भाग्यदा लक्ष्मी का आह्वान
पुरंदरदास की कन्नड़ देवरनाम रचना, जिसमें भक्त माँ लक्ष्मी को घर आने और सौभाग्य देने के लिए बुलाते हैं; शुक्रवार को गाई जाती है।
श्लोक
हे भाग्यदायिनी लक्ष्मी, तुम आओ माँ, तुम ही हमारी माता हो। हे सौभाग्य की लक्ष्मी, आओ माँ।
श्लोक 1
पग पग पर कदम रखते, पैरों में घुँघरू की ध्वनि सुनाते हुए, सज्जन और साधुओं की पूजा के समय, जैसे छाछ में छिपा मक्खन प्रकट हो, वैसे ही प्रकट हो। हे भाग्यदायिनी लक्ष्मी, आओ माँ।
श्लोक 2
सोने की वर्षा बुलाती हुई आओ, मन की कामनाओं की सिद्धि दिखाओ। असंख्य सूर्यों के तेज से चमकने वाली, राजा जनक की पुत्री, शीघ्र आओ। हे भाग्यदायिनी लक्ष्मी, आओ माँ।
श्लोक 3
इधर-उधर भटके बिना भक्तों के घरों में नित्य उत्सव, नित्य सुमंगली हो। सत्य को प्रकट करने वाले साधु सज्जनों के चित्त में चमकने वाली प्रतिमा। हे भाग्यदायिनी लक्ष्मी, आओ माँ।
श्लोक 4
अपार भाग्य देकर, हाथों में कंकण घुमाती हुई आओ। कुंकुम से चिह्नित कमलनयनी, वेंकटरमण की प्रतापी रानी। हे भाग्यदायिनी लक्ष्मी, आओ माँ।
श्लोक 5
चीनी और घी की नहरें बहाकर, शुक्रवार की पूजा के समय आओ। अलगिरि रंगन की प्रिय, शुद्ध पुरंदर विट्ठल की रानी। हे भाग्यदायिनी लक्ष्मी, आओ माँ।
श्लोक 6
पूजन विधि एवं फलश्रुति (महत्व व लाभ)
शुक्रवार एवं पूर्णिमा तिथि
संध्याकाल (दीप प्रज्वलन वेला)
कमल का पुष्प, खीर का भोग, पंचामृत, कुमकुम एवं शुद्ध घी का दीपक
- धन-धान्य, वैभव, पारिवारिक सुख-शांति एवं मानसिक प्रसन्नता
पृष्ठभूमि
यह भजन हरिदास परंपरा का हिस्सा है, जिसे प्रायः शुक्रवार को लक्ष्मी पूजा के समय या घर में सुख-शांति के लिए गाया जाता है। पुरंदरदास (1484–1564) कर्नाटक संगीत के जनक माने जाते हैं और उनके भजन सरल भाषा में गहरी भक्ति सिखाते हैं। विष्णु पुराण (1.9) में समुद्र-मंथन से प्रकट होकर विष्णु की पत्नी बनने की कथा मिलती है; यह गीत उसी पृष्ठभूमि पर लक्ष्मी का घर में स्वागत करता है।
इस पाठ के विषय में
रचयिता: Purandara Dasa
क्या आप जानते हैं?
रचयिता
श्री पुरन्दरदास (1484–1564) कर्नाटक संगीत के जनक माने जाते हैं। उन्होंने सरल कन्नड़ भाषा में सैकड़ों भजन रचे, जिनमें यह 'भाग्यद लक्ष्मी' भजन अत्यंत लोकप्रिय है।
भजन का स्वरूप
यह एक 'देवरनाम' है जो हरिदास परंपरा में गाया जाता है। इसमें पल्लवी और पाँच चरण हैं, जो लक्ष्मी के आगमन की प्रार्थना करते हैं। प्रत्येक चरण के अंत में पल्लवी दोहराई जाती है।
प्रतीकात्मकता
'मज्जिगेयोलगिन बेण्णेयन्ते' (छाछ में मक्खन के समान) की उपमा बताती है कि लक्ष्मी हर घर में सूक्ष्म रूप से विद्यमान हैं, लेकिन भक्ति से ही प्रकट होती हैं।
धार्मिक संदर्भ
इस भजन में लक्ष्मी को 'वेंकटरमणन बिंकद राणी' (वेंकटेश्वर की पत्नी) कहा गया है, जो तिरुपति मंदिर से जुड़ाव दर्शाता है। साथ ही शुक्रवार की पूजा का उल्लेख लक्ष्मी की आराधना के लिए विशेष दिन को दर्शाता है।
संगीत महत्व
सरल पद-रचना और हर चरण के बाद दोहराई जाने वाली पल्लवी के कारण इसे सभी आयु के लोग आसानी से गा लेते हैं। पुरन्दरदास ने संगीत को भक्ति का सरल माध्यम बनाया।
लोकप्रियता
यह भजन कर्नाटक और आंध्र प्रदेश के घरों में सुबह-शाम गाया जाता है, विशेषकर शुक्रवार को। इसे समृद्धि और सौभाग्य के लिए अत्यंत प्रभावी माना जाता है।
Lakshmi
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