कोसल में एक ब्राह्मण का प्रश्न
यह जातक, पालि त्रिपिटक का संख्या २९०, बुद्ध ने जेतवन में कोसल-नरेश के एक ब्राह्मण सलाहकार के विषय में सुनाया। उस ब्राह्मण के मन में प्रश्न उठा कि राजा उसका सम्मान उसके शील के कारण करता है या केवल उसके जन्म और कुल के कारण। यह जानने के लिए उसने तीन दिन राजकोष से सिक्के उठाए। तीसरे दिन वह पकड़ा गया और राजा के सामने लाया गया, जिसने उसे दंड देने का आदेश दिया। उसने बताया कि उसने यह अपनी प्रतिष्ठा परखने के लिए किया था, और राजा समझ गया कि उसका स्नेह जन्म से नहीं, शील से जीता गया था। यह जानकर कि शील ही परम कल्याण है, और गृहस्थ जीवन में उसे पूर्णता तक नहीं पहुँचाया जा सकता, ब्राह्मण ने संसार-त्याग की अनुमति माँगी। वह जेतवन गया, प्रव्रजित हुआ, और शीघ्र ही अर्हत हो गया। जब भिक्षु धर्मसभा में उसके आचरण की चर्चा कर रहे थे, तब बुद्ध ने कहा कि ऐसी परीक्षा का अतीत में भी उदाहरण है।
पुरोहित का निजी प्रयोग
जब ब्रह्मदत्त बनारस में राज्य करते थे, तब बोधिसत्व राजा के कुल-पुरोहित थे। विद्वान, राजदरबार और प्रजा दोनों से सम्मानित, उनके मन में एक शांत प्रश्न उठा: जो सम्मान मुझे मिलता है, वह मेरी विद्या और कुल को है, या मेरे आचरण की शुद्धता को? उन्होंने इसकी परीक्षा लेने का निश्चय किया।
सिक्के उठाए गए, पुरोहित पकड़े गए
पुरोहित कोष में गए और लगातार दिनों तक चुपचाप मेज़ से सिक्के उठाते रहे। तीसरे दिन उन्हें पकड़ लिया गया और राजा के पास ले जाया जाने लगा। जिन कोष-अधिकारियों ने पहले उनके आगे सिर झुकाया था, वे अब उनके हाथ और आस्तीन में केवल एक चोर देख रहे थे।
मार्ग में सपेरे
राजा के पास ले जाए जाते समय बोधिसत्व ने कुछ सपेरों को साँप नचाते देखा। राजा के पूछने पर कि उसने ऐसा क्यों किया, उन्होंने कहा कि वे अपने शील की परीक्षा ले रहे थे। फिर उन्होंने तीन गाथाएँ कहीं। पहली, जो "सीलं किरेव कल्याणं" से आरंभ होती है, कहती है कि शील संसार में सुंदर और अनुपम है, और घातक साँप को देखो, जो शीलवान होने के कारण हानि नहीं पाता। दूसरी कहती है कि मैं उस शील को ग्रहण करूँगा जिसे संसार सराहता है और जो सुरक्षा देता है, क्योंकि जो श्रेष्ठ आचरण करता है वही शीलवान कहलाता है। तीसरी कहती है कि शीलवान अपने संबंधियों को प्रिय होते हैं, मित्रों में शोभित होते हैं, और मृत्यु के बाद सुगति में उत्पन्न होते हैं।
संसार-त्याग की अनुमति
पुरोहित ने राजा से कहा कि उनके कुल का धन और प्रतिष्ठा शील के सामने बहुत थोड़ी है। राजा के बहुत अनुनय करने के बाद उन्हें जाने की अनुमति मिली। वे हिमालय में तपस्वी बने, उन्होंने अभिज्ञाएँ और समापत्तियाँ प्राप्त कीं, और ब्रह्मलोक में उत्पन्न हुए।
परीक्षा ने क्या दिखाया
पुरोहित की परीक्षा लोभ का कार्य नहीं, अपने ही जीवन से पूछा गया एक प्रश्न थी। उनके पास जो कुछ था, विद्या, कुल, दरबार में स्थान, एक ही आरोप से क्षण भर में छिन सकता था, जबकि आचरण का फल उनके साथ जहाँ भी वे जाते, बना रहता। तीनों गाथाएँ उसी उत्तर की तरह पढ़ी जा सकती हैं जिस तक वे पहुँचे: शील इस जीवन में सुंदर है, साँप के स्वभाव की भाँति रक्षक है, और मृत्यु के बाद सुगति तक ले जाता है।
जन्म और विद्या से परे शील
यह देखना उचित है कि परीक्षा क्या पूछती है। जन्म और विद्या ऐसी चीज़ें हैं जो मनुष्य को मिलती हैं या वह अर्जित करता है, और कोई दरबार व्यक्ति को देखे बिना भी उनका आदर कर सकता है। शील वह एकमात्र संपदा है जिसे सौंपा, उधार लिया या विरासत में पाया नहीं जा सकता, और जातक पूछता है कि क्या वही विश्वास अर्जित करती है। वर्तमान और अतीत दोनों कथाओं में उत्तर एक ही आता है: राजा का स्नेह आचरण पर टिका था। इसीलिए दोनों बुद्धिमान पुरुषों, कोसल के ब्राह्मण और बनारस के पुरोहित, ने एक ही निष्कर्ष निकाला और प्रव्रज्या का मार्ग चुना, जहाँ शील पूर्णता तक पहुँच सकता है।
बुद्ध की पहचान
बुद्ध ने अतीत के पुरोहित को स्वयं से जोड़ा: शील की परीक्षा लेने वाला और फिर संसार त्यागने वाला बोधिसत्व पूर्व जन्म के बुद्ध थे, और वर्तमान कथा के कोसली ब्राह्मण ने प्रव्रज्या का वही मार्ग अपनाया।
क्या आप जानते हैं?
शील-वीमंस जातक (संख्या २९०) शील को जन्म और कुल से ऊपर, सम्मान के सच्चे आधार के रूप में रखता है।
बोधिसत्व यह प्रश्न अपने ही जीवन में परखते हैं
अपराध का क्षण भर का संदेह भी आदर को आरोप में बदलने के लिए पर्याप्त है।
प्रस्तावना-कथा में कोसल का एक ब्राह्मण वही परीक्षा लेता है, फिर संसार त्यागकर अर्हत हो जाता है।
पहली गाथा की आरंभिक पंक्ति है 'सीलं किरेव कल्याणं': शील सचमुच सुंदर, रक्षक और सुगति का मार्ग है।
बुद्ध अतीत के पुरोहित को स्वयं से जोड़ते हैं, और वर्तमान कथा का कोसली ब्राह्मण प्रव्रज्या का वही मार्ग अपनाता है।
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