दुर्गे दुर्घट भारी – देवी दुर्गा की मराठी स्तुति
यह एक मराठी भाषा में रचित भजन है जिसमें भक्त देवी दुर्गा (महिषासुरमर्दिनी) की स्तुति करते हुए उनसे जीवन के कष्टों से मुक्ति की प्रार्थना करता है।
श्लोक
हे दुर्गे, तुम्हारे बिना यह संसार अत्यंत कठिन है। हे अनाथों की माता, अंबे, कृपा का विस्तार करो। मैं बार-बार जन्म-मरण के चक्र में पड़ा हूँ। अब मैं हार गया हूँ, इस संकट को दूर करो।
श्लोक 1
जय देवी, जय देवी, जय महिषासुर का मर्दन करने वाली। हे देवताओं के राजा को वरदान देने वाली, तारिणी और संजीवनी।
श्लोक 2
तीनों लोकों में हर जगह देखने पर तुम्हारे समान कोई नहीं है। चारों वेदों ने परिश्रम किया, परंतु कुछ न कह सके। यहाँ तक कि विवाद करने वाले भी प्रवाह में पड़ गए। किंतु तुम अपने भक्त के लिए शीघ्र प्राप्त होती हो।
श्लोक 3
प्रसन्न मुख वाली, तुम अपने सेवकों पर प्रसन्न होती हो। उन्हें क्लेशों से मुक्त करती हो और संसार के बंधनों को तोड़ती हो। हे अंबे, तुम्हारे बिना किसने आशाएँ पूरी की हैं? नरहरि तुम्हारे चरणकमलों में लीन हो गए।
श्लोक 4
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
नित्य प्रतिदिन अथवा शुभ तिथियों (एकादशी, पूर्णिमा, प्रदोष) पर
ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) अथवा संध्या काल
शुद्ध घी का दीपक, धूप, ताजे पुष्प एवं नैवेद्य/जल
- मानसिक शांति, आत्मिक उन्नति एवं घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
पृष्ठभूमि
यह भजन महाराष्ट्र की वारकरी (भक्ति) परंपरा से जुड़ा है और परंपरागत रूप से इसे संत नरहरि सोनार की रचना माना जाता है। इसका प्रयोग प्रायः नवरात्रि के दिनों में या देवी की पूजा के अवसरों पर किया जाता है। भजन में भक्त ने अपनी असहायता व्यक्त करते हुए देवी से रक्षा की प्रार्थना की है। इस आरती का ध्रुवपद जिस महिषासुर-वध की महिमा गाता है, वह मार्कण्डेय पुराण के देवीमाहात्म्य (दुर्गासप्तशती) के अध्याय 2-3 में वर्णित है, जो महिषासुरमर्दिनी प्रसंग का मूल शास्त्रीय आधार है।
क्या आप जानते हैं?
रचना
यह मराठी भक्ति कविता देवी दुर्गा की महिमा में लिखी गई है, जिसमें भक्त अपनी असहायता और देवी की कृपा का गुणगान करता है।
महिषासुरमथनी
कविता में देवी को 'महिषासुरमथनी' कहा गया है, यानी महिषासुर नामक राक्षस का वध करने वाली, जो दुर्गा सप्तशती की प्रमुख कथा है।
अनाथनाथे
'अनाथनाथे' शब्द देवी को अनाथों की रक्षक बताता है, जो भक्त के आत्मसमर्पण और देवी की करुणा को दर्शाता है।
भवपाश
'भवपाश' का अर्थ है जन्म-मृत्यु के बंधन, जिसे देवी भक्तों के लिए तोड़ती हैं, यह मोक्ष की ओर संकेत है।
नरहरि
अंतिम पंक्ति में 'नरहरि' शब्द भक्त का नाम या विष्णु के नरसिंह अवतार की ओर संकेत कर सकता है, जो देवी के प्रति समर्पण को दर्शाता है।
संरचना
यह मराठी आरती है, जिसमें पद और ध्रुवपद (कोरस) का क्रम है। ध्रुवपद की पंक्ति 'जय देवी जय देवी' बार-बार आती है और दोहराव तथा लयबद्धता से भक्ति भाव बढ़ता है।
Devi
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