जेतवन में एक लालची भिक्षु
बुद्ध ने यह कथा जेतवन में सुनाई, और जातक अट्ठकथा इसे जातक क्रमांक 275 गिनती है। यह एक ऐसे भिक्षु के बारे में है जो स्वादिष्ट भोजन का लालची था। बुद्ध ने कहा कि यह भिक्षु अतीत में भी लालची था, और तब भी उसके लोभ ने उसे हानि पहुँचाई। फिर उन्होंने कथा सुनाई। पालि पाठ कहता है कि कथा पिछले जातक, लोल जातक, क्रमांक 274, के समान ही है, इसलिए इस प्रस्तुति में मुख्य अंतर गाथाओं का है।
व्यापारी की रसोई में घोंसले की टोकरी
जब ब्रह्मदत्त वाराणसी में राज्य करते थे, तब एक धनी व्यापारी के रसोइये ने रसोई में घोंसले की एक टोकरी टाँगी। उसने यह पुण्य कमाने के लिए किया, ताकि किसी पक्षी को आश्रय मिले। बोधिसत्व उस टोकरी में कबूतर के रूप में रहते थे। वे हर सुबह चुगने जाते और शाम को विश्राम के लिए लौट आते।
मछली चाहने वाला कौआ
एक लालची कौए ने रसोई में उत्तम मछली और मांस देखा। उसे वह चाहिए था, और उसने एक योजना सोची। उसने कबूतर से मित्रता की और कहा कि वह भी उसके साथ चुगने जाना चाहता है। कबूतर सरल स्वभाव का था और उसने कौए को साथी स्वीकार कर लिया। कुछ दिन वे साथ-साथ गए।
साथी जो केवल दिखावा करता था
कौआ कबूतर के साथ जाता था, पर वह वास्तव में कबूतर की तरह नहीं चुगता था। वह कहीं और कीड़े ढूँढता और चुगने का दिखावा करता था। उसका मन सारा समय रसोई में लगा रहता था। वह बिना देखे बर्तनों तक पहुँचने का रास्ता खोज रहा था।
बीमारी का बहाना
एक दिन व्यापारी के घर मछलियों की बड़ी खेप आई। कौआ लेट गया और कराहने लगा, और बोला कि वह बीमार है और बाहर नहीं जा सकता। कबूतर अकेला चुगने चला गया। उसके जाते ही कौआ उठा और भोजन के एक थाल पर जा बैठा। उसने सोचा था कि सब कुछ उसे अकेले ही मिलेगा।
रसोइये का दंड
रसोइये ने उसे पकड़ लिया। उसने कौए के सिर की एक चोटी छोड़कर उसके सारे पंख नोच दिए और छिली खाल पर मसालेदार छाछ मल दी। फिर उसने उसे घोंसले की टोकरी में डाल दिया। कौआ वहाँ पीड़ा में पड़ा रहा।
कबूतर का घर लौटना
शाम को कबूतर लौटा। उसने टोकरी में कौए को पड़ा देखा और गाथा में बोला। उसने पूछा कि कौए के अपने ही घोंसले में लेटा यह सुंदर सारस कौन है। उसने जोड़ा कि उसका मित्र कौआ उग्र है और यह उसका घोंसला है। कौए ने अपनी गाथा में उत्तर दिया। उसने कहा, 'निश्चय ही तुम मुझे जानते हो, मित्र, मैं द्विज हूँ, बाजरा खाने वाला। मैंने तुम्हारी बात नहीं मानी, इसलिए तुम मुझे नुचा हुआ देखते हो।'
कबूतर का निर्णय
कबूतर ने कहा, 'मित्र, तुम फिर कष्ट पाओगे, क्योंकि तुम्हारा स्वभाव ही ऐसा है। मनुष्यों के धन का भोग पक्षी नहीं कर सकते।' फिर उसने कहा कि वह अब वहाँ नहीं रह सकता, और उड़ गया। कौआ टोकरी में ही मर गया। उसकी भूख उसे उतनी दूर ले गई जितनी दूर उसका विवेक उसे जाने नहीं देता।
बुद्ध द्वारा जन्मों की पहचान
प्रवचन समाप्त करके बुद्ध ने पात्रों की पहचान बताई। लालची भिक्षु कौआ था। स्वयं बुद्ध कबूतर थे। चार आर्य सत्य सुनकर भिक्षु ने अनागामी फल प्राप्त किया।
वह शिक्षा जो रसोई से भी लंबी चली
जातक अट्ठकथा यह कथा नई गाथाओं के साथ फिर कहती है, क्योंकि यह शिक्षा दोहराने योग्य है। लोभ ने कौए को पहले दिखावा करना सिखाया, फिर झूठ बोलना, फिर चोरी करना। कबूतर की सलाह, जिसे कौए ने नहीं माना, आरंभ से स्पष्ट थी। अंतिम गाथा की चेतावनी सरल है। कुछ चीज़ें उनके लिए नहीं होतीं जिन्होंने उन्हें अर्जित नहीं किया, और चतुराई से उन्हें लेने का प्रयास हानि में समाप्त होता है। साधक स्वयं से पूछ सकता है कि कौन-सी भूख उसे ऐसी रसोइयों की ओर खींचती है जो उसकी अपनी नहीं हैं, और वह कौन-सा बुद्धिमान मित्र है जिसकी सलाह उसने अनसुनी कर दी है।
क्या आप जानते हैं?
यह जातक अट्ठकथा का जातक क्रमांक 275 है, और पालि पाठ कहता है कि इसकी कथा लोल जातक, क्रमांक 274, के समान ही है।
दोनों कथाओं में अंतर उनकी गाथाओं में है। इसमें कबूतर व्यंग्य से पूछता है कि कौए के घोंसले में लेटा यह सुंदर सारस कौन है।
कौआ कबूतर के साथ खाने का नाटक करता था, पर वह वास्तव में कहीं और कीड़े ढूँढता था और केवल रसोई तक पहुँचना चाहता था।
रसोइये ने कौए के सिर की एक चोटी छोड़कर सारे पंख नोच दिए, उसकी छिली खाल पर मसालेदार छाछ मली और उसे टोकरी में डाल दिया।
बुद्ध ने लालची भिक्षु को कौए के रूप में और स्वयं को कबूतर के रूप में पहचाना, और भिक्षु ने अनागामी फल प्राप्त किया।
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Buddha
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