने पर मिथ्या आरोप में पिता (पूर्वजन्म में देवदत्त) द्वारा मृत्यु-शिला से नीचे फेंके जाने पर, राजकुमार महापदुम एक दयालु पर्वत-देवता द्वारा थामे गए और नागराज की शरण में सुरक्षित रखे गए; उन्होंने तपस्वी बनकर पश्चाताप करते पिता को क्षमा कर दिया और सिंहासन अस्वीकार किया, जबकि पिता ने सत्य जानने पर कुटिल रानी (परजन्म में चिंचा-माणविका) को उसी शिला से नीचे फेंक दिया।
बुद्ध पर पूर्व में भी लगा था ऐसा ही आरोप
भगवान बुद्ध ने जेतवन में यह कथा चिंचा-माणविका के विषय में कही, जिसने अपने वस्त्र के भीतर काठ का एक गोल टुकड़ा बांधकर सभा के समक्ष मिथ्या आरोप लगाया था कि बुद्ध ही उसकी संतान के पिता हैं। देवराज शक्र के हस्तक्षेप से वह काठ खिसक गया और उसका छल सबके सामने प्रकट हो गया, जिससे क्रुद्ध जन-समूह ने उसे विहार से बाहर निकाल दिया। बुद्ध ने कहा कि यह पहली बार नहीं था जब उस स्त्री ने झूठ के सहारे किसी निर्दोष को नष्ट करने का प्रयास किया था, और तब उन्होंने अतीत की यह कथा सुनाई।
कमल के समान निष्कलंक राजकुमार
प्राचीन काल में वाराणसी के राजा ब्रह्मदत्त की पट्टमहिषी से बोधिसत्व का जन्म हुआ। उनका नाम 'महापदुम' रखा गया क्योंकि उनका रूप खिले हुए श्वेत कमल (पदुम) के समान निष्कलंक, सुंदर और सुगंधित था। पट्टमहिषी के देहांत के पश्चात राजा ने एक अत्यंत रूपवती किंतु कामांध स्त्री से विवाह किया।
एक बार सीमांत प्रांतों में विद्रोह होने पर राजा सेना लेकर गए और राजधानी की देखरेख राजकुमार महापदुम को सौंप दी। राजकुमार ने इतने न्याय और स्नेह से शासन किया कि प्रजा आनंदित हो गई। जब राजा विजयी होकर लौटे, तो राजकुमार ने भव्य स्वागत किया। महल की अटारी से राजकुमार के तेजस्वी रूप को देखकर कामांध विमाता के मन में कुत्सित वासना जाग उठी।
टूटने से इनकार करता शील
जब राजकुमार शिष्टाचारवश विमाता के चरण छूने महल में पहुंचे, तो उस पापी स्त्री ने उनका वस्त्र पकड़ लिया और अनैतिक संबंध बनाने का घृणित प्रस्ताव रखा। राजकुमार ने झटके से हाथ छुड़ाया और डांटते हुए कहा: 'माता! ऐसा नीच विचार मन में भी मत लाओ। तुम मेरे पूज्य पिता की भार्या हो और मेरे लिए सगी माता के समान हो। मैं मरना पसंद करूंगा किंतु ऐसा पाप कभी नहीं करूंगा।'
भय से जन्मा कुचक्र
भेद खुल जाने के भय से उस कुटिल स्त्री ने अपने वस्त्र फाड़ लिए, अपने ही नाखूनों से अपने चेहरे और वक्ष को खुरच लिया और धूल में लोटकर रोने लगी। राजा के लौटने पर उसने रोते हुए झूठा आरोप लगाया कि राजकुमार ने उसके साथ दुर्व्यवहार किया है।
क्रोध में अंधे होकर राजा ने बिना किसी जांच-पड़ताल के राजकुमार को मृत्युदंड दे दिया। मंत्रियों और प्रजा के विलाप की उपेक्षा करते हुए राजा ने आदेश दिया कि राजकुमार को जंजीरों में बांधकर 'चोर-प्रपात' नामक भयावह पहाड़ी से नीचे फेंक दिया जाए।
करुणा ने थामा, नागराज ने शरण दी
जब राजकुमार को खाई में फेंका गया, तब उनका मन अपने प्रति क्रूर व्यवहार करने वालों के प्रति भी मैत्री और क्षमा से भरा हुआ था। उस पर्वत पर निवास करने वाले एक देवता ने उनके शील के प्रभाव से प्रभावित होकर अपने दोनों हाथों से गिरते हुए राजकुमार को थाम लिया और सांत्वना देते हुए कहा: 'पदुम, भयभीत न हो।' मनुष्य-लोक में उन्हें सुरक्षित न रख सकने के कारण उस देवता ने उन्हें नीचे ले जाकर नागराज के फण पर रख दिया, और नागराज ने उनका सम्मानपूर्वक सत्कार करते हुए उन्हें पाताल लोक ले गए।
एक वर्ष पश्चात राजकुमार ने संन्यास की इच्छा व्यक्त की और हिमालय में जाकर तपस्वी बन गए।
सत्य का उजागर होना
इधर, वाराणसी का एक वनरक्षक हिमालय में भटकते हुए राजकुमार को तपस्वी के रूप में देखकर पहचान गया। कुछ दिन उनके पास ठहरकर वह वाराणसी लौटा और राजा को बताया कि उनका पुत्र कहाँ रहता है।
पिता का पश्चाताप
पुत्र को जीवित जानकर राजा ब्रह्मदत्त विशाल दल के साथ निकले, वन के किनारे डेरा डाला और दरबारियों सहित पैदल राजकुमार के पास पहुँचे, जो अपनी पर्णकुटी के द्वार पर बैठे थे। महापदुम ने उन्हें वन के फल अर्पित किए और स्नेहपूर्वक बातचीत की। राजा ने पूछा कि प्रपात से गिरकर वे कैसे बचे, तो राजकुमार ने बताया कि उस पर्वत-प्रदेश में जन्मे एक शक्तिशाली नाग ने उन्हें अपने कुंडल में थामकर सुरक्षित रखा। तब राजा ने उन्हें घर ले जाकर राज्य सौंपने का प्रस्ताव रखा।
निकाला गया काँटा
राजकुमार ने शांत भाव से प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया। उन्होंने स्वयं को उस मनुष्य के समान बताया जिसने काँटा (बंसी) निगल लिया हो और उसके निकल जाने पर ही सुखी हुआ हो; राजा के पूछने पर उन्होंने कहा कि वासना ही वह काँटा है, जिसे उन्होंने त्याग द्वारा बाहर निकाल दिया। उन्होंने पिता से दस राजधर्मों का पालन करने, अधर्म छोड़ने और धर्मपूर्वक शासन करने का आग्रह किया, और राजा अश्रुपूर्ण नेत्रों से लौट चले।
लौटते समय राजा ने दरबारियों से पूछा कि किसके कारण उनका ऐसे सदाचारी पुत्र से वियोग हुआ, तो उन्होंने रानी का नाम लिया। राजा ने रानी को पकड़वाकर उसी 'चोर-प्रपात' से नीचे फेंकवा दिया, जिससे उसने अपने निर्दोष पुत्र को गिरवाया था—यह उसके छल का कठोर अंत था, यद्यपि इससे उसके फैलाए दुःख को मिटाया नहीं जा सकता था। राजा वाराणसी लौटकर धर्मपूर्वक शासन करने लगे और राजकुमार महापदुम ध्यान-अवस्था प्राप्त कर ब्रह्मलोक को प्राप्त हुए।
बुद्ध द्वारा पात्रों की पहचान
यह कथा समाप्त करते हुए भगवान बुद्ध ने इस जन्म-बंधन को प्रकट किया: 'उस समय का राजा देवदत्त था, कुटिल रानी चिंचा-माणविका थी, पर्वत-देवता सारिपुत्र थे, नागराज आनन्द थे, और स्वयं मैं ही राजकुमार महापदुम था।' पालि त्रिपिटक का जातक संख्या 472 इस कथा को इसी रूप में दर्ज करता है, जो बुद्ध के अंतिम जीवन में चिंचा-माणविका द्वारा लगाए गए मिथ्या आरोप की पृष्ठभूमि स्पष्ट करने हेतु सुनाई गई थी।
क्या आप जानते हैं?
महा-पदुम जातक बौद्ध विहित साहित्य का वह अमर आख्यान है जो चरित्र की पवित्रता, काम-वासना के तिरस्कार और क्षमा की सर्वोच्च शक्ति को दर्शाता है—और यही वह जातक है जिसे बुद्ध ने जेतवन में चिंचा-माणविका के मिथ्या आरोप की पृष्ठभूमि समझाने हेतु सुनाया था।
मृत्यु-प्रपात से गिरते समय भी मन में वैर न लाना और क्षमा बनाए रखना क्षान्ति पारमिता (सहनशीलता) का सर्वोच्च शिखर है।
राजकुमार का उद्धार दो चरणों में होता है
पहले पर्वत-देवता (सारिपुत्र) अपने हाथों से उन्हें थामकर सांत्वना देते हैं, फिर उन्हें नागराज (आनन्द) की शरण में पाताल लोक भेज देते हैं—यह दर्शाता है कि अटल शील आकाश और पाताल दोनों के देवताओं का आदर अर्जित करता है।
राजकुमार के सिंहासन-त्याग का केंद्रीय रूपक यह है कि संन्यास निगले हुए काँटे को बाहर खींच निकालने जैसा है, और वासना ही वह काँटा है। राजा के साथ उनका संवाद इस जातक के चौदह श्लोकों में से श्लोक 9–14 में है।
कथा के अंत में बुद्ध ने समस्त पात्रों की पहचान प्रकट की: क्रुद्ध राजा देवदत्त था, कुटिल रानी चिंचा-माणविका थी, पर्वत-देवता सारिपुत्र थे, नागराज आनन्द थे, और पदुम वे स्वयं थे।
कथा का अंत कर्म-फल की शांत शिक्षा देता है
जब रानी का कुचक्र प्रकट हुआ, तो उसे भी उसी 'चोर-प्रपात' से नीचे फेंका गया, जिससे उसने अपने निर्दोष सौतेले पुत्र को गिरवाया था।
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