पापमोचिनी एकादशी व्रत कथा (चैत्र कृष्ण पक्ष)
भविष्योत्तर पुराण में वर्णित चैत्र कृष्ण पक्ष की पापमोचिनी एकादशी की पावन कथा, जिसके प्रभाव से ऋषि मेधावी और अप्सरा मंजुघोषा घोर शाप व पापों से मुक्त हुए थे।
भविष्योत्तर पुराण से लोमश-मान्धाता संवाद
भविष्योत्तर पुराण के अनुसार धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा:
"हे मधुसूदन! चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का क्या नाम है? इसकी पावन कथा और विधि क्या है? कृपा करके मुझे बताइए।"
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा:
"हे राजन्! प्राचीन काल में देवर्षि लोमश ने चक्रवर्ती राजा मान्धाता को यह कथा सुनाई थी। चैत्र कृष्ण पक्ष की एकादशी को पापमोचिनी एकादशी कहा जाता है। यह समस्त पापों को भस्म करने वाली और बड़े से बड़े शाप से मुक्ति दिलाने वाली परम पावन तिथि है।"
पाठ देखने के इच्छुक पाठकों के लिए: पद्म पुराण के उत्तरखण्ड (समापन खण्ड) में, एन. ए. देशपांडे के अंग्रेज़ी अनुवाद की अध्याय-संख्या के अनुसार, यह एकादशी अध्याय 46 में कही गई है, जहाँ सम्राट मान्धाता के पूछने पर लोमश ऋषि मेधावी और अप्सरा मञ्जुघोषा की कथा सुनाते हैं। संस्करणों और अनुवादों में अध्याय-संख्या भिन्न हो सकती है, इसलिए इसे केवल उस अनुवाद के लिए मार्गदर्शक मानें।
ऋषि मेधावी और अप्सरा मंजुघोषा की कथा
चैत्ररथ वन में महर्षि च्यवन के तपस्वी पुत्र ऋषि मेधावी कठोर तपस्या में लीन थे। उनके तपोबल से भयभीत होकर देवराज इन्द्र ने उनकी तपस्या भंग करने के लिए स्वर्ग की रूपवती अप्सरा मंजुघोषा को भेजा।
मंजुघोषा ने अपने नूपुरों की झंकार और मधुर गायन से मेधावी मुनि को आकर्षित कर लिया। कामदेव के प्रभाव से मुनि का संयम टूट गया और वे अप्सरा के प्रेम पाश में बंध गए। दोनों कई वर्षों तक एक साथ रहे।
मोहभंग और पिशाचिनी शाप
एक दिन मंजुघोषा ने स्वर्ग लौटने की अनुमति मांगी:
"हे मुनिवर! अब मुझे देवलोक जाने की आज्ञा दीजिए।"
मेधावी ने कहा:
"हे सुन्दरी! अभी तो तुम प्रातःकाल ही आई हो, सन्ध्या तक रुक जाओ।"
मंजुघोषा ने हंसकर कहा:
"हे मुनिवर! आपके साथ रहते हुए मुझे सत्तावन वर्ष, नौ महीने और तीन दिन बीत चुके हैं। आप इसे एक सुबह कैसे कह रहे हैं?"
यह सुनते ही मेधावी मुनि की तंद्रा टूटी। उन्हें घोर पश्चाताप हुआ कि काम-वासना ने उनकी सम्पूर्ण तपस्या और ब्रह्मचर्य को नष्ट कर दिया। मुनि ने क्रोध में आकर मंजुघोषा को शाप दे दिया:
"हे पापिनी! तूने मेरा जीवन और तप नष्ट किया है। तू स्वर्ग से पतित होकर मृत्युलोक में पिशाचिनी बनकर भटकेगी!"
पापमोचिनी एकादशी द्वारा मुक्ति
मंजुघोषा रोते हुए मुनि के चरणों में गिर पड़ी और शाप मुक्ति की प्रार्थना करने लगी।
मुनि का क्रोध शांत हुआ और उन्होंने दयापूर्वक कहा:
"चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की पापमोचिनी एकादशी का विधिपूर्वक उपवास करो। भगवान विष्णु की आराधना से तुम्हारा यह पिशाचिनी रूप समाप्त हो जाएगा।"
मेधावी मुनि स्वयं भी लज्जित होकर अपने पिता महर्षि च्यवन के आश्रम पहुँचे। पिता ने पुत्र का तेज क्षीण देखकर कहा:
"पुत्र! तुमने भारी भूल की है। अपने पाप के प्रायश्चित और आत्म-तेज की पुनः प्राप्ति के लिए तुम भी पापमोचिनी एकादशी का पूर्ण उपवास करो।"
पिता की आज्ञानुसार मेधावी मुनि और मंजुघोषा दोनों ने पूर्ण श्रद्धा से पापमोचिनी एकादशी का व्रत रखा। भगवान श्रीहरि की कृपा से दोनों के समस्त पाप नष्ट हो गए। मंजुघोषा पिशाच योनि से मुक्त होकर दिव्य रूप में स्वर्ग लौट गई और मेधावी मुनि का तपोबल पुनः जाग्रत हो गया।
पूजन एवं व्रत विधि
- 1.पापों का विनाश: सच्चे पश्चाताप और उपवास से जन्मों के पापों का क्षय होता है।
- 2.श्रीहरि पूजन: भगवान विष्णु को पीले पुष्प, चन्दन, धूप और तुलसी दल अर्पित करें।
- 3.रात्रि जागरण: रात्रि में सोए बिना भगवान के पावन नामों का संकीर्तन करें।
- 4.द्वादशी पारण: द्वादशी के दिन प्रातः स्नान और दान के पश्चात सात्विक भोजन से व्रत खोलें।
संकल्प, उपवास अनुशासन और व्रत के समय का महत्व
च्यवन का मेधावी को दिया गया उपदेश और मेधावी का मंजुघोषा को दिया गया उपदेश, दोनों एक ही प्रकार से आरम्भ हुए: संकल्प से, अर्थात् प्रातःकाल भगवान विष्णु के समक्ष लिया गया वह वचन जिसमें पापमोचिनी एकादशी का नाम लेकर व्रत और उसके पश्चात् होने वाले पारण को बिना त्रुटि पूर्ण करने की प्रतिज्ञा ली जाती है। श्रीकृष्ण युधिष्ठिर को बताते हैं कि यही संकल्प सच्चे प्रायश्चित को मात्र पश्चाताप से अलग करता है, क्योंकि क्रोध में दिया गया इतना गम्भीर शाप केवल दुःख से नहीं, बल्कि विधिवत भक्ति के कर्म से ही मिट सकता था।
व्रत में सूर्योदय से सूर्योदय तक अन्न का त्याग आवश्यक है, जबकि जो कठोर अनुशासन नहीं रख सकते उनके लिए फल की छूट है। चतुर्भुज भगवान विष्णु की पूजा प्रातःकाल पीले फूल, चन्दन और धूप से की जाती है और संध्या में पुनः दोहराई जाती है, जब परिवार रातभर विष्णु सहस्रनाम का जप करते हुए जागता है, ठीक वैसे ही जैसे मेधावी और मंजुघोषा ने मिलकर अपने ऊपर के शाप को मिटाने के लिए किया था।
व्रत का पारण: द्वादशी पर उपवास समाप्ति
व्रत की समाप्ति द्वादशी की प्रातः, पंचांग द्वारा निर्धारित समय में पारण से होती है। प्रातःकालीन प्रार्थना के बाद भक्त ब्राह्मणों को भोजन कराते हैं और तभी अपना पहला आहार लेते हैं, संयम और दान का यह चक्र पूर्ण करते हुए, जिसने कथा में एक ही साथ ऋषि की खोई तपस्या और अप्सरा का छीना हुआ सौन्दर्य लौटा दिया था।
आध्यात्मिक शिक्षा
पापमोचिनी एकादशी की शिक्षा एक साथ दो दिशाओं में कार्य करती है: यह मंजुघोषा को उस शाप से मुक्त करने के लिए दी जाती है जिसे उसने स्वयं नहीं चुना था, और मेधावी को उस भूल से मुक्त करने के लिए जो उसने वासना के साथ-साथ क्रोध से भी अर्जित की थी। श्रीकृष्ण युधिष्ठिर को बताते हैं कि यह व्रत प्रलोभन में पड़ने के पाप और उसके प्रतिकार में अत्यधिक कठोर शाप देने के पाप में कोई भेद नहीं करता; दोनों अन्ततः पाप ही हैं, और दोनों एक ही सच्ची भक्ति-रात्रि के समक्ष मिट जाते हैं।
क्या आप जानते हैं?
चैत्र कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली इस एकादशी का शाब्दिक अर्थ है 'समस्त पापों से मुक्ति दिलाने वाली'।
इसके प्रभाव से ऋषि मेधावी का तपोबल पुनः प्राप्त हुआ और मंजुघोषा पिशाचिनी शाप से मुक्त हुई।
नव संवत्सर (हिन्दू नववर्ष) से ठीक पूर्व यह व्रत आत्म-शुद्धि का सर्वश्रेष्ठ माध्यम है।
यह व्रत मनुष्य को काम, क्रोध और प्रमाद से मुक्त कर आध्यात्मिक तेज प्रदान करता है।
पीठासीन स्वरूप एवं पारण
यह व्रत भगवान मधुसूदन को समर्पित है; इसका पारण द्वादशी तिथि में सूर्योदय के पश्चात तथा हरि वासर समाप्त होने के बाद ही सात्विक रूप से किया जाता है।
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संबंधित शिक्षाएं
एक ही शिक्षा, विभिन्न परंपराओं में प्रतिध्वनित
